भारत में अंग्रेजी राज (पण्डित सुन्दरलाल - ब्रिटिश औपनिवेशिक लूट व षड्यन्त्रों का प्रामाणिक इतिहास)
Bharat Mein Angreji Raj by Pandit Sunderlal
पण्डित सुन्दरलाल (प्रस्तावना: महात्मा गाँधी) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंहैदरअली ३५५
हैदरअली अपने दरबार के अन्दर हिन्दू त्योहारों को बड़े
समारोह के साथ मनाया करता था। विशेषकर
हिन्दू त्योहार दशहरे के मौक़े पर उसके दरबार में दस दिन
तक लगातार जश्न रहता था, रोज़ शाम को आतिशबाज़ी छुटती
थी, साँडों, बारहसींगों, हाथियों और शेरों की लड़ाइयाँ होती थीं,
कुश्तियां होती थीं, दावतें होती थीं; इनाम और इकराम दिए
जाते थे, ग़रीबों को भोजन वस्त्र और धन बाँटा जाता था।
मज़हब के नाम पर किसी तरह के भी लड़ाई झगड़ों को वह
बड़ी नफ़रत की नज़र से देखता था। एक बार
शिया सुन्नी उसके राज में कहीं पर शिया और सुन्नियों में
झगड़ा हो गया। ज़बान से बढ़ते बढ़ते मामला ख़ञ्जर और भालों
तक पहुँच गया। हैदर के कानों तक ख़बर पहुँची, उसने दोनों
पक्ष के लोगों को अपने सामने बुलवाया और उनसे पूछा—"यह
क्या बेवक़ूफ़ी का झगड़ा है, और तुम लोग कुत्तों की तरह एक
दूसरे पर क्यों भौंकते हो ?" दोनों ने अपनी अपनी बात कह सुनाई,
मालूम हुआ कि झगड़ा केवल इस बात पर है कि हज़रत मोहम्मद
के कुछ उत्तराधिकारियों के विषय में शियों की एक राय है और
सुन्नियों की दूसरी। हैदरअली ने उनसे पूछा—"जिन व्यक्तियों के
बारे में तुम्हारा झगड़ा है क्या वे ज़िन्दा हैं?" जवाब मिला,
"नहीं।" इस पर हैदरअली ने उनसे कहा—"जो लोग मर चुके,
उनकी बाबत अब झगड़ा करना हिमाक़त है," और दोनों को
आगाह कर दिया कि—"अगर तुम लोग फिर कभी अपना और