भारत में अंग्रेजी राज (पण्डित सुन्दरलाल - ब्रिटिश औपनिवेशिक लूट व षड्यन्त्रों का प्रामाणिक इतिहास)
Bharat Mein Angreji Raj by Pandit Sunderlal
पण्डित सुन्दरलाल (प्रस्तावना: महात्मा गाँधी) द्वारा
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मीर क़ासिम १६३
पेशवा का पुत्र विश्वासराव भी सदाशिव के साथ था। मार्ग में
होलकर और सींधिया की सेनाएँ सदाशिव से आ मिलीं। राजपूत
राजाओं ने सहायता के लिये अपने सवार भेजे। भरतपुर का जाट
राजा ३०,००० सेना लेकर स्वयं सदाशिव से आ मिला। साम्राज्य
की राजधानी दिल्ली में सदाशिव का खूब स्वागत हुआ। अवध का
नवाब शुजाउद्दौला अपनी सेना और सम्राट की सेना दोनों को
लेकर सदाशिव की मदद के लिये तैयार हो गया। एक बार मालूम
होता था कि भारत के सब हिन्दू और मुसलमान विदेशियों से
अपने देश की रक्षा करने के लिए कमर कसके मैदान में उतर आए।
किन्तु सदाशिव भाऊ उस ऐन परीक्षा के समय सच्चा नीतिज्ञ
[पार्श्व टिप्पणी: मराठा सेनापति की] साबित न हो सका। गर्व ने उसकी दूरदर्शिता
[पार्श्व टिप्पणी: अदूरदर्शिता और] पर परदा डाल दिया। मार्ग में ही उसने कई
मराठा सरदारों को अपने अनुचित व्यवहार से
[पार्श्व टिप्पणी: पराजय] नाराज़ कर लिया। राजा भरतपुर को भी वह
सन्तुष्ट न रख सका। दिल्ली के अंदर उसका बर्त्ताव और भी बुरा
रहा। क़िले में घुसते ही बहुत सा शाही सामान उसने अपने क़ब्ज़े
में कर लिया। दीवान ख़ास की सुन्दर क़ीमती चाँदी की छत को
उखड़वा कर और गलवा कर उसने उससे १७ लाख रुपये ढलवा
लिए। यह भी कहा जाता है कि वह इस समय विश्वासराव को
दिल्ली के तख़्त पर बैठाना चाहता था। सदाशिव भाऊ की इस
संकीर्ण और घातक नीति का नतीजा यह हुआ कि उसके मुसलमान
मित्रों के दिल उसकी ओर से फिर गए। अवध का नवाब वज़ीर