भारत में अंग्रेजी राज (पण्डित सुन्दरलाल - ब्रिटिश औपनिवेशिक लूट व षड्यन्त्रों का प्रामाणिक इतिहास)
Bharat Mein Angreji Raj by Pandit Sunderlal
पण्डित सुन्दरलाल (प्रस्तावना: महात्मा गाँधी) द्वारा
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राय से तय हो जाती थी, गवरनर जनरल के लिए उसका मानना
ज़रूरी था । यही हालत मद्रास और बम्बई के गवरनरों की भी थी ।
इस नियम की वजह से वारन हेस्टिंग्स की चालों में कई बार
बाधाएँ पड़ीं । जिस तरह की अंगरेज़ी नीति उस समय भारत में
जारी थी, उसके लिए गवरनर जनरल के हाथों में पूरे अधिकार
का होना ज़रूरी था । इसलिए कॉर्नवालिस के इंगलिस्तान से चलने
से पहले पार्लिमेण्ट ने एक नया क़ानून पास किया, जिसमें कलकत्ते
के गवरनर जनरल और मद्रास और बम्बई के गवरनरों को यह
अधिकार दे दिया कि वे जिस मामले में चाहें अपनी कौन्सिलों
की राय के ख़िलाफ़ या कौन्सिलों से बिना पूछे काम कर सकते हैं ।
इसके अलावा भारत में अंगरेज़ों का इलाक़ा बढ़ता जा रहा था ।
इसलिए इस इलाक़े के शासन को चलाने के लिए अब इंगलिस्तान
में एक नया सरकारी बोर्ड, जिसे 'बोर्ड ऑफ़ कण्ट्रोल' कहते हैं,
बना दिया गया । इससे धीरे धीरे कम्पनी के यानी डाइरेक्टरों के
अधिकार कम होते गए और ब्रिटिश भारत की हुकूमत इंगलिस्तान
की पार्लिमेण्ट और वहाँ के मन्त्रि मण्डल के हाथों में आती गई ।
इस तरह नए अधिकार लेकर भारत का तीसरा अंगरेज़ गवरनर
जनरल सितम्बर सन् १७८६ में भारत पहुँचा ।
कॉर्नवालिस के समय की सबसे बड़ी घटना हैदरअली के बड़े
टीपू और अंगरेज़ बेटे और वारिस टीपू सुलतान के साथ अंगरेज़ों
का युद्ध था, जिसे दूसरा मैसूर युद्ध कहा
जाता है ।