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भारत में अंग्रेजी राज (पण्डित सुन्दरलाल - ब्रिटिश औपनिवेशिक लूट व षड्यन्त्रों का प्रामाणिक इतिहास)

भारत में अंग्रेजी राज (पण्डित सुन्दरलाल - ब्रिटिश औपनिवेशिक लूट व षड्यन्त्रों का प्रामाणिक इतिहास)

Bharat Mein Angreji Raj by Pandit Sunderlal

पण्डित सुन्दरलाल (प्रस्तावना: महात्मा गाँधी) द्वारा

DevanagariHindipublished727 पृष्ठ

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मीर क़ासिम
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यह घटना ६ जनवरी सन् १७६१ ई० की पानीपत की तीसरी
लड़ाई थी।
भारत का राजशासन उस समय ख़ासी बिगड़ी हुई हालत में
[हाशिया: मुग़ल साम्राज्य की] था। औरंगज़ेब की संकीर्ण नीति और उसके
[हाशिया: निर्बलता] अविश्वासी स्वभाव तथा बाद के दिल्ली के सम्राटों
की विलासप्रियता और अयोग्यता ने मुग़ल
साम्राज्य को अंग भंग और खोखला कर दिया था। अनेक छोटे
बड़े नरेशों के अलावा अवध के नवाब और दक्खिन के निज़ाम
अपने अपने सूबों के स्वच्छन्द शासक बन बैठे थे। बंगाल अभी तक
नाम मात्र को दिल्ली के अधीन था। किन्तु बंगाल से भी दिल्ली
ख़िराज जाना कई साल से बंद हो गया था, जिसकी वजह से शाह
आलम दूसरे को बिहार पर चढ़ाई करनी पड़ी थी। स्वयं राजधानी
के पास भरतपुर के जाट राजा और रामपुर के रुहेला नवाब दोनों
अपने अपने स्वाधीन राज क़ायम कर रहे थे। मराठों की शक्ति
दिनों दिन बढ़ती जा रही थी। दिल्ली के सम्राट अभी तक भारत के
सम्राट कहलाते थे, किन्तु बहुत दर्जे तक केवल नाम के लिए।
पच्छिम में सिन्ध और पंजाब के सूबे अफ़ग़ानिस्तान के शासक
अहमदशाह अब्दाली के अधीन हो चुके थे और पूरब में बंगाल
और बिहार दोनों के अंदर अंगरेज़ों की साज़िशें सफल हो रही थीं।
वास्तव में सारे भारत पर अपनी हुकूमत जमा लेने के लिए
उस समय अफ़ग़ानों, मराठों और अंगरेज़ों के बीच एक प्रकार का
तिकोनिया संग्राम जारी था, जिसमें अफ़ग़ान और मराठे अपने
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