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भारत में अंग्रेजी राज (पण्डित सुन्दरलाल - ब्रिटिश औपनिवेशिक लूट व षड्यन्त्रों का प्रामाणिक इतिहास)

भारत में अंग्रेजी राज (पण्डित सुन्दरलाल - ब्रिटिश औपनिवेशिक लूट व षड्यन्त्रों का प्रामाणिक इतिहास)

Bharat Mein Angreji Raj by Pandit Sunderlal

पण्डित सुन्दरलाल (प्रस्तावना: महात्मा गाँधी) द्वारा

DevanagariHindipublished727 पृष्ठ

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१५८ भारत में अंगरेज़ी राज
सन्देह होने लगता है कि उन दिनों बंगाल में किसका राज
था। वास्तव में राज न मुग़ल सम्राट का था, न मुर्शिदाबाद के
सूबेदार का; राज था विदेशियों की कूट नीति, अराजकता और
इस देश के दुर्भाग्य का, और यह सब नतीजा था थोड़े से भारत-
वासियों की लज्जाजनक देशघातकता का। हम ऊपर कह चुके हैं कि
बर्धमान, मेदिनीपुर और चट्टग्राम की आमदनी से वे सब फ़ौजें
रक्खी गई थीं, जिनके हाथों बंगाल भर में यह भयंकर नादिरशाही
चलाई जा रही थी। सच यह है कि इसे नादिरशाही कहना भी
नादिरशाह के साथ अन्याय करना है। नादिरशाह यदि ग़ैर मुल्क
में पहुँच कर अपने सिपाहियों की शान क़ायम रखने के लिए
चन्द घड़ी के लिए क़त्लआम का हुकुम दे सकता था तो वह
अपनी एक आवाज़ पर अमन क़ायम करना भी जानता था और
क्षमा और उदारता की शक्ति भी उसमें अपार थी। वास्तव में
अठारवीं सदी के उत्तरार्ध में बंगाल के अंदर अंगरेज़ों के अत्याचारों
की तुलना संसार के इतिहास के किसी दूसरे पन्ने पर मिलना
कठिन है।
hands, it was more like robbery than trade. These traders appeared every
where; they sold at their own prices, and forced the people to sell to them
at their own prices also. It appeared more like an army going to pillage the
people, under pretence of commerce, than anything else. In vain the people
claimed the protection of their own Country Courts. This English army of
traders, intheir march, ravaged worse than a Tartarian Conqueror. . . .
Thus this miserable country was torn to pieces by the horrible rapaciousness
of a double tyranny."--Burke in his impeachment of Warren Hastings.