भारत में अंग्रेजी राज (पण्डित सुन्दरलाल - ब्रिटिश औपनिवेशिक लूट व षड्यन्त्रों का प्रामाणिक इतिहास)
Bharat Mein Angreji Raj by Pandit Sunderlal
पण्डित सुन्दरलाल (प्रस्तावना: महात्मा गाँधी) द्वारा
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मीर क़ासिम १७१
कायरता और अयोग्यता को अच्छी तरह महसूस कर लिया था।
उसकी आत्मा यह देखकर दुखी थी कि बंगाल का सूबेदार
विदेशियों के हाथों की केवल एक कठपुतली रह गया था। इसीलिए
मीर क़ासिम ने जिस तरह हो सके, सूबेदार की सत्ता को फिर से
क़ायम करने का संकल्प किया।* मीर क़ासिम और अंगरेज़ों में जो
गुप्त समझौता हुआ था वह केवल मीर क़ासिम को मीर जाफ़र का
प्रधान मन्त्री बनाने का हुआ था और मीर क़ासिम को आशा थी
कि प्रधान मंत्री की हैसियत से मैं सूबेदारी की सत्ता को फिर से
क़ायम कर सकूँगा। किन्तु जब एक बार यह सब मामला निर्बल
और सशङ्क मीर जाफ़र पर प्रकट कर दिया गया और मीर जाफ़र को
मीर क़ासिम पर भरोसा न हो सका, तो फिर मीर क़ासिम के लिए
पीछे हट सकना नामुमकिन हो गया था। इसमें भी शक नहीं कि
मीर क़ासिम ने मसनद पर बैठते ही बंगाल की हालत को सुधारने
की जी तोड़ कोशिश की और इस कोशिश में उसे एक दरजे तक
आश्चर्यजनक सफलता मिली।
माल और ख़ज़ाने के महकमों में उसने कई सुधार किए। सन्
१७६२ तक उसने न केवल अपनी फ़ौज की
[साइड-नोट: मीर क़ासिम के सुधार] तमाम पिछली तनख़ाहों को अदा कर दिया और
अंगरेज़ों की एक एक पाई चुकता कर दी, बल्कि
शासन का इतना सुन्दर प्रबन्ध किया कि सूबेदारी की आमदनी
सालाना ख़र्च से बढ़ गई। अंगरेज़ों पर उसे शुरू से ही विश्वास
* The Decisive Battles of India, p. 128.