भारत में अंग्रेजी राज (पण्डित सुन्दरलाल - ब्रिटिश औपनिवेशिक लूट व षड्यन्त्रों का प्रामाणिक इतिहास)
Bharat Mein Angreji Raj by Pandit Sunderlal
पण्डित सुन्दरलाल (प्रस्तावना: महात्मा गाँधी) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें१५६ भारत में अंगरेज़ी राज
" x x x यह जगह पहले बड़ी तिजारत की जगह थी, किन्तु अब
नीचे लिखी काररवाइयों की वजह से बरबाद हो गई । कोई अंगरेज़ माल
ख़रीदने या बेचने के लिए यहाँ किसी गुमाश्ते को भेजता है फ़ौरन् वह गुमाश्ता
यह फ़र्ज़ कर लेता है कि यहाँ के किसी भी आदमी के हाथ ज़बरदस्ती अपना
माल बेचने या उसका माल ज़बरदस्ती ख़रीदने का मुझे पूरा अधिकार है
और यदि वह आदमी ख़रीदने या बेचने की सामर्थ्य न रखता हो और इनकार
करे तो फ़ौरन् या तो उस पर कोड़े बरसाए जाते हैं और या उसे क़ैद कर
लिया जाता है । यदि वह राज़ी हो जावे तब भी केवल इतना ही काफ़ी नहीं
समझा जाता, बल्कि एक दूसरी ज़बरदस्ती यह की जाती है कि अनेक चीज़ों
की तिजारत का ठेका अपने ही हाथों में ले लिया जाता है, यानी जिन जिन
चीज़ों की तिजारत अंगरेज़ करते हैं उनकी तिजारत किसी दूसरे को करने नहीं
दी जाती और न किसी दूसरे के पास से किसी को ख़रीदने दिया जाता है ।
x x x और फिर अंगरेज़ समझते हैं कि कम से कम जो हम कर सकते
हैं वह यह है कि दूसरा सौदागर जिस दाम पर कोई चीज़ ख़रीदता है, हम
उसी चीज़ को उससे बहुत कम दाम पर ख़रीदें । अक्सर ये लोग दाम देने से
इनकार कर देते हैं और मैं दखल देता हूँ तो फ़ौरन् मेरी शिकायत होती है ।”*
१८ वीं सदी के पिछले पचास साल में बंगाल भर के अन्दर
यह ज़बरदस्त ज़ुल्म सब जगह फैला हुआ था ।
[तिजारत के बहाने लूट] अब हम इंगलिस्तान के प्रसिद्ध नीतिज्ञ और वक्ता
एडमंड बर्क के कुछ वाक्य इसके विषय में देते
हैं। बर्क ने इंगलिस्तान की पार्लिमेण्ट के सामने कहा था :—
- Vansittart's Narrative, vol. ii. p. 112.