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भारत में अंग्रेजी राज (पण्डित सुन्दरलाल - ब्रिटिश औपनिवेशिक लूट व षड्यन्त्रों का प्रामाणिक इतिहास)

भारत में अंग्रेजी राज (पण्डित सुन्दरलाल - ब्रिटिश औपनिवेशिक लूट व षड्यन्त्रों का प्रामाणिक इतिहास)

Bharat Mein Angreji Raj by Pandit Sunderlal

पण्डित सुन्दरलाल (प्रस्तावना: महात्मा गाँधी) द्वारा

DevanagariHindipublished727 पृष्ठ

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हैदरअली ३५१
मैसूर के अंदर अपनी नई सत्ता को मज़बूत करने की ओर भी उसे
काफी ध्यान देना पड़ा। फिर भी उसने पहले
युद्ध का अंत बड़ी सफलता के साथ युद्ध जारी रक्खा और
अंगरेज़ी सेना को शिकस्त पर शिकस्त दी। यहाँ तक कि अंगरेज़ों
को चारों ओर "निर्बलता, निरुत्साह और नैराश्य"* के सिवा कुछ
दिखाई न देता था। अन्त में सन् १७८३ में अंगरेज़ों ने बड़ी नम्रता
के साथ टीपू से सुलह की प्रार्थना की। टीपू उनकी बातों में आ
गया। ११ मार्च सन् १७८४ को मङ्गलौर में टीपू सुलतान और
अंगरेज़ कम्पनी के बीच सन्धि होगई। अंगरेज़ों ने वादा किया कि
हम फिर कभी मैसूर के मामलों में दखल न देंगे, टीपू और उसके
उत्तराधिकारियों के साथ सदा मित्रता का व्यवहार रक्खेंगे और
उनके शत्रुओं के विरुद्ध सदा उन्हें सहायता देने के लिए तैयार
रहेंगे। इस वादे पर वीर, उदार, किन्तु नातजरुबेकार टीपू ने
अंगरेज़ों से जीता हुआ तमाम इलाक़ा उन्हें लौटा दिया। टीपू ने
निस्सन्देह एशियाई मर्यादा के अनुसार अपनी शाहाना आन क़ायम
रक्खी और अंगरेज़ों को काफ़ी नीचा दिखाया, किन्तु जो बात
हैदर और नाना चाहते थे वह पूरी न होसकी।
हैदरअली एक ग़रीब घर में पैदा हुआ था और एक मामूली
सिपाही से बढ़ते बढ़ते केवल अपनी वीरता और
हैदरअली योग्यता के बल एक विशाल राज का स्वामी बन
का बल गया। हैदरअली 'सुलतान हैदरअली शाह'

  • "Debility, dejection and despair."—Mill vol. iv. p. 222.