भारत में अंग्रेजी राज (पण्डित सुन्दरलाल - ब्रिटिश औपनिवेशिक लूट व षड्यन्त्रों का प्रामाणिक इतिहास)
Bharat Mein Angreji Raj by Pandit Sunderlal
पण्डित सुन्दरलाल (प्रस्तावना: महात्मा गाँधी) द्वारा
पृष्ठ 412, कुल 727 में से
संदर्भ में पढ़ें१६० भारत में अंग्रेज़ी राज
शक्ति दिल्ली के मुग़ल सम्राट की रही सही शक्ति थी। उपाय केवल
यह था कि विदेशियों के मुक़ाबले के लिए दिल्ली सम्राट के झंडे
के नीचे देश की सारी हिन्दू और मुसलमान राज शक्तियों को
एकत्रित किया जावे और उनके सम्मिलित प्रयत्नों द्वारा विदेशियों
को बंगाल तथा भारत से निकाल कर बाहर कर दिया जावे।
यह एक आश्चर्य की बात है कि यह उपाय उस समय उसी
राजा नन्दकुमार को सूझा जिसने सन् १७५७ में अमींचन्द के धन
के लोभ में आकर अपने स्वामी सिराजुद्दौला, भारतीय प्रजा और
फ्रांसीसियों तीनों के साथ विश्वासघात किया था। मालूम होता है
नंदकुमार अब अपने देश को अंगरेज़ों के हाथों बिकते हुए देखकर
और प्रजा के ऊपर उनके अन्यायों को देखकर अपनी ग़लती पर
पछता रहा था। राजा नंदकुमार ने जी तोड़ प्रयत्न शुरू किए।
सम्राट शाह आलम अभी तक बिहार में था। सम्राट और मराठों
से उसने पत्र व्यवहार शुरू किया। उसकी कोशिशों से मराठों ने
मीर क़ासिम और अंगरेज़ों दोनों के ख़िलाफ़ सम्राट की ओर से
बंगाल पर हमला करने का वादा किया। वर्धमान, बीरभूम
और अन्य अनेक स्थानों के राजा और ज़मींदार इस काम के लिए
सम्राट के झंडे के नीचे आ आकर जमा होने लगे।
ये सब प्रयत्न अभी चल ही रहे थे, इतने में एक ऐसी घटना
हुई जिसका भारत के अंदर ब्रिटिश राज के क़ायम होने पर
बड़ा गहरा प्रभाव पड़ा, किन्तु जिसके इस गम्भीर प्रभाव पर
भारतीय इतिहास लेखकों ने अभी तक उचित ध्यान नहीं दिया।