भारत में अंग्रेजी राज (पण्डित सुन्दरलाल - ब्रिटिश औपनिवेशिक लूट व षड्यन्त्रों का प्रामाणिक इतिहास)
Bharat Mein Angreji Raj by Pandit Sunderlal
पण्डित सुन्दरलाल (प्रस्तावना: महात्मा गाँधी) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंमीर क़ासिम १५७
“तिजारत जो दुनिया के हर मुल्क को धनवान बनाती है, बंगाल
को सर्वनाश की ओर ले जा रही थी। इससे पहले, जब कि कम्पनी को देश
में कहीं भी हुकूमत करने का हक़ हासिल न था, अपने दस्तक या पास के
ऊपर उन्हें बड़े बड़े अधिकार मिले हुए थे, कम्पनी का माल बिना महसूल
दिए देश भर में आ जा सकता था। (धीरे धीरे) कम्पनी के नौकर अपनी
अपनी निजी तिजारत के लिए इस पास का उपयोग करने लगे। यह मामला
जब तक कि थोड़ा थोड़ा होता रहा, देश की सरकार ने कुछ हद तक इसे
गवारा कर लिया, किन्तु जब सभी लोग ऐसा करने लगे तब तिजारत की
जगह उसे डकैती कहना ज़्यादा ठीक मालूम होता था।
“ये व्यापारी हर जगह पहुँचते थे, अपने ही दामों पर माल बेचते थे
और दूसरे लोगों को ज़बरदस्ती मजबूर करके उनका माल अपने ही दामों पर
ख़रीदते थे। बिलकुल ऐसा मालूम होता था कि तिजारत के बहाने एक फ़ौज
लोगों को लूटने जा रही है। लोग अपनी देशी अदालतों से रक्षा की आशा
करते थे, किन्तु व्यर्थ। अंगरेज़ व्यापारियों की यह सेना जिधर जाती थी उधर
ही तातारी विजेताओं से बढ़कर लूट मार और बरबादी करती थी। × × ×
इस तरह इस अभागे देश पर दोहरा अन्याय जारी था, जिसकी भयंकर लूट
द्वारा देश चूर चूर हो रहा था।”*
- "Commerce, which enriches every other country in the world, was
bringing Bengal to total ruin. The Company, in former times, when it had
no sovereignty or power in the country, had large privileges under their
Dustuck or permit; their goods passed witout paying duties through the
country. The servants of the Company made use of this dustuck for their
own private trade, which, while it was used with moderation, the native
Government winked at in some degree; but when it got wholly into private