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भारत में अंग्रेजी राज (पण्डित सुन्दरलाल - ब्रिटिश औपनिवेशिक लूट व षड्यन्त्रों का प्रामाणिक इतिहास)

भारत में अंग्रेजी राज (पण्डित सुन्दरलाल - ब्रिटिश औपनिवेशिक लूट व षड्यन्त्रों का प्रामाणिक इतिहास)

Bharat Mein Angreji Raj by Pandit Sunderlal

पण्डित सुन्दरलाल (प्रस्तावना: महात्मा गाँधी) द्वारा

DevanagariHindipublished727 पृष्ठ

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हैदरअली ३६३

दोनों को दग़ा दे चुका था, उस समय नाना फ़ड़नवीस और
भारत की स्वाधीनता दोनों की आशा का एकमात्र आधार वीर
हैदरअली था। इतना ही नहीं, बल्कि जिस समय नाना फ़ड़नवीस
भी अपनी सन्धि के अनुसार हैदरअली की मदद करने के नाक़ाबिल
हो गया और निज़ाम ने अपना वादा साफ़ तोड़ दिया, उस समय
अंगरेज़ों की पूरी शक्ति के मुक़ाबले का सारा बोझ अकेले हैदरअली
के कन्धों पर पड़ा। इसमें सन्देह नहीं हो सकता कि हैदरअली ने
आश्चर्यजनक साहस और सफलता के साथ अकेले इस बोझ को
बरदाश्त किया, और यदि भवितव्यता बीच में न पड़ती, यदि
ठीक उस समय जब कि भारत में अंगरेज़ों के हाथ पाँव बिलकुल
फूल चुके थे, मौत भारतीय स्वाधीनता के उस अन्तिम आधार
को उठा कर न ले गई होती, तो उसके बाद का भारत और अंगरेज़
जाति दोनों का इतिहास बिलकुल दूसरे ही ढंग से लिखा गया
होता। हैदरअली के बाद फिर ७५ साल तक भारत के पुत्रों को
अपनी स्वाधीनता के लिए उस तरह का व्यापक प्रयत्न करने का
साहस न हो सका। निस्सन्देह भारत की आज़ादी के लिए प्रयत्न
करने वालों में हैदरअली का पद सर्वोपरि है और आज़ादी के
चाहने वालों में उसका नाम सदा के लिए ज़िन्दा रहेगा।