भारत में अंग्रेजी राज (पण्डित सुन्दरलाल - ब्रिटिश औपनिवेशिक लूट व षड्यन्त्रों का प्रामाणिक इतिहास)
Bharat Mein Angreji Raj by Pandit Sunderlal
पण्डित सुन्दरलाल (प्रस्तावना: महात्मा गाँधी) द्वारा
३४८ भारत में अंगरेज़ी राज
को अचानक क़िले पर हमला किया। केवल नायक, बीस सिपाही
और कुछ स्त्रियाँ क़िले में रह गई थीं। अंगरेज़ी सेना के हमले की
ख़बर पाकर नायक ने क़िले का फाटक बन्द करवा दिया, बड़े बड़े
पत्थर अँधेरे में क़िले की फ़सील पर रखवा दिए और स्त्रियों ने
बहुत सा गोबर और पानी घोलकर बड़े बड़े बरतनों में खौलाना
शुरू किया। जिस समय अंगरेज़ी सिपाही दीवारों पर चढ़ने लगे,
स्त्रियों ने चिल्ला कर पत्थर नीचे की ओर लुढ़का दिए और
खौलता हुआ गोबर का पानी अंगरेज़ी सेना के सर पर डालना
शुरू किया। भीतर के बीस सिपाहियों ने भी अपनी बन्दूकों का
उचित उपयोग किया। अं... सिपाहियों को एक बार घबरा कर
नीचे उतर आना पड़ा। इतने में क़िले की वह सेना जो बाहर गई
हुई थी, आवाज़ सुन कर क़िले की ओर लपकी। अंगरेज़ी सेना के
बचे हुए आदमियों को जान बचा कर भाग जाना पड़ा।
एक बार साफ़ मालूम होता था कि हैदरअली दक्खिन भारत
से अंगरेज़ों को निकाल कर बाहर कर देगा।
[हाशिया: हैदरअली की] नाना फड़नवीस पूना में बैठा हुआ यह सब
[हाशिया: अचानक मृत्यु] सुसमाचार सुन रहा था और इन्हीं आशाओं
के आधार पर सालबाई के सन्धि पत्र पर दस्तख़त करने से इनकार
कर रहा था। जिस समय गायकवाड़, सींधिया और भोंसले तीन
तीन ज़बरदस्त मराठा नरेश मराठा मण्डल और अपने देश दोनों के
साथ विश्वासघात कर चुके थे, और निज़ामुलमुल्क भी अंगरेज़ों
की चालों में फँस चुका था, उस समय इन विदेशियों के विरुद्ध
हैदरअली ३४६
नाना फड़नवीस की समस्त आशाओं का आधार केवल वीर हैदर
अली था । यदि हैदरअली एक बार मद्रास प्रान्त से अंगरेज़ों को
निकाल सकता तो निस्सन्दह नाना फड़नवीस मराठा मण्डल को
मज़बूत करके उत्तर में अंगरेज़ों के साथ फिर से युद्ध शुरू कर
देता । उत्तरी भारत में अंगरेज़ अपने अनेक दुश्मन पैदा कर चुके
थे और इस हालत में नाना को सफलता प्राप्त होने की भी बहुत
बड़ी सम्भावना थी । किन्तु मालूम होता है कि भारतवासियों के
अनेक पापों के प्रायश्चित और सच्ची भारतीय आत्मा के विकास के
लिए अभी इस देश का विदेशी शासन के अग्नि स्नान में से निकलना
आवश्यक था । ठीक उस समय जब कि वीर हैदरअली इलाक़ों पर
इलाक़े और गढ़ों पर गढ़ विजय करता हुआ बढ़ा चला जा रहा
था, जब कि भारत के अन्दर स्वतन्त्रता और परतन्त्रता के इस द्वन्द
को एशिया और यूरोप की समस्त जागरूक शक्तियाँ ध्यान से देख
रही थीं, जब कि हैदरअली का नाम सुनकर भारत के अंगरेज़ चौंक
पड़ते थे और इंगलिस्तान में कम्पनी के हिस्सों की दर धड़ाधड़
गिर रही थी, अचानक छै दिसम्बर सन् १७८२ की रात को अरकाट
के क़िले में हैदरअली की मृत्यु हो गई । हैदरअली की मृत्यु ने नाना
फड़नवीस की आशाओं को चूर चूर कर दिया और लाचार होकर
उसने सालबाई की सन्धि पर दस्तख़त कर दिए । अंगरेज़ों के लिए
हैदरअली की मृत्यु वास्तव में एक बहुत बड़ी बरकत साबित हुई ।
आरनी की विजय के बाद हैदरअली की कमर में एक फोड़ा
निकला, जिसके कारण उसे अरकाट लौट आना पड़ा । यह फोड़ा
३५० भारत में अंगरेज़ी राज
ही हैदरअली की मौत का पैग़ाम साबित हुआ। जब हैदरअली को
अपने रोग के असाध्य होने का पता लगा, उसने अपने तमाम
मन्त्रियों और सरदारों को बुलाकर राज्य के कार्य के विषय में
अन्तिम आदेश दिए। एक सेना पाँच हज़ार सवारों की उसने
मद्रास की ओर रवाना की। अपनी विशाल सेना के हर सिपाही
और मुलाज़िम को एक एक महीने की तनख़ाह बतौर इनाम के
दिलवाई और टीपू को, जो उस समय एक दूसरे मैदान में था,
बुलवा भेजा।
हैदरअली की आयु उस समय साठ साल से कुछ ऊपर थी।
डर था कि हैदरअली की मृत्यु के समाचार से
हैदरअली के हिन्दू उसकी विजयी सेना का उत्साह न टूट जावे।
मंत्री हैदरअली के दोनों मुख्य मंत्री हिन्दू थे जिनके
नाम पूर्णिया और कृष्णाराव थे। इन दोनों वफ़ादार मन्त्रियों ने
हैदरअली की मृत्यु को बड़ी होशियारी के साथ उस समय तक
शत्रु और अपनी सेना दोनों से छिपाए रक्खा जिस समय तक कि
हैदरअली के बड़े बेटे फ़तहअली टीपू ने अरकाट में पहुँच कर अपने
बाप की जगह न ले ली। टीपू के आने पर सुलतान हैदरअली
का शव मैसूर की राजधानी श्रीरङ्गपट्टन भेजा गया, जहाँ बड़े
समारोह के साथ उसे लाल बाग़ में दफ़न किया गया, और
टीपू ने पिता की क़ब्र के ऊपर एक सुन्दर और आलीशान
समाधि बनवाई।
टीपू अपने बाप के समान वीर, किन्तु अभी नातजरुबेकार था।
हैदरअली ३५१
मैसूर के अंदर अपनी नई सत्ता को मज़बूत करने की ओर भी उसे
काफी ध्यान देना पड़ा। फिर भी उसने पहले
युद्ध का अंत बड़ी सफलता के साथ युद्ध जारी रक्खा और
अंगरेज़ी सेना को शिकस्त पर शिकस्त दी। यहाँ तक कि अंगरेज़ों
को चारों ओर "निर्बलता, निरुत्साह और नैराश्य"* के सिवा कुछ
दिखाई न देता था। अन्त में सन् १७८३ में अंगरेज़ों ने बड़ी नम्रता
के साथ टीपू से सुलह की प्रार्थना की। टीपू उनकी बातों में आ
गया। ११ मार्च सन् १७८४ को मङ्गलौर में टीपू सुलतान और
अंगरेज़ कम्पनी के बीच सन्धि होगई। अंगरेज़ों ने वादा किया कि
हम फिर कभी मैसूर के मामलों में दखल न देंगे, टीपू और उसके
उत्तराधिकारियों के साथ सदा मित्रता का व्यवहार रक्खेंगे और
उनके शत्रुओं के विरुद्ध सदा उन्हें सहायता देने के लिए तैयार
रहेंगे। इस वादे पर वीर, उदार, किन्तु नातजरुबेकार टीपू ने
अंगरेज़ों से जीता हुआ तमाम इलाक़ा उन्हें लौटा दिया। टीपू ने
निस्सन्देह एशियाई मर्यादा के अनुसार अपनी शाहाना आन क़ायम
रक्खी और अंगरेज़ों को काफ़ी नीचा दिखाया, किन्तु जो बात
हैदर और नाना चाहते थे वह पूरी न होसकी।
हैदरअली एक ग़रीब घर में पैदा हुआ था और एक मामूली
सिपाही से बढ़ते बढ़ते केवल अपनी वीरता और
हैदरअली योग्यता के बल एक विशाल राज का स्वामी बन
का बल गया। हैदरअली 'सुलतान हैदरअली शाह'
- "Debility, dejection and despair."—Mill vol. iv. p. 222.
३५२ भारत में अंग्रेज़ी राज
कहलाता था । दिल्ली दरबार के सूबेदारों में उसकी गिनती थी ।
मैसूर का वह 'दैव' था । और हम ऊपर लिख चुके हैं कि मैसूर
राज के अंदर 'दैव' का पद ठीक वैसा ही था जैसा मराठा साम्राज्य
के अंदर पेशवा का । 'दैव' की गद्दी अब हैदरअली के कुल में पैतृक
हो गई थी । अपनी वीरता द्वारा उसने मैसूर राज को बहुत अधिक
बढ़ा लिया था । मरते समय उस तमाम इलाक़े को छोड़कर, जो
उसने हाल के युद्ध में अपने शत्रुओं से विजय किया था, उसके
बाक़ी राज का क्षेत्रफल अस्सी हज़ार वर्गमील था, जिसकी सालाना
बचत शासन का तमाम ख़र्च निकाल कर तीन करोड़ रुपए से
ऊपर थी । उसकी कुल स्थायी सेना तीन लाख चौबीस हज़ार थी,
जिनमें १६,००० सवार, १०,००० तोपख़ाने के सिपाही, १,१५,०००
पैदल और १,८०,००० इस तरह की सेना थी जो दूसरे सरदारों
के अधीन हर समय तैयार रहती थी और आवश्यकता पड़ने पर
बुला ली जाती थी । उसके ख़ज़ाने के जवाहरात और नक़दी का
अन्दाज़ा अस्सी करोड़ रुपये से ऊपर का था। उसकी पशु शालाओं
में ७०० हाथी, ६,००० ऊँट, ११,००० घोड़े, ४,००,००० गाय और
बैल, १,००,००० भैंस, और ६०,००० भेड़ें थीं । उसके शस्त्रागार में
६,००,००० बन्दूक़, २,००,००० तलवार और २२,००० तोपें थीं ।
हैदरअली अपने समय का अकेला भारतीय नरेश था जिसने
अपने समुद्र तट की रक्षा के लिए एक जहाज़ी
उसकी जल सेना बेड़ा, जिसके हर जहाज़ पर तोपें लगी हुई थीं,
रख रक्खा था । उसकी जलसेना अपने समय की एक ज़बरदस्त
जलसेना थी। उसके जलसेनापति अलीरज़ा ने मलद्वीप नामके क़रीब
बारह हज़ार छोटे बड़े टापुओं को विजय कर उन्हें हैदरअली के
राज में मिला लिया था।
हैदरअली लिखना पढ़ना बिलकुल न जानता था। एक मुसल-
मान इतिहास लेखक लिखता है कि उसने फ़ारसी
अक्षरों में अपना नाम लिखने का प्रयत्न किया।
बड़े परिश्रम से वह अपने नाम का केवल पहला अक्षर ‘हे’ सीख
पाया। किन्तु इस ‘हे’ को भी वह सदा उलटा और ग़लत लिखा
करता था। यही उसके दस्तख़त थे। इस पर भी तमाम भारतीय
और विदेशी इतिहास लेखक मुक्त कंठ से स्वीकार करते हैं कि
उसकी बुद्धिमत्ता, दूरदर्शिता, नीतिज्ञता और शासन प्रबन्ध में
उसकी योग्यता सभी बड़े ऊँचे दरजे की थीं, वीरता और युद्ध
कौशल में वह अपने समय में अपना सानी न रखता था।
धार्मिक पक्षपात या तअस्सुब का उसमें निशान तक न था।
राज की ऊँची से ऊँची पदवियाँ उसने हिन्दुओं
को दे रक्खी थीं। उसके बड़े से बड़े मंत्री हिन्दू
थे। मैसूर के जिन बाग़ी सामन्तों को उसने
परास्त किया उनकी गद्दियाँ या तो उन्हीं को वापस कर दीं और
या दूसरे हिन्दू नरेशों को उनकी जगह बैठा दिया। अपनी हिन्दू
और मुसलमान प्रजा के साथ वह एक समान उदार व्यवहार रखता
था। उसने अनेक हिन्दू मन्दिर बनवाए और अनेक मन्दिरों को
जागीरें अता कीं। हाल में उस समय के इतिहास की खोज द्वारा
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३५४ भारत में अंग्रेज़ी राज
अंग्रेज़ लेखक मि० गैलेटिक आई० सी० एस० ने दिखाया है कि
हैदरअली ने अपनी सलतनत भर में गोरक्षा का उसी तरह सुन्दर
प्रबन्ध कर रक्खा था जिस तरह बाबर और उसके उत्तराधिकारी
मुग़ल सम्राटों ने। हैदरअली के राज में गोबध का कड़ा निषेध था
और यदि राज भर में कभी कोई मनुष्य गोबध का अपराधी होता
था तो उसके हाथ काट लिए जाते थे।
जगद्गुरु शङ्कराचार्य के चार मुख्य मठों में शृङ्गेरी का मठ मैसूर
[हैदरअली और] के राज में था। शृङ्गेरी मठ के स्वामी उस समय
[जगद्गुरु] के जगद्गुरु शङ्कराचार्य के साथ हैदरअली का
[शङ्कराचार्य] ख़ास 'प्रेम' था। दोनों में खूब पत्र व्यवहार होता
था। वर्त्तमान मैसूर राज के पुरातत्त्व विभाग
ने कृपा कर हमारे पास कनाड़ी भाषा में जगद्गुरु शङ्कराचार्य के
नाम हैदरअली के एक मूल पत्र का फ़ोटो भेजा है जिसे पढ़ने से
मालूम होता है कि हैदरअली जगद्गुरु का कितना अधिक आदर
करता था और किस तरह राज के गम्भीर मामलों में जगद्गुरु की
सलाह लेकर काम करता था। इसी पत्र के साथ हैदरअली ने “एक
हाथी, पाँच घोड़े, एक पालकी, पाँच ऊँट × × × पाँच सोने के
ताफ़्ते (सूर्य चन्द्राङ्कित पताकाएँ, जो जगद्गुरु के साथ चलती
हैं) × × × एक जोड़ी शाल, साढ़े दस हज़ार रुपए नक़द × × ×
इत्यादि” जगद्गुरु की नज़र के तौर पर और “एक ठोस सोने का
फ़तीलसोज़ (शमई) शृङ्गेरी मठ की देवपूजा” के लिए जगद्गुरु
की सेवा में भेजा।
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हैदरअली अपने दरबार के अन्दर हिन्दू त्योहारों को बड़े
समारोह के साथ मनाया करता था। विशेषकर
हिन्दू त्योहार दशहरे के मौक़े पर उसके दरबार में दस दिन
तक लगातार जश्न रहता था, रोज़ शाम को आतिशबाज़ी छुटती
थी, साँडों, बारहसींगों, हाथियों और शेरों की लड़ाइयाँ होती थीं,
कुश्तियां होती थीं, दावतें होती थीं; इनाम और इकराम दिए
जाते थे, ग़रीबों को भोजन वस्त्र और धन बाँटा जाता था।
मज़हब के नाम पर किसी तरह के भी लड़ाई झगड़ों को वह
बड़ी नफ़रत की नज़र से देखता था। एक बार
शिया सुन्नी उसके राज में कहीं पर शिया और सुन्नियों में
झगड़ा हो गया। ज़बान से बढ़ते बढ़ते मामला ख़ञ्जर और भालों
तक पहुँच गया। हैदर के कानों तक ख़बर पहुँची, उसने दोनों
पक्ष के लोगों को अपने सामने बुलवाया और उनसे पूछा—"यह
क्या बेवक़ूफ़ी का झगड़ा है, और तुम लोग कुत्तों की तरह एक
दूसरे पर क्यों भौंकते हो ?" दोनों ने अपनी अपनी बात कह सुनाई,
मालूम हुआ कि झगड़ा केवल इस बात पर है कि हज़रत मोहम्मद
के कुछ उत्तराधिकारियों के विषय में शियों की एक राय है और
सुन्नियों की दूसरी। हैदरअली ने उनसे पूछा—"जिन व्यक्तियों के
बारे में तुम्हारा झगड़ा है क्या वे ज़िन्दा हैं?" जवाब मिला,
"नहीं।" इस पर हैदरअली ने उनसे कहा—"जो लोग मर चुके,
उनकी बाबत अब झगड़ा करना हिमाक़त है," और दोनों को
आगाह कर दिया कि—"अगर तुम लोग फिर कभी अपना और
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सरकार का समय इन बेतुके और बदमाशी के झगड़ों में नष्ट करोगे
तो यक़ीन रक्खो तुम्हारे सर कुचल दिए जावेंगे।”
हैदरअली का इन्साफ़ उस समय दूर दूर तक मशहूर था।
हैदरअली का उसके जीवन चरित्र का एक फ़्रान्सीसी रचयिता
इन्साफ़ लिखता है कि उसकी प्रजा में किसी भी निर्धन
से निर्धन पुरुष या स्त्री को अधिकार था कि
हैदर के सामने आकर अपनी दाद फ़रियाद पेश करे। पहरेदारों
को हुकुम था कि किसी फ़रियादी को किसी समय भी हुज़ूर में
आने से न रोका जावे। वह बड़े ग़ौर से सब की फ़रियाद सुनता
था और सब का इन्साफ़ करता था। एक बार सन् १७६७ ईसवी
में जब कि हैदरअली कोयम्बत्तूर में था, एक दिन शाम को वह हवा
ख़ोरी के लिए जा रहा था। मार्ग में एक बुढ़िया सड़क के एक ओर
आकर लेट गई और “इन्साफ़ ! इन्साफ़ !” चिल्लाने लगी। हैदर
अली ने फ़ौरन अपनी सवारी रोक दी, बुढ़िया को पास बुलाया
और पूछा—“क्या मामला है ?” बुढ़िया ने जवाब दिया—“जहाँ
पनाह ! मेरे केवल एक बेटी थी, आग़ा मोहम्मद उसे भगा ले गया।”
सुलतान ने जवाब दिया—“आग़ा मोहम्मद को यहाँ से गए एक
महीने से ज़्यादा हो गया, तुमने आज तक शिकायत क्यों नहीं
की ?” जवाब मिला—“जहाँपनाह ! मैंने कई बार अर्ज़ियाँ लिखकर
हैदरशा के हाथों में दीं, किन्तु मुझे कोई जवाब नहीं मिला।”
हैदरशा हैदरअली का ख़ास जमादार था जो उस समय हैदरअली
के आगे आगे चल रहा था। आग़ा मोहम्मद उससे पहले का ख़ास
हैदरअली ३५७
जमादार था और पच्चीस साल तक हैदरअली की ख़िदमत कर
चुका था। आग़ा मोहम्मद को हैदरअली ने पेन्शन और जागीर
देकर एक महीना हुआ बिदा कर दिया था। हैदरशा ने अपनी
सफ़ाई में आगे बढ़कर अर्ज़ किया—"जहाँपनाह ! यह बुढ़िया
और उसकी बेटी दोनों बदचलन हैं।" हैदरअली फ़ौरन महल की
ओर लौट पड़ा और बुढ़िया को अपने साथ ले गया। महल पहुँच
कर जब लोगों ने हैदरअली से प्रार्थना की कि इस बार हैदरशा को
क्षमा कर दिया जाय तो हैदरअली ने उत्तर दिया—"मैं आप लोगों
की प्रार्थना स्वीकार नहीं कर सकता। किसी बादशाह और उसकी
प्रजा के बीच के पत्र व्यवहार को रोकने से बढ़कर कोई गुनाह हो
ही नहीं सकता। बलवानों का कर्त्तव्य है कि निर्बलों का इन्साफ़
करें। ख़ुदा ने निर्बलों की रक्षा के लिए ही बादशाह को बनाया है
और जो बादशाह अपनी प्रजा के ऊपर ज़ुल्म होने देता है और
ज़ुल्म करने वाले को दण्ड नहीं देता वह इस योग्य है कि उसकी
प्रजा का प्रेम और विश्वास उस पर से हट जावे और प्रजा उसके
ख़िलाफ़ बग़ावत करने लगे।"*
हैदरअली ने सब के सामने अपने जमादार हैदरशा के दो सौ
कोड़े लगवाए। साथ ही उसने एक सवार उस बुढ़िया के साथ
आग़ा मोहम्मद के रहने की जगह भेजा और हुकुम दिया कि यदि
लड़की आग़ा मोहम्मद के यहाँ मिल जाय तो उसे उसकी माँ के
हवाले कर दिया जाय और आग़ा मोहम्मद का सर काट कर मेरे
- History of Hyder Shah By M. M. D. L. T. p. 20.
३५८ भारत में अंगरेज़ी राज
सामने पेश किया जाय और यदि लड़की न मिले तो आग़ा मोहम्मद
को गिरफ्तार करके मेरे सामने लाया जाय । लड़की आग़ा मोहम्मद
के यहाँ मौजूद थी। उसे उसकी माँ के हवाले कर दिया गया और
आग़ा मोहम्मद का सर काट कर हैदरअली के सामने पेश किया
गया।
हैदरअली के इन्साफ़ की इसी तरह की और भी अनेक रोशन
मिसालें उसकी जीवनियों में मिलती हैं। मीर हुसेनअली ख़ाँ
किरमानी लिखता है कि चोर, उचक्के अथवा डाकू का नाम तक
हैदरअली के राज में कहीं सुनने में न आता था और यदि अकस्मात्
कहीं पर चोरी हो जाती थी तो उस जगह के पुलिस कर्मचारी को
फ़ौरन मौत की सज़ा दी जाती थी और दूसरा आदमी उसकी
जगह नियुक्त कर दिया जाता था। हैदरअली के हज़ारों जासूस
सल्तनत भर में घूमते रहते थे और उसे प्रजा के सुख दुख की ख़बरें
देते रहते थे। हैदरअली ख़ुद अक्सर वेश बदले कम्बल ओढ़े रात
को श्रीरङ्गपट्टन और अन्य नगरों की गलियों में घूमा करता था
और ग़रीबों और यात्रियों की ख़बर रखता था।
हैदरअली की सारी प्रजा उससे अत्यन्त ख़ुश थी, उसके राज
[पार्श्व टिप्पणी: हैदरअली की प्रजा] भर में चारों ओर ख़ुशहाली थी। तिजारत,
[पार्श्व टिप्पणी: पालकता] उद्योग धन्धों और खेती बाड़ी को खूब उत्तेजना
दी जाती थी। वह ख़ुद कारीगरों और सौदागरों
की खूब मदद करता था। लिखा है कि अकेले कोयम्बत्तुर के
बाज़ार में बीस हज़ार रेशम के थान हर हफ़्ते बिकने के लिए आते
हैदरअली ३५६
थे। यदि कोई सरकारी कर्मचारी प्रजा के ऊपर किसी तरह का
अत्याचार करता था तो हैदरअली सदा उसे कड़ी से कड़ी सज़ा
देता था। उसके राज भर में इस बात की सख़्त आज्ञा थी कि
किसानों से उनकी नियत मालगुज़ारी के अलावा एक कौड़ी भी
किसी बहाने न ली जावे।
हैदरअली की बुद्धि की प्रखरता और उसकी याददाश्त बिलकुल
[बुद्धि की] अलौकिक थी। नैपोलियन के समान वह एक
[प्रखरता] साथ कई कई काम किया करता था। वह जिस
वक्त कोई मामूली तमाशा देखता रहता था
उसी वक्त कुछ लोगों से प्रश्न करता रहता था, जवाब देता रहता
था, अख़बार सुनता था, चिट्ठियां सुनता था, चिट्ठियाँ लिखवाता
था और साथ ही अपने मन्त्रियों के साथ गम्भीर से गम्भीर प्रश्नों
पर बातचीत करता रहता था और उनका फ़ैसला करता रहता
था। ये सब काम एक साथ चलते रहते थे। एक साथ वह तीस
तीस और चालीस चालीस मुन्शियों से काम लेता रहता था।
रोज़ सुबह को जब वह एक चौकी पर बैठकर हाथ मुंह धोया
करता था, उसी समय उसके अनेक जासूस उसकी चौकी के चारों
ओर खड़े हो जाते थे और पिछले चौबीस घण्टे का अपना अपना
हाल सुनाते थे। ये सब जासूस एक साथ बोलते थे। हैदर मुंह
धोते धोते सब की बात सुनता था, केवल आवाज़ से उन्हें पहचानता
था, और जिससे ज़रूरत समझता था बीच बीच में सवाल कर
लेता था। मनुष्य के चरित्र को वह केवल एक बार शक्ल देखकर
३६० भारत में अंग्रेज़ी राज
पहचान जाता था, रँगरूटों को केवल चेहरे से देखकर भरती कर
लेता था। घोड़ों और जवाहरात की भी उसे गज़ब की पहचान थी।
हैदरअली वीर था और वीरता की बड़ी क़द्र करता था। अपने
[हाशिया: वीरता और सादगी] सिपाहियों के साथ उसका व्यवहार अत्यन्त
प्रेम, उदारता और बराबरी का रहता था।
जिन्हें वह युद्ध में हरा देता था उनके साथ भी
उसका व्यवहार सदा दया और उदारता का होता था। इतना बड़ा
नरेश होने पर भी उसमें घमण्ड या अभिमान का निशान तक न
था। अपने राज को वह सदा 'खुदादाद' कहा करता था। अपने
दरबारों तक में वह मामूली सिपाहियों के साथ बराबरी का
व्यवहार करता था। स्वयं एक मामूली सिपाही का सा जीवन
व्यतीत करता था। भोजन जो सामने आता खा लेता था। सफ़र
में वह अक्सर भुने हुए चने, बादाम और ज्वार की सूखी रोटी या
इनमें से जो सामने आ जावे खाकर रह जाता था। अपने तख़्त पर
वह ज़्यादा से ज़्यादा साल में एक बार ईद के दिन चन्द घण्टे के
लिए बैठता था और वह भी दूसरों की प्रार्थना पर।
हैदरअली का क़द मँझोला था, उसका रंग साँवला था।
किन्तु उसके शरीर की बनावट सुन्दर थी।
[हाशिया: हैदरअली का शारीरिक बल] वह मज़बूत और निहायत फुर्तीला था। वह
घोड़े का बहुत अच्छा सवार था। पैदल लम्बे
सफ़र करने का भी उसे बेहद शौक़ था और आदत थी। सप्ताह
में दो बार वह अपने सर, दाढ़ी और मूंछों के बाल मुंडवा
देता था। दाढ़ी और मूंछें वह इतनी साफ़ रखता था कि नकचुटनी
से एक एक बाल निकलवा देता था। उसकी देखादेखी उसके
अधिकतर दरबारी भी दाढ़ी न रखते थे और मूंछें यदि रखते थे
तो इतनी कम कि जो दूर से दिखाई न देती थीं। हैदरअली को
लाल कपड़ों का शौक़ था और अपने सर पर वह एक सौ हाथ
लम्बी लाल पगड़ी बाँधता था।
शिकार का और ख़ास कर शेर के शिकार का उसको बड़ा
शौक़ था। उसके यहाँ अनेक शेर पले हुए थे जो
शेर पालना रोज़ सुबह खुले हुए उसके सामने लाए जाते
थे। हैदरअली अपने हाथ से इन शेरों को लड्डू खिलाया करता
था। उनके पञ्जों और जबड़ों में वह लड्डू दे देता था। लिखा है
कि उसका निशाना कभी चूकता न था। अपने सामने अखाड़े
में वह अक्सर शेर के साथ अपने किसी एक वीर सिपाही की
कुश्ती कराया करता था। यदि सिपाही शेर को पछाड़ पाता तो
उसे इनाम-ओ-इकराम दिए जाते थे और यदि शेर हावी होने
लगता, तो हैदर फ़ौरन दूर से बैठा हुआ शेर की कनपटी पर गोली
मार देता और इससे पहले कि शेर का पञ्जा सिपाही पर पड़
सके, शेर गोली खाकर गिर पड़ता था।
हैदरअली के शारीरिक परिश्रम और कष्ट सहन की कोई सीमा
न थी। वह कई कई रातें जंगल में बारिश और
हैदरअली का कष्ट सरदी के अन्दर घोड़े की पीठ पर गुज़ार देता
सहन था। घोड़ों, हाथियों, तोपों और रसायण का
३६२ भारत में अंगरेज़ी राज
उसे ख़ास शौक़ था । उसके एक प्यारे हाथी का नाम 'पवनगज'
था जिसके मरने पर हैदरअली ने बड़ा दुख मनाया । घोड़े ख़रीदने
का उसे इतना अधिक शौक़ था कि दूर दूर के मुल्कों से घोड़े के
सौदागर उसके दरबार में पहुँचते थे और यदि किसी सौदागर
का घोड़ा उसके राज के अन्दर मर जाता और सौदागर अपने
घोड़े की अयाल और दुम काट कर स्थानीय कर्मचारी की सनद के
साथ हैदरअली के दरबार में पेश करता तो घोड़े की आधी क़ीमत
उसे ख़ज़ाने से दिलवा दी जाती थी ।
इन सब बातों के अलावा हैदरअली अंगरेज़ों का कट्टर शत्रु
[पार्श्व शीर्षक: हैदरअली और] था । अंगरेज़ों के लिए उसका नाम एक 'हव्वा'
[पार्श्व शीर्षक: अंगरेज़] था । गोकि हैदरअली की नीतिज्ञता नाना फड़-
नवीस के टक्कर की न थी, सब से बड़ी ग़लती
उसकी यह थी कि अपनी सेना के अनेक बड़े बड़े ओहदों पर
उसने फ़्रान्सीसीयों को नियुक्त कर रक्खा था, जिसका फल उसकी
मृत्यु के बाद उसके बेटे टीपू सुलतान को भोगना पड़ा, फिर भी
इसमें सन्देह नहीं कि अपने जीवन भर अंगरेज़ों को भारत से
निकालने का हैदर ने जी तोड़ प्रयत्न किया। वह जब तक जिया,
अजेय रहा और अन्त में इसी प्रयत्न में उसने अपनी जान दी।
हम ऊपर लिख चुके हैं कि जिस समय गायकवाड़, सींधिया और
भोंसले तीन तीन ज़बरदस्त मराठा नरेश महाराष्ट्र मण्डल और
अपने देश दोनों के साथ विश्वासघात कर चुके थे, और निज़ामुल
मुल्क भी अंगरेज़ों के साथ मिलकर अपने साथियों और मुल्क
[Page Header]
हैदरअली ३६३
दोनों को दग़ा दे चुका था, उस समय नाना फ़ड़नवीस और
भारत की स्वाधीनता दोनों की आशा का एकमात्र आधार वीर
हैदरअली था। इतना ही नहीं, बल्कि जिस समय नाना फ़ड़नवीस
भी अपनी सन्धि के अनुसार हैदरअली की मदद करने के नाक़ाबिल
हो गया और निज़ाम ने अपना वादा साफ़ तोड़ दिया, उस समय
अंगरेज़ों की पूरी शक्ति के मुक़ाबले का सारा बोझ अकेले हैदरअली
के कन्धों पर पड़ा। इसमें सन्देह नहीं हो सकता कि हैदरअली ने
आश्चर्यजनक साहस और सफलता के साथ अकेले इस बोझ को
बरदाश्त किया, और यदि भवितव्यता बीच में न पड़ती, यदि
ठीक उस समय जब कि भारत में अंगरेज़ों के हाथ पाँव बिलकुल
फूल चुके थे, मौत भारतीय स्वाधीनता के उस अन्तिम आधार
को उठा कर न ले गई होती, तो उसके बाद का भारत और अंगरेज़
जाति दोनों का इतिहास बिलकुल दूसरे ही ढंग से लिखा गया
होता। हैदरअली के बाद फिर ७५ साल तक भारत के पुत्रों को
अपनी स्वाधीनता के लिए उस तरह का व्यापक प्रयत्न करने का
साहस न हो सका। निस्सन्देह भारत की आज़ादी के लिए प्रयत्न
करने वालों में हैदरअली का पद सर्वोपरि है और आज़ादी के
चाहने वालों में उसका नाम सदा के लिए ज़िन्दा रहेगा।
दसवाँ अध्याय
सर जॉन मैकफ़रसन
वारन हेस्टिंग्स के बाद कलकत्ते की कौन्सिल का प्रमुख सदस्य
नवाब मोहम्मदअली सर जॉन मैकफ़रसन अस्थायी तौर पर कम्पनी
को इंगलिस्तान के के भारतीय इलाक़ों का गवरनर जनरल नियुक्त
बादशाह की हुआ। मैकफ़रसन के समय में कोई ख़ास
भेंट लिखने योग्य घटना नहीं हुई; किन्तु उसका
चरित्र ख़ासा मनोरञ्जक था।
मैकफ़रसन सबसे पहले सन् १७६७ में किसी जहाज़ का
बख़्शी (पेमास्टर) नियुक्त होकर हिन्दोस्तान आया। वह ख़ासा
पढ़ा लिखा और चलता पुर्ज़ा था। इस पुस्तक के पहले अध्याय
में आ चुका है कि करनाटक की गद्दी के ऊपर अंगरेज़ों, फ़्रांसीसियों
और निज़ाम ने अलग अलग हक़दारों का पक्ष लेकर काफ़ी लड़ाइयाँ
सर जॉन मैकफ़रसन ३६५
लड़ीं। अन्त में अंगरेज़ों की सहायता से मोहम्मदअली करनाटक
का नवाब बना। इस सहायता के बदले में मोहम्मदअली ने
अंगरेज़ों को साढ़े चार लाख पैगोदा यानी क़रीब १६ लाख
रुपए सालाना का इलाक़ा अता किया। शुरू में अंगरेज़ नवाब
मोहम्मदअली का बड़ा आदर करते थे। यहाँ तक कि एक बार
मोहम्मदअली ने एक पत्र कुछ उपहारों और भेंट सहित इंगलिस्तान
के बादशाह तीसरे जॉर्ज के पास भेजा और उसके जवाब में
बादशाह जॉर्ज ने अपने हाथ से लिखकर एक अत्यन्त आदर और
प्रेम का पत्र और उसके साथ बतौर नज़ऱाने के दो बढ़िया पिस्तौल
और बतौर नमूने के कुछ इंग्लिस्त[ान का] बना कपड़ा मोहम्मदअली
के पास भेजा।
किन्तु थोड़े ही दिनों में ठीक वही सलूक मोहम्मदअली के साथ
(हाशिया: मोहम्मदअली के साथ कम्पनी की ज़्यादतियाँ) होने लगा जो उत्तर में अवध के नवाबों के साथ
हो रहा था। धन की नित्य नई माँगें उसके
सामने पेश की जाती थीं और जबरन् पूरी कराई
जाती थीं। मिसाल के लिए यह एक प्रथा पड़
गई थी कि मोहम्मदअली मद्रास के हर नए गवर्नर को अपने यहाँ
दावत करे और उसे तीस हज़ार पैगोदा नज़र करे। कम्पनी के
छोटे मोटे नौकरों की माँगें भी मोहम्मदअली के ऊपर नित्य बढ़ती
गईं, यहाँ तक कि जब अरकाट का ख़ज़ाना ख़ाली हो गया तो
कुछ अंगरेज़ व्यापारियों ने ही अपने दूसरे देशवासियों की माँगें
पूरी करने के लिए मोहम्मदअली को क़र्ज़ देने शुरू किए। लाचार
३६६ भारत में अंगरेज़ी राज
होकर मोहम्मदअली अंगरेज़ों की मांगें भी पूरी करता रहा और
यूरोपियन व्यापारियों का दिन पर दिन क़र्ज़दार भी होता चला
गया। कम्पनी के नौकरों के इन अत्याचारों से बचने का उसे कोई
उपाय न सूझता था।
ऐसी हालत में नौजवान मैकफ़रसन गवरनर जनरल होने से
बहुत दिनों पहले अरकाट पहुँचा। उसने नवाब मोहम्मदअली से
मिलकर उसे यह पट्टी पढ़ाई कि यदि आप मुझे अपनी ओर से
वकील बनाकर इंगलिस्तान भेज दें तो वहाँ के मन्त्रियों से कह कर
मैं आपकी सब शिकायतें दूर करा दूँ और क़र्ज़े माफ़ करा दूँ। भोले
नवाब ने मंज़ूर कर लिया। मैकफ़रसन उसका वकील बनकर सन्
१७६८ में इंगलिस्तान पहुँचा। इस चाल से मैकफ़रसन ने मोहम्मद
अली को खूब जी भर के लूटा। यहाँ तक कि उसने कई लाख
रुपए इंगलिस्तान के प्रधान मन्त्री तक को रिश्वत देना चाहा।
और जब प्रधान मन्त्री ने यह रिश्वत स्वीकार न की, तो मैकफ़रसन
ने उसे ७० लाख रुपए से ऊपर क़र्ज़ (?) के तौर पर देना चाहा।
किन्तु लिखा है कि प्रधान मन्त्री ने इसे भी मंज़ूर न किया।
करनाटक के नवाब की शिकायतें तो इंगलिस्तान में कौन सुनता
था और कहाँ दूर हो सकती थीं, किन्तु इन तरीक़ों से मैकफ़रसन
ने कम्पनी के डायरेक्टरों और इंगलिस्तान के मन्त्रियों पर अपना
ख़ूब असर जमा लिया। वह फिर कम्पनी की नौकरी में भारत भेजा
गया और तरक़्क़ी करके पहले कलकत्ते की कौंसिल का मेम्बर
और फिर मौक़ा मिलने पर गवरनर जनरल बना दिया गया।
सर जान मैकफ़रसन ३६७
इसके बाद मैकफ़रसन का नवाब करनाटक की मुसीबतों की ओर
कभी ध्यान भी न गया।
मैकफ़रसन केवल बीस महीने गवरनर जनरल रहा। इससे
पहले कम्पनी अपने भारतीय इलाक़ों के लिए
मैकफ़रसन के
कृत्य और चरित्र दिल्ली सम्राट शाहआलम को ख़िराज दिया करती
थी। इस ख़िराज के चार करोड़ रुपए अब
कम्पनी की ओर निकलते थे। माधोजी (महादजी) सींधिया ने
सम्राट की तरफ़ से यह रक़म तलब की, किन्तु मैकफ़रसन ने देने
से इनकार कर दिया। अवध के नवाब को मैकफ़रसन ने अपने से
पहले के गवरनर जनरल के समान खूब चूसा। मैकफ़रसन के बाद
उसके उत्तराधिकारी लॉर्ड कॉर्नवालिस ने ८ अगस्त सन् १७८६ को
कलकत्ते से इंगलिस्तान के भारत मन्त्री हेनरी डण्डाश के नाम एक
गुप्त पत्र लिखा, जिसमें कॉर्नवालिस ने मैकफ़रसन के "नाजायज़
तरीक़ों से कमाए हुए धन" उसकी "साफ़ चालबाज़ियों", उसके
"निर्लज्ज झूठों", उसकी "दुरंगी चालों और कमीनी साज़िशों"*
का जगह जगह ज़िक्र किया है।
भारत से लौटकर मैकफ़रसन पार्लिमेण्ट की मेम्बरी के लिए
खड़ा हुआ। चुनाव में वह जीत गया। बाद में साबित हुआ कि
वह रिश्वतें देकर जीता है और उसका चुनाव रद्द कर दिया गया।
- ". . . ill earned money . . . His flimsy cunning and shameless
falsehoods . . . his duplicity and low intrigues . . ."-Lord Cornwallis'
letter dated 8th August 1789 to the Rt. Hon'ble Henry Dundas concerning
Sir John Macpherson.