भारत में अंग्रेजी राज (पण्डित सुन्दरलाल - ब्रिटिश औपनिवेशिक लूट व षड्यन्त्रों का प्रामाणिक इतिहास)
Bharat Mein Angreji Raj by Pandit Sunderlal
पण्डित सुन्दरलाल (प्रस्तावना: महात्मा गाँधी) द्वारा
पृष्ठ 407, कुल 727 में से
संदर्भ में पढ़ेंमीर क़ासिम १५५
"बिना महसूल दिए तिजारत की जाती थी और उसके जारी रखने में
बेहद ज़ुल्म किए जाते थे । × × × मीर क़ासिम के साथ लड़ाई की यही
उस समय वजह हुई ।"*
कम्पनी के डाइरेक्टरों तक ने ८ फ़रवरी सन् १७६४ के एक
पत्र में स्वीकार किया है कि "कम्पनी के नौकरों, गुमाश्तों, एजन्टों
और दूसरों की यह निजी तिजारत" "नाजायज़" थी, "दस्तक का
लज्जाजनक दुरुपयोग" थी, "हर तरह से अनधिकार युक्त" थी,
और नवाब और उसकी "क़ुदरती प्रजा" दोनों के साथ यह "दोहरा
अन्याय" था । किन्तु डाइरेक्टरों के इस पत्र के बाद भी इस
अन्याय में कोई कमी न पड़ी ।
उन सिपाहियों के ज़रिए, जो नवाब के पैसे से नियुक्त किए
गए थे, नवाब ही की प्रजा के ऊपर जिस जिस तरह के ज़ुल्म
किए जाते थे उनका कुछ अनुमान मीर क़ासिम के नाम बाकरगंज
के एक सरकारी कर्मचारी के २५ मई सन् १७६२ के पत्र से किया
जा सकता है । उसमें लिखा है :—
- "... At this time many black merchants found it expedient to purchase
the name of any young writer, in the Company's Service, by loans of money,
and under this sanction harassed and oppressed the natives. So plentiful a
supply was derived from this source that many young writers were enabled
to spend £s, 1,500 and £s. 2,000 per annum, were clothed in fine linen, and
fared sumptuously every day."
A trade was carried on without payment of duties, in the prosecution
of which infinite oppressions were committed. . . . This was the immediate
cause of the war with Mir Cassim."—Verelst's View of Bengal, pp. 8 and 46.