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भारत में अंग्रेजी राज (पण्डित सुन्दरलाल - ब्रिटिश औपनिवेशिक लूट व षड्यन्त्रों का प्रामाणिक इतिहास)

भारत में अंग्रेजी राज (पण्डित सुन्दरलाल - ब्रिटिश औपनिवेशिक लूट व षड्यन्त्रों का प्रामाणिक इतिहास)

Bharat Mein Angreji Raj by Pandit Sunderlal

पण्डित सुन्दरलाल (प्रस्तावना: महात्मा गाँधी) द्वारा

DevanagariHindipublished727 पृष्ठ

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पृष्ठ 411

मीर क़ासिम १५६
बंगाल और बिहार भर में इस समय कम्पनी की कोठियाँ
फैली हुई थीं। नमक से लेकर इमारती लकड़ी
मीर क़ासिम की तक अनेक चीज़ों का सारा व्यापार अंगरेज़ों के
शिकायतें हाथों में आ गया था। किसानों की खड़ी खेती
कम्पनी के अंगरेज़ नौकर जिस भाव चाहे ख़रीद लेते थे। देश के
हज़ारों लाखों व्यापारियों की रोज़ी छिन चुकी थी और किसानों
की हालत इससे भी अधिक करुणाजनक थी। नवाब के मुलाज़िमों
के साथ कम्पनी के गुमाश्तों और एजन्टों के रोज़ाना जगह जगह
झगड़े होते रहते थे। कम्पनी के गुमाश्ते अनेक झूठी सच्ची शिकायतें
रोज़ाना कलकत्ते भेजते रहते थे और वहाँ से वही फ़ौजी सिपाही
नवाब के मुलाज़िमों या स्वाभिमानी प्रजा को दुरुस्त करने के लिए
जगह जगह भेज दिए जाते थे। नवाब की सरकारी चौकियों में
बंगाल भर के अंदर कहीं पर एक पाई महसूल की वसूली न होती
थी। मीर क़ासिम ने अनेक बार पत्रों द्वारा दर्दनाक शब्दों में
गवरनर वन्सीटार्ट से इन तमाम बातों की शिकायत की, किन्तु
इन शिकायतों और मीर क़ासिम के प्रयत्नों का ज़िक्र और आगे
चलकर किया जावेगा।
इस सब अपमान से बंगाल को सचमुच रक्षा करने और देश
को आइन्दा की आफ़तों से बचाने का केवल
राजा नन्दकुमार एक ही तरीक़ा हो सकता था। देश में उस
का देशप्रेम समय केवल एक ही शक्ति थी, जिसके झंडे के
नीचे और तमाम शक्तियों का मिलना मुमकिन हो सकता था। वह