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भारत में अंग्रेजी राज (पण्डित सुन्दरलाल - ब्रिटिश औपनिवेशिक लूट व षड्यन्त्रों का प्रामाणिक इतिहास)

Bharat Mein Angreji Raj by Pandit Sunderlal

पण्डित सुन्दरलाल (प्रस्तावना: महात्मा गाँधी) द्वारा

DevanagariHindipublished727 पृष्ठ

मीर क़ासिम १५५
"बिना महसूल दिए तिजारत की जाती थी और उसके जारी रखने में
बेहद ज़ुल्म किए जाते थे । × × × मीर क़ासिम के साथ लड़ाई की यही
उस समय वजह हुई ।"*
कम्पनी के डाइरेक्टरों तक ने ८ फ़रवरी सन् १७६४ के एक
पत्र में स्वीकार किया है कि "कम्पनी के नौकरों, गुमाश्तों, एजन्टों
और दूसरों की यह निजी तिजारत" "नाजायज़" थी, "दस्तक का
लज्जाजनक दुरुपयोग" थी, "हर तरह से अनधिकार युक्त" थी,
और नवाब और उसकी "क़ुदरती प्रजा" दोनों के साथ यह "दोहरा
अन्याय" था । किन्तु डाइरेक्टरों के इस पत्र के बाद भी इस
अन्याय में कोई कमी न पड़ी ।
उन सिपाहियों के ज़रिए, जो नवाब के पैसे से नियुक्त किए
गए थे, नवाब ही की प्रजा के ऊपर जिस जिस तरह के ज़ुल्म
किए जाते थे उनका कुछ अनुमान मीर क़ासिम के नाम बाकरगंज
के एक सरकारी कर्मचारी के २५ मई सन् १७६२ के पत्र से किया
जा सकता है । उसमें लिखा है :—

  • "... At this time many black merchants found it expedient to purchase
    the name of any young writer, in the Company's Service, by loans of money,
    and under this sanction harassed and oppressed the natives. So plentiful a
    supply was derived from this source that many young writers were enabled
    to spend £s, 1,500 and £s. 2,000 per annum, were clothed in fine linen, and
    fared sumptuously every day."

A trade was carried on without payment of duties, in the prosecution
of which infinite oppressions were committed. . . . This was the immediate
cause of the war with Mir Cassim."—Verelst's View of Bengal, pp. 8 and 46.

१५६ भारत में अंगरेज़ी राज
" x x x यह जगह पहले बड़ी तिजारत की जगह थी, किन्तु अब
नीचे लिखी काररवाइयों की वजह से बरबाद हो गई । कोई अंगरेज़ माल
ख़रीदने या बेचने के लिए यहाँ किसी गुमाश्ते को भेजता है फ़ौरन् वह गुमाश्ता
यह फ़र्ज़ कर लेता है कि यहाँ के किसी भी आदमी के हाथ ज़बरदस्ती अपना
माल बेचने या उसका माल ज़बरदस्ती ख़रीदने का मुझे पूरा अधिकार है
और यदि वह आदमी ख़रीदने या बेचने की सामर्थ्य न रखता हो और इनकार
करे तो फ़ौरन् या तो उस पर कोड़े बरसाए जाते हैं और या उसे क़ैद कर
लिया जाता है । यदि वह राज़ी हो जावे तब भी केवल इतना ही काफ़ी नहीं
समझा जाता, बल्कि एक दूसरी ज़बरदस्ती यह की जाती है कि अनेक चीज़ों
की तिजारत का ठेका अपने ही हाथों में ले लिया जाता है, यानी जिन जिन
चीज़ों की तिजारत अंगरेज़ करते हैं उनकी तिजारत किसी दूसरे को करने नहीं
दी जाती और न किसी दूसरे के पास से किसी को ख़रीदने दिया जाता है ।
x x x और फिर अंगरेज़ समझते हैं कि कम से कम जो हम कर सकते
हैं वह यह है कि दूसरा सौदागर जिस दाम पर कोई चीज़ ख़रीदता है, हम
उसी चीज़ को उससे बहुत कम दाम पर ख़रीदें । अक्सर ये लोग दाम देने से
इनकार कर देते हैं और मैं दखल देता हूँ तो फ़ौरन् मेरी शिकायत होती है ।”*
१८ वीं सदी के पिछले पचास साल में बंगाल भर के अन्दर
यह ज़बरदस्त ज़ुल्म सब जगह फैला हुआ था ।
[तिजारत के बहाने लूट] अब हम इंगलिस्तान के प्रसिद्ध नीतिज्ञ और वक्ता
एडमंड बर्क के कुछ वाक्य इसके विषय में देते
हैं। बर्क ने इंगलिस्तान की पार्लिमेण्ट के सामने कहा था :—

  • Vansittart's Narrative, vol. ii. p. 112.

मीर क़ासिम १५७
“तिजारत जो दुनिया के हर मुल्क को धनवान बनाती है, बंगाल
को सर्वनाश की ओर ले जा रही थी। इससे पहले, जब कि कम्पनी को देश
में कहीं भी हुकूमत करने का हक़ हासिल न था, अपने दस्तक या पास के
ऊपर उन्हें बड़े बड़े अधिकार मिले हुए थे, कम्पनी का माल बिना महसूल
दिए देश भर में आ जा सकता था। (धीरे धीरे) कम्पनी के नौकर अपनी
अपनी निजी तिजारत के लिए इस पास का उपयोग करने लगे। यह मामला
जब तक कि थोड़ा थोड़ा होता रहा, देश की सरकार ने कुछ हद तक इसे
गवारा कर लिया, किन्तु जब सभी लोग ऐसा करने लगे तब तिजारत की
जगह उसे डकैती कहना ज़्यादा ठीक मालूम होता था।
“ये व्यापारी हर जगह पहुँचते थे, अपने ही दामों पर माल बेचते थे
और दूसरे लोगों को ज़बरदस्ती मजबूर करके उनका माल अपने ही दामों पर
ख़रीदते थे। बिलकुल ऐसा मालूम होता था कि तिजारत के बहाने एक फ़ौज
लोगों को लूटने जा रही है। लोग अपनी देशी अदालतों से रक्षा की आशा
करते थे, किन्तु व्यर्थ। अंगरेज़ व्यापारियों की यह सेना जिधर जाती थी उधर
ही तातारी विजेताओं से बढ़कर लूट मार और बरबादी करती थी। × × ×
इस तरह इस अभागे देश पर दोहरा अन्याय जारी था, जिसकी भयंकर लूट
द्वारा देश चूर चूर हो रहा था।”*

  • "Commerce, which enriches every other country in the world, was
    bringing Bengal to total ruin. The Company, in former times, when it had
    no sovereignty or power in the country, had large privileges under their
    Dustuck or permit; their goods passed witout paying duties through the
    country. The servants of the Company made use of this dustuck for their
    own private trade, which, while it was used with moderation, the native
    Government winked at in some degree; but when it got wholly into private

१५८ भारत में अंगरेज़ी राज
सन्देह होने लगता है कि उन दिनों बंगाल में किसका राज
था। वास्तव में राज न मुग़ल सम्राट का था, न मुर्शिदाबाद के
सूबेदार का; राज था विदेशियों की कूट नीति, अराजकता और
इस देश के दुर्भाग्य का, और यह सब नतीजा था थोड़े से भारत-
वासियों की लज्जाजनक देशघातकता का। हम ऊपर कह चुके हैं कि
बर्धमान, मेदिनीपुर और चट्टग्राम की आमदनी से वे सब फ़ौजें
रक्खी गई थीं, जिनके हाथों बंगाल भर में यह भयंकर नादिरशाही
चलाई जा रही थी। सच यह है कि इसे नादिरशाही कहना भी
नादिरशाह के साथ अन्याय करना है। नादिरशाह यदि ग़ैर मुल्क
में पहुँच कर अपने सिपाहियों की शान क़ायम रखने के लिए
चन्द घड़ी के लिए क़त्लआम का हुकुम दे सकता था तो वह
अपनी एक आवाज़ पर अमन क़ायम करना भी जानता था और
क्षमा और उदारता की शक्ति भी उसमें अपार थी। वास्तव में
अठारवीं सदी के उत्तरार्ध में बंगाल के अंदर अंगरेज़ों के अत्याचारों
की तुलना संसार के इतिहास के किसी दूसरे पन्ने पर मिलना
कठिन है।
hands, it was more like robbery than trade. These traders appeared every
where; they sold at their own prices, and forced the people to sell to them
at their own prices also. It appeared more like an army going to pillage the
people, under pretence of commerce, than anything else. In vain the people
claimed the protection of their own Country Courts. This English army of
traders, intheir march, ravaged worse than a Tartarian Conqueror. . . .
Thus this miserable country was torn to pieces by the horrible rapaciousness
of a double tyranny."--Burke in his impeachment of Warren Hastings.

मीर क़ासिम १५६
बंगाल और बिहार भर में इस समय कम्पनी की कोठियाँ
फैली हुई थीं। नमक से लेकर इमारती लकड़ी
मीर क़ासिम की तक अनेक चीज़ों का सारा व्यापार अंगरेज़ों के
शिकायतें हाथों में आ गया था। किसानों की खड़ी खेती
कम्पनी के अंगरेज़ नौकर जिस भाव चाहे ख़रीद लेते थे। देश के
हज़ारों लाखों व्यापारियों की रोज़ी छिन चुकी थी और किसानों
की हालत इससे भी अधिक करुणाजनक थी। नवाब के मुलाज़िमों
के साथ कम्पनी के गुमाश्तों और एजन्टों के रोज़ाना जगह जगह
झगड़े होते रहते थे। कम्पनी के गुमाश्ते अनेक झूठी सच्ची शिकायतें
रोज़ाना कलकत्ते भेजते रहते थे और वहाँ से वही फ़ौजी सिपाही
नवाब के मुलाज़िमों या स्वाभिमानी प्रजा को दुरुस्त करने के लिए
जगह जगह भेज दिए जाते थे। नवाब की सरकारी चौकियों में
बंगाल भर के अंदर कहीं पर एक पाई महसूल की वसूली न होती
थी। मीर क़ासिम ने अनेक बार पत्रों द्वारा दर्दनाक शब्दों में
गवरनर वन्सीटार्ट से इन तमाम बातों की शिकायत की, किन्तु
इन शिकायतों और मीर क़ासिम के प्रयत्नों का ज़िक्र और आगे
चलकर किया जावेगा।
इस सब अपमान से बंगाल को सचमुच रक्षा करने और देश
को आइन्दा की आफ़तों से बचाने का केवल
राजा नन्दकुमार एक ही तरीक़ा हो सकता था। देश में उस
का देशप्रेम समय केवल एक ही शक्ति थी, जिसके झंडे के
नीचे और तमाम शक्तियों का मिलना मुमकिन हो सकता था। वह

१६० भारत में अंग्रेज़ी राज
शक्ति दिल्ली के मुग़ल सम्राट की रही सही शक्ति थी। उपाय केवल
यह था कि विदेशियों के मुक़ाबले के लिए दिल्ली सम्राट के झंडे
के नीचे देश की सारी हिन्दू और मुसलमान राज शक्तियों को
एकत्रित किया जावे और उनके सम्मिलित प्रयत्नों द्वारा विदेशियों
को बंगाल तथा भारत से निकाल कर बाहर कर दिया जावे।
यह एक आश्चर्य की बात है कि यह उपाय उस समय उसी
राजा नन्दकुमार को सूझा जिसने सन् १७५७ में अमींचन्द के धन
के लोभ में आकर अपने स्वामी सिराजुद्दौला, भारतीय प्रजा और
फ्रांसीसियों तीनों के साथ विश्वासघात किया था। मालूम होता है
नंदकुमार अब अपने देश को अंगरेज़ों के हाथों बिकते हुए देखकर
और प्रजा के ऊपर उनके अन्यायों को देखकर अपनी ग़लती पर
पछता रहा था। राजा नंदकुमार ने जी तोड़ प्रयत्न शुरू किए।
सम्राट शाह आलम अभी तक बिहार में था। सम्राट और मराठों
से उसने पत्र व्यवहार शुरू किया। उसकी कोशिशों से मराठों ने
मीर क़ासिम और अंगरेज़ों दोनों के ख़िलाफ़ सम्राट की ओर से
बंगाल पर हमला करने का वादा किया। वर्धमान, बीरभूम
और अन्य अनेक स्थानों के राजा और ज़मींदार इस काम के लिए
सम्राट के झंडे के नीचे आ आकर जमा होने लगे।
ये सब प्रयत्न अभी चल ही रहे थे, इतने में एक ऐसी घटना
हुई जिसका भारत के अंदर ब्रिटिश राज के क़ायम होने पर
बड़ा गहरा प्रभाव पड़ा, किन्तु जिसके इस गम्भीर प्रभाव पर
भारतीय इतिहास लेखकों ने अभी तक उचित ध्यान नहीं दिया।

मीर क़ासिम
१६१

यह घटना ६ जनवरी सन् १७६१ ई० की पानीपत की तीसरी
लड़ाई थी।
भारत का राजशासन उस समय ख़ासी बिगड़ी हुई हालत में
[हाशिया: मुग़ल साम्राज्य की] था। औरंगज़ेब की संकीर्ण नीति और उसके
[हाशिया: निर्बलता] अविश्वासी स्वभाव तथा बाद के दिल्ली के सम्राटों
की विलासप्रियता और अयोग्यता ने मुग़ल
साम्राज्य को अंग भंग और खोखला कर दिया था। अनेक छोटे
बड़े नरेशों के अलावा अवध के नवाब और दक्खिन के निज़ाम
अपने अपने सूबों के स्वच्छन्द शासक बन बैठे थे। बंगाल अभी तक
नाम मात्र को दिल्ली के अधीन था। किन्तु बंगाल से भी दिल्ली
ख़िराज जाना कई साल से बंद हो गया था, जिसकी वजह से शाह
आलम दूसरे को बिहार पर चढ़ाई करनी पड़ी थी। स्वयं राजधानी
के पास भरतपुर के जाट राजा और रामपुर के रुहेला नवाब दोनों
अपने अपने स्वाधीन राज क़ायम कर रहे थे। मराठों की शक्ति
दिनों दिन बढ़ती जा रही थी। दिल्ली के सम्राट अभी तक भारत के
सम्राट कहलाते थे, किन्तु बहुत दर्जे तक केवल नाम के लिए।
पच्छिम में सिन्ध और पंजाब के सूबे अफ़ग़ानिस्तान के शासक
अहमदशाह अब्दाली के अधीन हो चुके थे और पूरब में बंगाल
और बिहार दोनों के अंदर अंगरेज़ों की साज़िशें सफल हो रही थीं।
वास्तव में सारे भारत पर अपनी हुकूमत जमा लेने के लिए
उस समय अफ़ग़ानों, मराठों और अंगरेज़ों के बीच एक प्रकार का
तिकोनिया संग्राम जारी था, जिसमें अफ़ग़ान और मराठे अपने
११

१६२ भारत में अंगरेज़ी राज
युद्ध बल पर और अंगरेज़ अपनी कूटनीति के बल पर कामयाबी की
उम्मीद कर रहे थे। उस समय देश को इस विपज्जाल से निकालने
का केवल एक ही उपाय हो सकता था। वही उपाय राजा नन्दकुमार
को सूझा और ज़ाहिर है कि दिल्ली और पूना के कुछ नीतिज्ञ भी
नन्दकुमार के इस विचार से पूरी सहानुभूति रखते थे।
सम्राट आलमगीर दूसरे के समय में वज़ीर ग़ाज़ीउद्दीन ने
मराठों को सम्राट की सहायता के लिए दिल्ली
[पानीपत की तीसरी] बुलवाया। उस समय के पेशवा ने अपने भाई
[लड़ाई में मराठों] रघुनाथ राव ( राघोबा ) को सम्राट के आज्ञा
[का नेतृत्व] पालन के लिए एक बड़ी सेना सहित दिल्ली
भेजा। सम्राट और पेशवा के बीच प्रेम का सम्बन्ध क़ायम हो गया।
रघुनाथ राव ने अपनी सेना सहित और आगे बढ़कर अहमदशाह
अब्दाली के नायब के हाथों से पञ्जाब विजय कर लिया और एक
मराठा सरदार को दिल्ली सम्राट के अधीन वहाँ का सूबेदार नियुक्त
कर दिया। राघोबा दक्खिन लौट आया। मराठों की शक्ति इस
समय शिखर पर पहुँची हुई थी। किन्तु इस अन्तिम घटना ने उनके
विरुद्ध अहमदशाह अब्दाली का क्रोध भड़का दिया और सन् १७५९
ई० में एक ज़बरदस्त सेना लेकर वह पंजाब पर फिर से अपना राज
क़ायम करने और मराठों का विध्वन्स करने के लिए अफ़ग़ानिस्तान
से निकल पड़ा।
सदाशिव भाऊ २० हज़ार सवार, १० हज़ार पैदल और तोप
ख़ाना लेकर अहमदशाह के मुक़ाबले के लिए पूना से रवाना हुआ।

[Page Header]
मीर क़ासिम १६३

पेशवा का पुत्र विश्वासराव भी सदाशिव के साथ था। मार्ग में
होलकर और सींधिया की सेनाएँ सदाशिव से आ मिलीं। राजपूत
राजाओं ने सहायता के लिये अपने सवार भेजे। भरतपुर का जाट
राजा ३०,००० सेना लेकर स्वयं सदाशिव से आ मिला। साम्राज्य
की राजधानी दिल्ली में सदाशिव का खूब स्वागत हुआ। अवध का
नवाब शुजाउद्दौला अपनी सेना और सम्राट की सेना दोनों को
लेकर सदाशिव की मदद के लिये तैयार हो गया। एक बार मालूम
होता था कि भारत के सब हिन्दू और मुसलमान विदेशियों से
अपने देश की रक्षा करने के लिए कमर कसके मैदान में उतर आए।
किन्तु सदाशिव भाऊ उस ऐन परीक्षा के समय सच्चा नीतिज्ञ
[पार्श्व टिप्पणी: मराठा सेनापति की] साबित न हो सका। गर्व ने उसकी दूरदर्शिता
[पार्श्व टिप्पणी: अदूरदर्शिता और] पर परदा डाल दिया। मार्ग में ही उसने कई
मराठा सरदारों को अपने अनुचित व्यवहार से
[पार्श्व टिप्पणी: पराजय] नाराज़ कर लिया। राजा भरतपुर को भी वह
सन्तुष्ट न रख सका। दिल्ली के अंदर उसका बर्त्ताव और भी बुरा
रहा। क़िले में घुसते ही बहुत सा शाही सामान उसने अपने क़ब्ज़े
में कर लिया। दीवान ख़ास की सुन्दर क़ीमती चाँदी की छत को
उखड़वा कर और गलवा कर उसने उससे १७ लाख रुपये ढलवा
लिए। यह भी कहा जाता है कि वह इस समय विश्वासराव को
दिल्ली के तख़्त पर बैठाना चाहता था। सदाशिव भाऊ की इस
संकीर्ण और घातक नीति का नतीजा यह हुआ कि उसके मुसलमान
मित्रों के दिल उसकी ओर से फिर गए। अवध का नवाब वज़ीर

१६४ भारत में अंगरेज़ी राज
उसकी ओर से सशंक हो गया और जिस उत्साह के साथ वह
आक्रामक अहमदशाह के विरुद्ध मराठों की सहायता करना चाहता
था, न कर सका।
६ जनवरी सन् १७६१ को पानीपत के ऐतिहासिक मैदान में
एक अत्यन्त घमासान संग्राम हुआ, जिसमें दोनों ओर के हताहतों
की संख्या लाखों तक पहुँच गई। ऐन मौक़े पर सदाशिव के व्यवहार
से बेज़ार होकर भरतपुर का राजा अपनी सेना सहित मैदान से
हट गया। होलकर तटस्थ रहा। सदाशिव और विश्वासराव
दोनों मैदान में काम आए। विजय अहमदशाह की ओर रही।
नवाब शुजाउद्दौला ने मजबूर होकर विजयी अहमदशाह के साथ
मेल कर लिया। किन्तु अहमदशाह को भी अपनी इस विजय की
बहुत ज़बरदस्त क़ीमत देनी पड़ी। उसके इतने अधिक आदमी
लड़ाई में काम आए और घायल हुए कि आगे बढ़ने का इरादा छोड़
कर उसे फ़ौरन अफ़ग़ानिस्तान लौट जाना पड़ा। लौटने से पहले
उसने शाहआलम दूसरे को भारत का सम्राट स्वीकार किया और
ग़ाज़ीउद्दीन को हटाकर उसकी जगह नवाब शुजाउद्दौला को दिल्ली
की सल्तनत का वज़ीर क़रार दिया। निस्सन्देह सदाशिव राव की
संकीर्णता और अदूरदर्शिता की वजह से पानीपत के मैदान में मराठों
की बढ़ती हुई शक्ति चकनाचूर हो गई और उसके साथ ही साथ
दिल्ली के साम्राज्य और भारत की राष्ट्रीय स्वाधीनता दोनों की
—आशाएँ कुछ समय के लिए ख़ाक में मिल गईं।
प्रोफ़ेसर सिडनी ओवन ने सच कहा है :—

मीर क़ासिम १६५
"कहा जा सकता है कि पानीपत की लड़ाई के साथ साथ भारतीय
इतिहास का भारतीय युग समाप्त हो गया। इतिहास के पढ़ने वाले को इसके
बाद से दूरवर्ती पच्छिम से आए हुए व्यापारी शासकों की उन्नति से ही
सरोकार रह जाता है। "✡
निस्सन्देह जिस तिकोनिया संग्राम का हम ऊपर ज़िक्र कर चुके
पानीपत का परिणाम हैं, उसकी तीन शक्तियों में से अफ़ग़ानों को अब
और आगे बढ़कर दिल्ली सम्राट के निर्बल हाथों
से भारतीय साम्राज्य की बाग छीनने का साहस
न हो सकता था। मराठों की कमर टूट चुकी थी और वे अंगरेज़ों
के बढ़ते हुए प्रभाव को रोकने के लिए अब बंगाल तक पहुँचने के
नाक़ाबिल थे। इस तरह नन्दकुमार और उसके साथियों की
आशाओं पर पानीपत ने पानी फेर दिया।
एक अंगरेज़ लेखक साफ़ लिखता है :—
"पानीपत की लड़ाई से मराठा संघ को जो थोड़ी देर के लिए धक्का
पहुँचा उसकी वजह से मराठे बंगाल पर हमला करने से रुक गए। इस हमले
में शायद शुजाउद्दौला और शाह आलम मराठों के साथ मिल जाते और
मुमकिन है कि ये लोग अंगरेज़ कम्पनी की उस सत्ता को, जो अभी उस
समय तक कमज़ोर थी और अनेक कठिनाइयों से घिरी हुई थी, सफलता के
साथ उखाड़ कर फेंक देते।"†

  • "With the battle of Panipat, the native period of Indian History may
    be said to end. Henceforth the interest gathers round the progress of the
    Merchant Princes from the far west."—India on the Eve of the British
    Conquest, by Professor Sydney Owen.
    † H. G. Keene's Madhava Rao Scindhia, p. 46.

१६६ भारत में अंगरेज़ी राज
इसके बाद केवल अंगरेज़ बाक़ी रह गए और विविध सूबों के
निर्बल तथा अदूरदर्शी शासकों को एक दूसरे से तोड़ फोड़ कर
अपने लिए अनन्य राजनैतिक प्रभुत्व का मार्ग बना लेना अब उनके
लिए काफ़ी सरल हो गया।
अब हम पानीपत से हट कर फिर अपने असली इतिहास की
[शाह आलम और] ओर आते हैं। सम्राट शाहआलम दूसरा अभी
[अंगरेज़] तक बिहार प्रान्त में था। सितम्बर सन् १७६० ही
में अंगरेज़ शाहआलम को अपनी ओर फोड़ने का
निश्चय कर चुके थे। बंगाल, बिहार और उड़ीसा के अनेक ज़मींदार
जो नई बग़ावत के ख़िलाफ़ थे, सम्राट के झंडे के नीचे जमा हो
रहे थे। अंगरेज़ों ने अब जिस तरह हो बिहार पहुँच कर सम्राट से
मामला तय कर लेना ज़रूरी समझा। करनल केलो की जगह मेजर
कारनक बंगाल की सेनाओं का प्रधान सेनापति था। जनवरी सन्
१७६१ में कारनक पटने पहुँचा। कम्पनी की सेना के अलावा राम
नारायन की सेना और मुर्शिदाबाद की सेनाएँ भी कारनक के साथ
थीं। गया मौनपुर के पास सम्राट की सेना और इन सेनाओं का
आमना सामना हुआ, अन्त में समझौते की बातचीत होने लगी।
सम्राट शाहआलम कारनक को साथ लेकर पटना आया। मीर
क़ासिम पटने में मौजूद था। मीर क़ासिम ने हाज़िर होकर पिछले
खिराज के बदले में एक बहुत बड़ी नक़द रक़म सम्राट की भेंट की
और अपने यहाँ की सरकारी टकसाल में शाहआलम दूसरे के नाम
के सिक्के ढलवाने का वादा किया। यही वादा कलकत्ते की टक-

मीर क़ासिम १६७
साल के बारे में अंगरेज़ों ने किया। मीर क़ासिम ने तीनों प्रान्तों
की आमदनी में से २४ लाख रुपए सालाना दिल्ली सम्राट की सेवा
में भेजने का वचन दिया। सम्राट ने मार्च सन् १७६१ में तीनों
प्रान्तों की सूबेदारी का परवाना बाज़ाब्ता मीर क़ासिम के नाम
जारी कर दिया। अंगरेज़ों का असली मतलब पूरा हो गया।
उन्होंने इस अवसर पर एक कोशिश यह भी की कि जिस तरह
मीर क़ासिम को शाही परवाना अता हुआ, उसी तरह जो इलाक़े
अंगरेज़ कम्पनी के पास थे उनके लिए कम्पनी को अलग सूबेदारी
का परवाना मिल जावे; किन्तु शाहआलम ने इसे मंज़ूर न किया।
एक और प्रार्थना इस समय अंगरेज़ों ने शाहआलम से यह की कि
सूबेदार मीर क़ासिम को रहने दिया जावे, किन्तु तीनों प्रान्तों की
दीवानी के अधिकार सूबेदार से लेकर कम्पनी को दे दिए जावें।
इस दीवानी का मतलब यह था कि अंगरेज़ सूबेदार के मातहत
तीनों प्रान्तों से सरकारी मालगुज़ारी वसूल करके उसका हिसाब
सम्राट और सूबेदार दोनों को दे दें और वसूली का ख़र्च निकाल कर
बाक़ी सब रुपया सूबेदार के सुपुर्द कर दें। इस धन से सरकारी
फ़ौजें रखना, अपने प्रान्तों के शासन का बाक़ी सारा काम चलाना
और सम्राट को सालाना खिराज भेजना सूबेदार का काम
रह जाय।
शाहआलम इस समय दिल्ली लौटने के लिए उत्सुक था। राज-
धानी के अन्दर सिंहासन के लिए किसी दूसरे हक़दार के खड़े हो
जाने का भी डर था। सम्राट ने चाहा कि अंगरेज़ अपनी सेना

१६८ भारत में अंगरेज़ी राज
सहित मेरे साथ दिल्ली चलें। इसके बदले में वह कम्पनी को तीनों
प्रान्तों का दीवान बना देने के लिए भी तैयार था। किन्तु अंगरेज़ों
के पास उस समय इस काम के लिए काफ़ी फ़ौज न थी। बंगाल के
अन्दर भी वे अपने अनेक शत्रु पैदा कर चुके थे। इसलिए वे सम्राट
की इस इच्छा से उस समय लाभ न उठा सके और जून सन्
१७६१ में सम्राट शाहआलम पटने से दिल्ली की ओर लौट गया।
अब अंगरेज़ों को मराठों का डर न रहा था। शाहआलम
से किसी तरह निपटारा हो गया। बंगाल का
अंगरेज़ों का राजा मैदान फिर कम्पनी के मुलाज़िमों की लूट और
रामनारायण से ज़बरदस्तियों के लिए ख़ाली हो गया। इस बार
विश्वासघात उनका पहला वार राजा रामनारायण पर हुआ।
अंगरेज़ों ही के बयान के अनुसार रामनारायण एक अत्यन्त योग्य
शासक था। वह बहुत धनवान भी मशहूर था और शुरू से अंगरेज़ों
का “पका हितसाधक” रह चुका था। किन्तु अब मीर क़ासिम और
अंगरेज़ दोनों को रुपए की ज़रूरत थी। अपनी सेना के हाथों लोगों
को पकड़वा पकड़वा कर मीर क़ासिम के सामने पेश करना और
उनसे रक़में वसूल करना अंगरेज़ों का इस समय एक ख़ास पेशा था।
यह इलज़ाम लगाकर कि रामनारायण के ज़िम्मे सूबेदार की बक़ाया
निकलती है, गवरनर वन्सीटार्ट ने रामनारायण को छल से गिरफ़्तार
कर मीर क़ासिम के हवाले कर दिया। इसके कुछ ही समय पहले
वन्सीटार्ट ने कारनक को लिखा था कि तुम्हें नवाब के हर तरह के
अन्यायों से रामनारायण की रक्षा करनी चाहिए। कारनक ने सन्

मीर क़ासिम १६६
१७७२ में पार्लिमेण्ट की सिलेक्ट कमेटी के सामने गवाही देते हुए
कहा था कि राजा रामनारायण पर बक़ाया का इलज़ाम “बे बुनि-
याद” था। निस्सन्देह वन्सीटॉर्ट और उसके साथियों का यह
कार्य बिलकुल निस्स्वार्थ न था। १७ जुलाई सन् १७६१ को करनल
कूट ने गवरनर और कौन्सिल के नाम एक पत्र भेजा, जिसमें साफ़
लिखा है कि मीर क़ासिम इस काम के लिए साढ़े सात लाख रुपए
रिशवत देने को तैयार है। गवरनर वन्सीटॉर्ट के इस काम की
निन्दा करते हुए इतिहास लेखक मिल लिखता है :—
“मिस्टर वन्सीटॉर्ट के शासन की यह घातक भूल थी, क्योंकि इसकी
वजह से ऊँचे दरजे के हिन्दोस्तानियों के दिलों से यह निश्वास बिलकुल उठ
गया कि अंगरेज़ कभी उनकी रक्षा करेंगे। इस मामले में जिस घोर अन्याय
का मि० वन्सीटॉर्ट ने साथ दिया, उससे लोगों की यह राय होगई कि वन्सी-
टॉर्ट अपनी कमज़ोरी से या रिशवत लेकर किसी भी पक्ष का समर्थन करने
को तैयार हो सकता है। x x x ”*
मुर्शिदाबाद में निर्दोष रामनारायण को हथकड़ियां डालकर
रक्खा गया, उससे खूब धन वसूल किया गया और पटने में उसकी
जगह दूसरा नायब नियुक्त कर दिया गया।
मीर क़ासिम मामूली चरित्र का मनुष्य न था। मीर जाफ़र

  • "This was the fatal error of Mr. Vansittart's administration; because
    it extinguished among the natives of rank all confidence in the English
    protection; and because the enormity to which, in this instance, he had lent
    his support, created an opinion of a weak or a corrupt partiality. . . ."—
    Mill, vol. iii. p. 224.

१७० भारत में अंगरेज़ी राज
में और उसमें बड़ा अन्तर था। मीर जाफ़र अयोग्य, निर्बल,
स्वार्थी, अदूरदर्शी और भीरु था। इसके विपरीत
[मीर क़ासिम का] मीर क़ासिम की योग्यता, उसके बल, अपनी
[चरित्र और शासन] प्रजा के लिए उसकी हित चिन्ता, उसकी दूर-
दर्शिता, उसकी वीरता और शासक की हैसियत से उसकी कार्य
कुशलता की क़रीब क़रीब सब इतिहास लेखकों ने मुक्तकण्ठ से प्रशंसा
की है। इतिहास लेखक कर्नल मालेसन जगह जगह लिखता है कि
मीर क़ासिम "अत्यन्त योग्य और व्यवहार कुशल मनुष्य था......
अपने इरादों में लोहे की तरह दृढ़ रहता था, हर बात को ठीक ठीक
समझ कर उसका जल्दी से फ़ैसला कर सकता था, उसके विचार उदार
थे......उसका दिमाग़ साफ़ था और उसका चरित्र मज़बूत था।*"
एक दूसरा अंगरेज़ इतिहास लेखक लिखता है—"मीर क़ासिम
के अन्दर एक सिपाही की वीरता और एक राजनीतिज्ञ की दूर-
दर्शिता दोनों मौजूद थीं।”† कर्नल मालेसन लिखता है कि मीर
क़ासिम को मीर जाफ़र के साथ देशघातकों की पंक्ति में रखना
मीर क़ासिम के साथ अन्याय करना है। वह यह भी लिखता है कि
मीर क़ासिम का इरादा मीर जाफ़र के साथ विश्वासघात करने का
न था। मीर क़ासिम ने अपने बूढ़े श्वसुर मीर जाफ़र की निर्बलता,
* "... a man of great tact and ability . . . of iron will,
quick decision, large views . . . of clear head and strong character."--
The Decisive Battles of India, by Colonel Malleson, pp. 127, 145.
† "He united the gallantry of the soldier with the sagacity of the
statesman."--Transactions in India from 1757 to 1784.

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मीर क़ासिम १७१

कायरता और अयोग्यता को अच्छी तरह महसूस कर लिया था।
उसकी आत्मा यह देखकर दुखी थी कि बंगाल का सूबेदार
विदेशियों के हाथों की केवल एक कठपुतली रह गया था। इसीलिए
मीर क़ासिम ने जिस तरह हो सके, सूबेदार की सत्ता को फिर से
क़ायम करने का संकल्प किया।* मीर क़ासिम और अंगरेज़ों में जो
गुप्त समझौता हुआ था वह केवल मीर क़ासिम को मीर जाफ़र का
प्रधान मन्त्री बनाने का हुआ था और मीर क़ासिम को आशा थी
कि प्रधान मंत्री की हैसियत से मैं सूबेदारी की सत्ता को फिर से
क़ायम कर सकूँगा। किन्तु जब एक बार यह सब मामला निर्बल
और सशङ्क मीर जाफ़र पर प्रकट कर दिया गया और मीर जाफ़र को
मीर क़ासिम पर भरोसा न हो सका, तो फिर मीर क़ासिम के लिए
पीछे हट सकना नामुमकिन हो गया था। इसमें भी शक नहीं कि
मीर क़ासिम ने मसनद पर बैठते ही बंगाल की हालत को सुधारने
की जी तोड़ कोशिश की और इस कोशिश में उसे एक दरजे तक
आश्चर्यजनक सफलता मिली।
माल और ख़ज़ाने के महकमों में उसने कई सुधार किए। सन्
१७६२ तक उसने न केवल अपनी फ़ौज की
[साइड-नोट: मीर क़ासिम के सुधार] तमाम पिछली तनख़ाहों को अदा कर दिया और
अंगरेज़ों की एक एक पाई चुकता कर दी, बल्कि
शासन का इतना सुन्दर प्रबन्ध किया कि सूबेदारी की आमदनी
सालाना ख़र्च से बढ़ गई। अंगरेज़ों पर उसे शुरू से ही विश्वास


* The Decisive Battles of India, p. 128.

१७२ भारत में अंग्रेज़ी राज
न था, इस पर भी उसने अंगरेज़ों के साथ अपने वचन का पूरी
तरह पालन किया। मुर्शिदाबाद की राजधानी में विदेशियों का
प्रभाव अधिक बढ़ गया था। इसलिए मीर क़ासिम ने मुंगेर को
अपनी नई राजधानी बनाया। उसने अधिकतर मुंगेर ही में रहना
शुरू कर दिया। मुंगेर की उसने बड़ी सुन्दर और मज़बूत क़िलेबंदी
की। क़रीब चालीस हज़ार फ़ौज वहाँ जमा की। उस फ़ौज को
यूरोपियन ढंग के अस्त्रों की शिक्षा देने के लिए अपने यहाँ कई
योग्य यूरोपियन नौकर रक्खे। एक बहुत बड़ा नया कारख़ाना
तोपें ढालने का उसने क़ायम किया। जिसकी तोपों के विषय में कहा
जाता है कि उस समय की यूरोप की बनी हुई तोपों से हर तरह
बढ़कर थीं। मीर क़ासिम की सारी प्रजा उससे अत्यन्त संतुष्ट थी
और उससे प्रेम करती थी।
किन्तु ज्योंही मीर क़ासिम और उसकी प्रजा के थोड़ा बहुत
[पार्श्व-शीर्षक: मीर क़ासिम के] पनपने का समय आया, त्योंही मीर क़ासिम को
[ख़िलाफ़ अंगरेज़ों] भी मसनद से उतारने की तैयारियाँ शुरू हो
[की साज़िश] गईं। कर्नल मॉलेसन साफ़ लिखता है कि मीर
क़ासिम ने अंगरेज़ों के साथ अपने सब वादे पूरे
कर दिए, “किन्तु लालची अंगरेज़ों को अपनी धन पिपासा के
शान्त करने का सब से अच्छा उपाय यही दिखाई दिया कि मीर
क़ासिम को नाश करके उसके उत्तराधिकारी के साथ नए सिरे से
सौदा किया जावे।”*

  • “Mir Kassim performed his covenant. But . . . . . men greedy of

मीर क़ासिम १७३
जिस तरह मीर जाफ़र के ख़िलाफ़ अंगरेज़ों ने मीर क़ासिम को
अपनी साज़िशों का केन्द्र बनाया था, उसी तरह अब उलट कर मीर
क़ासिम के ख़िलाफ़ बूढ़े मीर जाफ़र को इन नई साज़िशों का केन्द्र
बनाया गया । मीर क़ासिम के विरुद्ध सामग्री तैयार करने के लिए
कलकत्ते की सिलेक्ट कमेटी के कुछ मेम्बरों ने ११ मार्च सन् १७६२
को कम्पनी के डाइरेक्टरों के नाम एक लम्बा पत्र भेजा, जिसमें
उन्होंने मीर क़ासिम और उसके चरित्र पर अनेक झूठे सच्चे दोष
लगाए, मीर जाफ़र की खूब तारीफें कीं, यह स्वीकार किया कि
मीर जाफ़र के चरित्र पर इससे पहले जो दोष लगाए जा चुके थे
वे सब झूठे थे और मीर जाफ़र को मसनद से उतारना एक भूल
और अन्याय था, और लिखा :—
"जब से वह (मीर क़ासिम) सूबेदार बना है, तब से उसके ज़ुल्मों
और लूट खसोट की बेशुमार मिसालें हम आपको दे सकते हैं । किन्तु उससे
यह पत्र बेहद लम्बा हो जायगा x x x। हम केवल एक रामनारायन का
हाल खास तौर पर देते हैं, जिसे मीर क़ासिम ने पटने की नायबी से अलग कर
दिया । यह बात मानी हुई है कि रामनारायन अपने वचन का सच्चा है, इसी
लिए उसकी नायबी का समर्थन करना हम सदा अपने लिए हितकर समझते
रहे । मीर क़ासिम आजकल रामनारायन को हथकड़ी डालकर रक्खे हुए है
और उस समय तक रक्खेगा जब तक कि वह उससे हद दर्जे धन न चूस ले ।
gain, deeming that the shortest road to their end lay in compassing
the ruin of Mir Kassim, in order to make a market of his successor."—The
Decisive Battles of India, p. 134.

१७४ भारत में अंगरेज़ी राज
इसके बाद कोई सन्देह नहीं कि रामनारायण का काम तमाम कर दिया
जायगा । जिन जिन लोगों ने अंगरेज़ों का साथ दिया था, उनमें से सब नहीं
तो अधिकांश से मीरक़ासिम भारी भारी रक़में वसूल कर चुका है। रुपए
वसूल करने के लिए जो जो तकलीफ़ें उन्हें दी गई हैं, उनसे कई मर चुके ।
बहुतों को या तो कमीनेपन के साथ क़त्ल कर दिया गया और या
(जो हिन्दोस्तानियों में अक्सर होता है) बेइज़्ज़ती से बचने के लिए उन्होंने
स्वयं आत्महत्या कर ली × × × ।”
मीर क़ासिम के चरित्र को कलङ्कित करने में अब इन लोगों ने
कोई कसर उठा न रक्खी । अंगरेज़ों को रुपए
मीर क़ासिम पर देने के लिये ही मीर क़ासिम को अपने अनेक
झूठे इलज़ाम आश्रितों पर ज़ुल्म करने पड़े। इतिहास से
ज़ाहिर है कि ख़ुद अंगरेज़ ही इस तरह के अनेक अभागों को ला
लाकर मीर क़ासिम के हवाले करते थे। अंगरेज़ों ही ने साढ़े
सात लाख रुपए या कुछ अधिक के बदले में अपने सच्चे मित्र
निर्दोष रामनारायण को छल से पकड़ कर मीर क़ासिम के हाथों में
दिया और अब अंगरेज़ ही मीर क़ासिम को इन सब अन्यायों के
लिए ज़िम्मेदार ठहराते थे।
एक इलज़ाम मीर क़ासिम पर यह भी था कि वह अपनी फ़ौज
बढ़ा रहा था, उन्हें यूरोपियन ढङ्ग की क़वायद और यूरोपियन
शस्त्रों का इस्तेमाल सिखा रहा था और नई क़िलेबन्दियाँ करा
रहा था (!) ।
इसी पत्र में इन लोगों ने लिखा कि मीर जाफ़र के चरित्र के