भारत में अंग्रेजी राज (पण्डित सुन्दरलाल - ब्रिटिश औपनिवेशिक लूट व षड्यन्त्रों का प्रामाणिक इतिहास)
Bharat Mein Angreji Raj by Pandit Sunderlal
पण्डित सुन्दरलाल (प्रस्तावना: महात्मा गाँधी) द्वारा
पृष्ठ 421, कुल 727 में से
संदर्भ में पढ़ेंमीर क़ासिम १६६
१७७२ में पार्लिमेण्ट की सिलेक्ट कमेटी के सामने गवाही देते हुए
कहा था कि राजा रामनारायण पर बक़ाया का इलज़ाम “बे बुनि-
याद” था। निस्सन्देह वन्सीटॉर्ट और उसके साथियों का यह
कार्य बिलकुल निस्स्वार्थ न था। १७ जुलाई सन् १७६१ को करनल
कूट ने गवरनर और कौन्सिल के नाम एक पत्र भेजा, जिसमें साफ़
लिखा है कि मीर क़ासिम इस काम के लिए साढ़े सात लाख रुपए
रिशवत देने को तैयार है। गवरनर वन्सीटॉर्ट के इस काम की
निन्दा करते हुए इतिहास लेखक मिल लिखता है :—
“मिस्टर वन्सीटॉर्ट के शासन की यह घातक भूल थी, क्योंकि इसकी
वजह से ऊँचे दरजे के हिन्दोस्तानियों के दिलों से यह निश्वास बिलकुल उठ
गया कि अंगरेज़ कभी उनकी रक्षा करेंगे। इस मामले में जिस घोर अन्याय
का मि० वन्सीटॉर्ट ने साथ दिया, उससे लोगों की यह राय होगई कि वन्सी-
टॉर्ट अपनी कमज़ोरी से या रिशवत लेकर किसी भी पक्ष का समर्थन करने
को तैयार हो सकता है। x x x ”*
मुर्शिदाबाद में निर्दोष रामनारायण को हथकड़ियां डालकर
रक्खा गया, उससे खूब धन वसूल किया गया और पटने में उसकी
जगह दूसरा नायब नियुक्त कर दिया गया।
मीर क़ासिम मामूली चरित्र का मनुष्य न था। मीर जाफ़र
- "This was the fatal error of Mr. Vansittart's administration; because
it extinguished among the natives of rank all confidence in the English
protection; and because the enormity to which, in this instance, he had lent
his support, created an opinion of a weak or a corrupt partiality. . . ."—
Mill, vol. iii. p. 224.