भारत में अंग्रेजी राज (पण्डित सुन्दरलाल - ब्रिटिश औपनिवेशिक लूट व षड्यन्त्रों का प्रामाणिक इतिहास)
Bharat Mein Angreji Raj by Pandit Sunderlal
पण्डित सुन्दरलाल (प्रस्तावना: महात्मा गाँधी) द्वारा
पृष्ठ 651, कुल 727 में से
संदर्भ में पढ़ें[३७६] भारत में अंगरेज़ी राज
था। मद्रास के गवरनर हॉलैण्ड के एक पत्र में यह भी लिखा है
कि—"कम्पनी से लड़ने का टीपू का बिलकुल इरादा न था और
यदि कोई बातें शिकायत की थीं भी तो वह उन्हें आपस में पत्र
व्यवहार द्वारा तय करने को राज़ी था।" टीपू ने खुद अंगरेज़ों
को यक़ीन दिलाया कि मेरा इरादा न हरगिज़ शान्ति भंग करने
का है और न त्रिषानकुर की प्राचीन रियासत पर हमला करने का।
कर्नल विल्क्स लिखता है कि टीपू "लड़ाई के लिए तैयार न था"
किन्तु कॉर्नवालिस को अपने मालिकों की आज्ञा मिल चुकी थी।
वह सन् १७८४ की सन्धि को पैरों तले रौंद कर, जिस तरह हो,
टीपू को मिटाने और भारतीय ब्रिटिश राज की सीमाओं को बढ़ाने
का सङ्कल्प कर चुका था। उसने मद्रास के गवरनर को उत्तर में
लिखा कि—"टीपू का तैयार न होना ही कम्पनी के लिए सब से
अच्छा मौक़ा है।" टीपू को बदनाम करने और अपने अन्याय को
लोगों की नज़रों में जायज़ क़रार देने के लिए टीपू के अन्यायों और
अत्याचारों के अनेक झूठे क़िस्से गढ़कर चारों ओर फैलाए गए,
जिनमें से अनेक अभी तक भारतीय स्कूलों की पाठ्य पुस्तकों में
पाए जाते हैं।
त्रिबानकुर की सहायता के नाम पर युद्ध छेड़ा गया, किन्तु
इसके बाद की तमाम काररवाइयों में त्रिबानकुर के राजा का कहीं
नाम भी नहीं आता।
सब से पहले जून सन् १७६० में मद्रास से एक फ़ौज जनरल
मीडोज़ के अधीन मैसूर पर हमला करने के लिए रवाना हुई।