भारत में अंग्रेजी राज (पण्डित सुन्दरलाल - ब्रिटिश औपनिवेशिक लूट व षड्यन्त्रों का प्रामाणिक इतिहास)
Bharat Mein Angreji Raj by Pandit Sunderlal
पण्डित सुन्दरलाल (प्रस्तावना: महात्मा गाँधी) द्वारा
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युद्ध बल पर और अंगरेज़ अपनी कूटनीति के बल पर कामयाबी की
उम्मीद कर रहे थे। उस समय देश को इस विपज्जाल से निकालने
का केवल एक ही उपाय हो सकता था। वही उपाय राजा नन्दकुमार
को सूझा और ज़ाहिर है कि दिल्ली और पूना के कुछ नीतिज्ञ भी
नन्दकुमार के इस विचार से पूरी सहानुभूति रखते थे।
सम्राट आलमगीर दूसरे के समय में वज़ीर ग़ाज़ीउद्दीन ने
मराठों को सम्राट की सहायता के लिए दिल्ली
[पानीपत की तीसरी] बुलवाया। उस समय के पेशवा ने अपने भाई
[लड़ाई में मराठों] रघुनाथ राव ( राघोबा ) को सम्राट के आज्ञा
[का नेतृत्व] पालन के लिए एक बड़ी सेना सहित दिल्ली
भेजा। सम्राट और पेशवा के बीच प्रेम का सम्बन्ध क़ायम हो गया।
रघुनाथ राव ने अपनी सेना सहित और आगे बढ़कर अहमदशाह
अब्दाली के नायब के हाथों से पञ्जाब विजय कर लिया और एक
मराठा सरदार को दिल्ली सम्राट के अधीन वहाँ का सूबेदार नियुक्त
कर दिया। राघोबा दक्खिन लौट आया। मराठों की शक्ति इस
समय शिखर पर पहुँची हुई थी। किन्तु इस अन्तिम घटना ने उनके
विरुद्ध अहमदशाह अब्दाली का क्रोध भड़का दिया और सन् १७५९
ई० में एक ज़बरदस्त सेना लेकर वह पंजाब पर फिर से अपना राज
क़ायम करने और मराठों का विध्वन्स करने के लिए अफ़ग़ानिस्तान
से निकल पड़ा।
सदाशिव भाऊ २० हज़ार सवार, १० हज़ार पैदल और तोप
ख़ाना लेकर अहमदशाह के मुक़ाबले के लिए पूना से रवाना हुआ।