भारत में अंग्रेजी राज (पण्डित सुन्दरलाल - ब्रिटिश औपनिवेशिक लूट व षड्यन्त्रों का प्रामाणिक इतिहास)
Bharat Mein Angreji Raj by Pandit Sunderlal
पण्डित सुन्दरलाल (प्रस्तावना: महात्मा गाँधी) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंमीर क़ासिम १६७
साल के बारे में अंगरेज़ों ने किया। मीर क़ासिम ने तीनों प्रान्तों
की आमदनी में से २४ लाख रुपए सालाना दिल्ली सम्राट की सेवा
में भेजने का वचन दिया। सम्राट ने मार्च सन् १७६१ में तीनों
प्रान्तों की सूबेदारी का परवाना बाज़ाब्ता मीर क़ासिम के नाम
जारी कर दिया। अंगरेज़ों का असली मतलब पूरा हो गया।
उन्होंने इस अवसर पर एक कोशिश यह भी की कि जिस तरह
मीर क़ासिम को शाही परवाना अता हुआ, उसी तरह जो इलाक़े
अंगरेज़ कम्पनी के पास थे उनके लिए कम्पनी को अलग सूबेदारी
का परवाना मिल जावे; किन्तु शाहआलम ने इसे मंज़ूर न किया।
एक और प्रार्थना इस समय अंगरेज़ों ने शाहआलम से यह की कि
सूबेदार मीर क़ासिम को रहने दिया जावे, किन्तु तीनों प्रान्तों की
दीवानी के अधिकार सूबेदार से लेकर कम्पनी को दे दिए जावें।
इस दीवानी का मतलब यह था कि अंगरेज़ सूबेदार के मातहत
तीनों प्रान्तों से सरकारी मालगुज़ारी वसूल करके उसका हिसाब
सम्राट और सूबेदार दोनों को दे दें और वसूली का ख़र्च निकाल कर
बाक़ी सब रुपया सूबेदार के सुपुर्द कर दें। इस धन से सरकारी
फ़ौजें रखना, अपने प्रान्तों के शासन का बाक़ी सारा काम चलाना
और सम्राट को सालाना खिराज भेजना सूबेदार का काम
रह जाय।
शाहआलम इस समय दिल्ली लौटने के लिए उत्सुक था। राज-
धानी के अन्दर सिंहासन के लिए किसी दूसरे हक़दार के खड़े हो
जाने का भी डर था। सम्राट ने चाहा कि अंगरेज़ अपनी सेना