सामग्री पर जाएँ
सर्वकोश
संग्रह पर लौटें

भारत में अंग्रेजी राज (पण्डित सुन्दरलाल - ब्रिटिश औपनिवेशिक लूट व षड्यन्त्रों का प्रामाणिक इतिहास)

Bharat Mein Angreji Raj by Pandit Sunderlal

पण्डित सुन्दरलाल (प्रस्तावना: महात्मा गाँधी) द्वारा

DevanagariHindipublished727 पृष्ठ

मुग़लों का समय १७६
शक्तियों को नया जीवन मिल गया। वास्तव में भारत की क़िस्मत का
फ़ैसला कम से कम आइन्दा तीन सौ साल के लिए ३० मई सन् १६५८
को सामूगढ़ के मैदान में उस समय हुआ जब कि अनुदार, और अदूरदर्शी
औरङ्गज़ेब ने उदार, और दूरदर्शी दाराशिकोह पर विजय प्राप्त की।
सम्भव है कि औरङ्गज़ेब के स्वभाव में ही सङ्कीर्ण धार्मिकता छिपी रही
हो। कहीं अधिक सम्भव है कि, जैसा हमने ऊपर लिखा है, यह सङ्कीर्ण
धार्मिकता उसके लिए एक राजनैतिक आवश्यकता रही हो। किन्तु हमारे
इस समय के प्रसङ्ग या भारत के भाग्य में इससे कोई फ़र्क़ नहीं पड़ता।
सिंहासन पर बैठते ही औरङ्गज़ेब ने देश की समस्त उन्नति बाधक,
कट्टर मुसलिम प्रवृत्तियों को अपनी ओर जमा करना शुरू किया। शासक
की हैसियत से औरङ्गज़ेब अन्यायी न था। साम्राज्य की ऊँची से ऊँची
पदवियाँ उसने बिना भेद भाव हिन्दू और मुसलमानों को एक समान दे
रखी थीं। बिना किसी ख़ास वजह के वह अपनी हिन्दू प्रजा के दिल को
दुखाना भी न चाहता था। गोबध के ख़िलाफ़ जो कड़ी आज्ञाएँ सम्राट अकबर
के समय से चली आती थीं, औरङ्गज़ेब ने उन्हें जारी रखा, और अपने ५०
वर्ष के शासन काल में साम्राज्य भर के अन्दर कड़ाई के साथ उनका पालन
कराया। किसानों के हित का वह ख़ास ख़याल रखता था। औरंगज़ेब के
धार्मिक पक्षपात के जो बेशुमार क़िस्से देश भर में प्रचलित हैं और जिनमें
से अनेक इतिहास की पुस्तकों में भी प्रवेश कर गये हैं वे अधिकांश में
झूठे हैं। किन्तु औरङ्गज़ेब कट्टर शरई मुसलमान था। वह इसलाम की
समस्त संकीर्ण रूढ़ियों का मानने वाला था और उन पर अमल करता था।
अकबर और शाहजहाँ के दरबारों के विषय में कहा जा सकता था कि वे

१८० पुस्तक प्रवेश
दरबार न हिन्दू दरबार थे और न मुसलिम दरबार, वे शुद्ध भारतीय दरबार
थे । औरङ्गज़ेब के दरबार के बारे में यह न कहा जा सकता था । अकबर
और शाहजहाँ को मुसलमान जितना अपना कह सकते थे उतना ही हिन्दू
अपना कह सकते थे । औरङ्गज़ेब के विषय में यह बात नामुमकिन थी ।
शाही दरबार के अन्दर दशहरे, दीवाली, रक्षा बन्धन और शिवरात्रि का
मनाया जाना और भारतीय सम्राट का उनमें हिस्सा लेना औरङ्गज़ेब ने
बन्द कर दिया । यह सब बातें फिर एक पुरानी कहानी रह गईं । .
राष्ट्र के अधिक समझदार लोगों ने, जो पहले की हितकर राष्ट्रीय
प्रगति से परिचित थे, इसका विरोध किया । उन्हें दिखाई दे गया कि
औरङ्गज़ेब की नीति बने बनाए राष्ट्रीय जीवन के टुकड़े कर देश को नाश की
ओर ले जाने वाली है । इन लोगों ने औरङ्गज़ेब को समझाने की कोशिश
की । जिस समय औरङ्गज़ेब ने 'जज़िए' के उस निरर्थक किन्तु विवादास्पद
कर को, जिसे सम्राट अकबर ने बन्द कर दिया था, फिर से जारी करना
चाहा, तो महाराजा सवाई जयसिंह ने सन् १६७८ में औरङ्गज़ेब से कहा—
"ख़ुदा केवल मुसलमानों ही का ख़ुदा नहीं, बल्कि तमाम
इनसानों का ख़ुदा है । उसके सामने हिन्दू और मुसलमान सब
एक समान हैं। हिन्दुओं के धार्मिक रिवाजों का अनादर करना
उस सर्वशक्तिमान परमात्मा की इच्छा की अवहेलना करना है ।"*
अदूरदर्शी औरङ्गज़ेब ने इस सलाह की परवा न की । स्वभाबतः राजपूत,
मराठे, सिख और अन्य हिन्दू राजे, महाराजे एक एक कर औरङ्गज़ेब के

  • Rise of the Maratha Power, by Ranade, p. 81.

[Header] मुग़लों का समय १८१

ख़िलाफ़ खड़े हो गए । जिस तरह औरङ्गज़ेब ने सङ्कीर्ण मुसलिम शक्तियों
को अपनी ओर किया, उसी तरह मराठों और सिखों ने, हिन्दू सङ्कीर्णता
का आश्रय लिया । सारा देश दो विरोधी दलों में बँट गया । कुछ वर्षों के
अन्दर ही कबीर और अकबर जैसों के महान प्रयत्नों और सदियों की
राष्ट्रीय प्रगति का सत्यानाश हो गया । औरङ्गज़ेब संयमी और बलवान था ।
वह अपनी ज़िन्दगी भर केवल उस सङ्गठित शक्ति के सहारे, जो बाबर से
लेकर शाहजहाँ तक के शासनकालों में मुग़ल साम्राज्य ने प्राप्त कर ली थी,
चारों ओर के विद्रोहों को दमन करता रहा । किन्तु जिस साम्राज्य की नींव
देश वासियों के हित और उनकी सहानुभूति पर क़ायम की गई थी वह
अब केवल हथियारों के बल के सहारे चलाया जाने लगा । दुर्भाग्यवश
औरङ्गज़ेब का शासनकाल भी बहुत लम्बा था ! अलग अलग धार्मिक
सङ्कीर्णता को दोनों ओर बल प्राप्त करने और समता, उदारता, प्रेम और
एकता की शक्तियों को तितर बितर होने का काफ़ी मौक़ा मिल गया ।
औरङ्गज़ेब के मरते ही भारतीय साम्राज्य के टुकड़े टुकड़े होने लगे । देश की
प्रधान राजनैतिक सत्ता के निर्बल होने के साथ साथ देश के समस्त
उद्योग धन्धों, व्यापार, साहित्य और सुख समृद्धि के भी नाश के बीज
बोए गए ।

औरङ्गज़ेब के बाद

बहुत सम्भव है कि औरङ्गज़ेब के बाद देश फिर अपनी ग़लती को
अनुभव कर उस ग़लती के बुरे नतीजों को दूर कर लेता और शीघ्र ही फिर
एक बार पहले की तरह ऐक्य, स्वस्थता और उन्नति के पथ पर चलने लगता,
बहुत दरजे तक देश ने ऐसा किया भी । जज़िया औरङ्गज़ेब ही के समय में

१८२ पुस्तक प्रवेश
चार दिन चल कर बन्द हो गया था। औरङ्गज़ेब के अनेक उत्तराधिकारियों
ने औरङ्गज़ेब की सङ्कीर्ण नीति को छोड़ कर फिर उदारता और विशालता
का सबूत देना शुरू कर दिया। दिल्ली दरबार में फिर से दशहरा और रक्षा
बन्धन उत्साह के साथ मनाए जाने लगे। सम्राट शाहआलम ने शिवाजी
के उत्तराधिकारी पूना के पेशवा को अपनी सल्तनत का 'वकील' क़रार
दिया, और माधोजी सिंधिया को अपना 'फ़रज़न्द जिगर बन्द' कहकर स्वयं
देहली और आगरे का सूबेदार और राजधानी का शासक नियुक्त किया।
शाहआलम के पुत्र अकबरशाह ने ब्रह्मसमाज के जन्मदाता प्रसिद्ध राममोहन
राय को राजा का ख़िताब देकर और अपना विश्वस्त वक़ील नियुक्त करके
इङ्गलिस्तान भेजा। अन्तिम सम्राट बहादुरशाह के जीवन की अनेक घटनाएँ
और उसके अनेक कथन इस तरह के मौजूद हैं जिनसे ज़ाहिर है कि वह
हिन्दू और मुसलमानों को एक आँख से देखता था और स्वयं सूफ़ी
विचारों का था। साम्राज्य के केन्द्र की इस हितकर नीति का प्रभाव भारत के
दूसरे प्रान्तों में भी जगह जगह साफ़ देखने में आता था। प्लासी के युद्ध के बाद
तक बङ्गाल के मुसलमान सूबेदारों के अधीन बड़े से बड़े प्रान्तों की दीवानी
हिन्दुओं को मिली हुई थी, और सूबेदार के दरबार में हिन्दू और मुसल-
मानों के साथ व्यवहार में किसी तरह का भेद भाव न किया जाता था।
सिराजुद्दौला का सब से विश्वस्त अनुयाई राजा मोहनलाल था जिसने
प्लासी के मैदान में सिराजुद्दौला के लिए अपने प्राण दिए। मीरजाफ़र ने
दीवान रज़ा ख़ाँ के स्थान पर महाराजा नन्दकुमार को अपना दीवान
नियुक्त करने की ज़िद की। नन्दकुमार ने ही मीर जाफ़र के मरने पर एक
हिन्दू मन्दिर से गंगा जल लाकर उसे अपने हाथ से गंगाजल से अन्तिम

[Page 183]

मुग़लों का समय १८३

स्नान कराया । यही हालत महाराजा रणजीत सिंह, होळकर, सींधिया, हैदर
अली और टीपू सुलतान के दरबारों की थी । प्रसिद्ध मराठा नीतिज्ञ नाना
फड़नवीस हैदरअली को अपना दाहिना हाथ कहा करता था और दोनों में
गहरी मित्रता थी। हमने इस पुस्तक में आगे चलकर दिखलाया है कि
हैदरअली की सारी नीति ही इस विषय में ठीक सम्राट् अकबर की नीति
की नक़ल थी। जगद्गुरु शङ्कराचार्य और टीपू सुलतान में एक दूसरे के लिए
गहरा प्रेम था । अवध के मुसलमान नवाबों के अधीन अधिकांश बड़े बड़े
तालुक़ेदार और मुख्य मुख्य मन्त्री तक हिन्दू होते थे, और लखनऊ दरबार
उदारता, एकता और प्रेम में रंगा रहता था। इसी तरह की और भी
मिसालें उस समय के इतिहास से दी जा सकती हैं। इसमें कुछ भी सन्देह
नहीं कि यदि भारत को मौक़ा मिलता तो वह शीघ्र एक औरङ्गज़ेब की
ग़लती के नतीजों से पनप कर अपना पहले का परस्पर विश्वास और पहले
का गौरव प्राप्त कर लेता ।
किन्तु भारत के दुर्भाग्य से ठीक उस समय जब कि औरङ्गज़ेब की
ग़लती के नतीजे अभी ताज़े थे और दिल्ली की केन्द्रीय सत्ता एकबार निर्बल
हो चुकी थी, एक ऐसी तीसरी शक्ति ने भारत के राजनैतिक मञ्च पर प्रवेश
किया जिसे भारत की उस ग़लती से पैदा हुए परस्पर के अविश्वास और
उनके बुरे नतीजों को स्थाई कर देने में ही अपना सब से बड़ा लाभ दिखाई
दिया और जिसका हित हर तरह भारतवासियों के हित के विरुद्ध था, और
जिसने भारत की उस, समय की अस्तव्यस्त हालत से पूरा पूरा फ़ायदा
उठाया ।

१८४ पुस्तक प्रवेश
अंगरेज़ों का आना
उस समय के अङ्गरेज़ व्यापारी
अंगरेज़ों के भारत आने और उस समय के इङ्गलिस्तान और भारत
दोनों की हालत का चित्र ऊपर दिया जा चुका है । भारत में उनकी १००
साल से ऊपर की कोशिशों और काररवाइयों का विस्तृत हाल प्रामाणिक
अंगरेज़ लेखकों ही के आधार पर पाठकों को इस पुस्तक में मिलेगा ।
औरङ्गज़ेब के समय तक भारत के अन्दर अंगरेज़ व्यापारियों की हालत
क़रीब क़रीब वैसी ही थी जैसी आजकल के भारत में हींग बेचने वाले
काबुलियों या काग़ज़ के खिलौने बेचने वाले चीनियों की । औरङ्गज़ेब की
अनुदार और अदूरदर्शी नीति ने थोड़े दिनों में चारों ओर छोटी छोटी और
एक दूसरे की प्रतिस्पर्धी रियासतें पैदा कर दीं, साम्राज्य की केन्द्रीय शक्ति
को निर्बल कर दिया, और देश के अन्दर हिन्दू और मुसलमानों के परस्पर
प्रेम और एकता की उन अलौकिक राष्ट्रीय लहरों को एक समय के लिए
पीछे हटा दिया जो कबीर के समय से लेकर क़रीब तीन सौ साल की लगा-
तार कोशिशों से देश को चिरस्थाई सुख और समृद्धि की ओर ले जाती
हुई दिखाई दे रही थीं । देश के शत्रुओं को अपनी कोशिशों के लिए खुला
मैदान मिल गया ।
औरङ्गज़ेब की मृत्यु के चन्द साल के अन्दर ही मद्रास और बंगाल में
ईस्ट इण्डिया कम्पनी की साज़िशें शुरू हो गईं जो बढ़ते बढ़ते औरङ्गज़ेब की
मृत्यु के पचास साल बाद प्लासी के मैदान में अपना रंग लाईं। कुदरती तौर
पर अंगरेज़ों का हित इसी में था कि भारतीय जीवन की उस समय की
अव्यवस्था को जिस तरह हो सके चिरस्थाई बना दें और राष्ट्रीय ऐक्य की

अंगरेज़ों का आना १८५
उन कल्याणकर प्रवृत्तियों को, जिनका बढ़ना औरङ्गज़ेब के समय में रुक गया
था, फिर से पनपने न दें ।
उनकी सफलता के कारण
किन्तु एक गम्भीर प्रश्न हमारे सामने यह पैदा होता है कि क्या कारण
हुए जिनसे अधिक सभ्य, अधिक बलवान और अधिक उन्नत भारतवासी
अपने से कम सभ्य, कम बलवान और अनुन्नत इङ्गलिस्तान निवासियों की
चालों में लगातार इस आसानी से आते चले गए, यहाँ तक कि अन्त में
अपना सर्वस्व खो बैठे । यही प्रश्न इस पुस्तक को पढ़ने से हर पाठक के दिल
में पैदा होगा । वास्तव में इतिहास की यह एक कठिनतम पहेलियों में से है ।
सबसे पहले कुशाग्रधी फ़्रांसीसी सेनापति दूपले ने मालूम किया कि
यूरोपीय अर्थों में 'राष्ट्रीयता' या 'देशभक्ति' का उस समय भारत में अभाव
था । दूपले के अनुसार यूरोपनिवासियों के लिए भारतवासियों को एक
दूसरे से लड़ा देना निहायत आसान था और इसी लिए भारत अपनी
आज़ादी खो बैठा । निस्सन्देह दूपले की बात एक दरजे तक सत्य अवश्य
है, किन्तु हमें इस पर और अधिक गम्भीरता के साथ विचार करना
होगा । अंगरेज़ विद्वान करनल मालेसन लिखता है कि अपने क़ौमी चरित्र
की जिन कमज़ोरियों के कारण भारतवासी पराधीन किए जा सके उनमें एक
यह थी कि उन्हें “स्वभाव से ही ग़ैरों पर विश्वास कर लेने और उनके साथ
ईमानदारी का व्यवहार करने की आदत,” थी । * कर्नल मालेसन का कथन
दूपले के कथन की निस्बत सच्चाई के ज़्यादा नज़दीक है ।

  • “. . . the trusting and faithful nature . . .”—The Decisive
    Battles of India, by Colonel Malleson, chapter i.

१८६ पुस्तक प्रवेश
सबसे पहली बात इस सम्बन्ध में हमें यह समझनी होगी कि किसी
एक कम सभ्य कौम का अपने से अधिक सभ्य कौम पर विजय प्राप्त कर
लेना या उसे पराजित कर लेना कोई नई घटना नहीं है। संसार के
इतिहास में अनेक बार अधिक सभ्य कौमें अपने से कम सभ्य कौमों का
इस तरह शिकार होती रही हैं। यूरोप में गॉल और वेण्डाल कौमों के
जिन लोगों ने उत्तर और पूरब से जाकर विशाल रोमन साम्राज्य पर
हमला किया और उस साम्राज्य के सदा के लिए टुकड़े टुकड़े कर डाले, वे
रोमन लोगों की निस्बत कहीं कम सभ्य थे। जिन तातारियों और मुगलों
ने आज से हज़ार डेढ़ हज़ार साल पहले पूरब और मध्य एशिया से निकल
कर बगदाद और ईरान के गौरवान्वित साम्राज्यों का अन्त किया वे उस
समय के अरबों और ईरानियों के मुकाबले में सर्वथा असभ्य थे। मध्य
एशिया की असभ्य जातियों ने ही समृद्ध यूनानी साम्राज्य का ख़ात्मा कर
डाला। भारतवासियों का भी अपने से किसी कम सभ्य जाति के इस तरह
अधीन हो जाना इसी तरह की एक घटना थी। इस विचित्र ऐतिहासिक घटना
के आम तौर पर दो सबब हो सकते हैं। एक तो अधिक उच्च सभ्यता लोगों
में थोड़ी बहुत आरामतलबी की आदत पैदा कर देती है और असभ्य कौमों
की उद्दण्ड पराक्रमशीलता उनमें नहीं रह जाती। दूसरे यह कि असभ्य या
कम सभ्य लोग जिस निस्सङ्कोच भाव के साथ अपनी पाशविक प्रवृत्तियों
और शक्तियों का उपयोग कर सकते हैं, अधिक सभ्य लोग अपने यहाँ के
नैतिक आदर्शों के अधिक स्थिर हो जाने के कारण उस तरह नहीं कर सकते।
पराजय के तीन कारण
भारत की इस दुर्घटना के हमें तीन मुख्य कारण साफ़ दिखाई देते हैं—

अंगरेज़ों का आना १८७

( १ ) अपने और पराए का भाव जिसे आज कल 'राष्ट्रीयता' का भाव
कहा जाता है उदार भारतवासियों के चित्तों में कभी भी अधिक स्थान न
कर पाया था । हम ऊपर लिख चुके हैं कि १८ वीं सदी के शुरू में भारत के
अन्दर कोई प्रबल केन्द्रीय शक्ति न रही थी । अनेक छोटी बड़ी शक्तियाँ उस
समय देश के अन्दर प्राधान्य प्राप्त करने के लिए उत्सुक और प्रयत्नशील
थीं। मुसलमानों और हिन्दुओं में भी ऊपर के कारणों से जगह जगह एक
तरह की पृथकता पैदा हो गई थी। ऐसी हालत में एक तीसरी बाहर की
ताक़त अनेक लोगों को निष्पक्ष मध्यस्थ की तरह दिखाई दी। इससे पहले
जितने लोगों ने बाहर से आकर भारत में प्रवेश किया उनमें से, उन थोड़े सों
को छोड़ कर, जो महमूद ग़ज़नवी या नादिरशाह की तरह लूट मार कर
चार दिन के अन्दर वापस चले गए, और किसी से भारतवासियों को किसी
तरह का कड़ुवा अनुभव न हुआ था। हम ऊपर दिखा चुके हैं कि इन सब
लोगों ने भारत में बस कर भारत को अपना घर बना लिया और समस्त
भारतवासियों की उन्नति और विकास में पूरा पूरा भाग लिया। ऐसी सूरत
में अपने और और का भेद भारतवासियों के लिए कोई विशेष अर्थ ही न रखता
था । भारतवासियों के धार्मिक और नैतिक आदर्श भी उनके अन्दर इस तरह
का विचार पैदा होने न दे सकते थे। कुदरती तौर पर भारतवासियों ने सात
समुद्र पार के यूरोपनिवासियों के साथ उसी तरह के प्रेम और सत्कार का
व्यवहार किया जिस तरह का वे आपस में एक दूसरे के साथ करने के आदी
थे। ऐसी सूरत में अंगरेज़ों का विविध भारतीय नरेशों के परस्पर संग्रामों
में कभी एक और कभी दूसरे का साथ देना या अपनी साज़िशों द्वारा इस
तरह के संग्राम खड़े करके उनसे पूरा लाभ उठाना अत्यन्त सरल हो गया ।

१६० पुस्तक प्रवेश
आदमियों को डाँटा और कहा—"मुमकिन है, मेरी आस पास की देसी
रिआया ने हसद के सबब फ़िरंगियों से कुछ झगड़ा किया हो। क्यों न फ़िरंगी
जिस तरह हो सके, अपनी हिफ़ाज़त का इन्तज़ाम करें ? ये बेचारे परदेसी
बहुत दूर से आए हैं और बहुत मेहनती हैं। मैं हरगिज़ दख़ल न दूँगा ।”*
भारत के व्यापारियों को भी उस समय तक कभी किसी दूसरे देश के
व्यापारियों से किसी तरह का कडुवा अनुभव न हुआ था। व्यापारी या
आक्रमक, अंगरेज़ों से पहले के किसी भी विदेशी के ज़रिये भारतीय
व्यापारियों को किसी तरह की हानि न पहुँची थी। इसके विपरीत विविध
देशों के व्यापारियों के मेल जोल से सदा एक दूसरे को लाभ ही पहुँचता
रहा था। इसलिए यह भी असम्भव था कि भारतीय व्यापारी, जिनको
अन्त में ईस्ट इण्डिया कम्पनी के कारण सबसे अधिक हानि पहुँची, कम्पनी
के कुचक्रों का मुक़ाबला करने या उसे देश से बाहर निकालने का मिल
कर कोई प्रयत्न करने की सोचते। इसके विपरीत उस समय के अंगरेज़
व्यापारी आयरलैण्ड और स्कॉटलैण्ड के व्यापारों का हाल ही में नाश करके
इन परस्पर नाशकारी तरीक़ों का पूरा अनुभव प्राप्त कर चुके थे। यहाँ तक
कि स्कॉटलैण्ड तक को, 'बिल ऑफ़ सिक्यूरिटी' पास करके इंगलिस्तान के
इन नाशकर प्रयत्नों से अपने व्यापार की रक्षा करनी पड़ी थी।
(३) भारतवासियों को इससे पहले किसी विदेशी के वचनों पर
अविश्वास करने का कोई कारण न था। भारत में सन्धिपत्रों और राजकीय
एलानों को सदा से पवित्र माना जाता था और यूरोपियनों के आने से
पहले एशियाई नरेशों के सन्धिपत्र और एलान अधिकतर सच्चे होते

  • Our Empire in Asia, by Torrens, pp. 14, 15

अंगरेज़ों का दावा १४१
भी थे । वास्तव में इस विषय में अंगरेज़ों और भारतवासियों के
चरित्र में बहुत बड़ा अन्तर है। इस देश में मराठे सब से अधिक चतुर
राजनीतिज्ञ माने जाते थे । मराठों ने कई बार बङ्गाल पर हमला किया।
फिर भी बङ्गाल के मुसलमान सूबेदार अलीवर्दी ख़ाँ ने कहा था कि मराठों
ने कभी भी अपनी सन्धियों का उल्लङ्घन नहीं किया । अङ्गरेज़ों और
भारतीय नरेशों के क़रीब सौ साल के सम्बन्ध में शायद एक भी मौक़ा ऐसा
नहीं हुआ जिसमें किसी भी भारतीय नरेश ने अंगरेज़ों के साथ अपनी
सन्धि का उल्लङ्घन किया हो । सच यह है कि अनेक भारतीय नरेशों की
मुसीबतों का ख़ास सबब यही हुआ कि उन्होंने ऐसे ऐसे मौक़ों पर कम्पनी
के साथ अपनी सन्धियों का ईमानदारी के साथ पालन किया, जब कि उन
सन्धियों का पालन उनके और उनके देश के लिए साफ़ अहितकर दिखाई
दे रहा था। हमारे इस कथन के सबूत में असंख्य मिसालें पाठकों को स्थान
स्थान पर इस पुस्तक में मिलेंगी। इसके विपरीत अंगरेज़ों के अपनी
सन्धियाँ पालन करने या न करने के विषय में प्रसिद्ध अंगरेज़ इतिहास
लेखक सर जॉन के जो इङ्गलिस्तान के इण्डिया ऑफ़िस के 'पोलिटिकल
और गुप्त विभाग' का सेक्रेटरी रह चुका था, लिखता है—
“मालूम होता है कि अंगरेज़ सरकार ने सन्धियों के तोड़ने
का ठेका ले रक्खा था । यदि मौजूदा अहदनामों के तोड़ने की
सज़ा में किसी से उसका इलाक़ा छीना जा सकता है, तो इस
समय ब्रह्मपुत्र से लेकर सिन्धु नदी तक एक चप्पा ज़मीन भी
भारत में अंगरेज़ों के पास नहीं बच सकती ।” ❀

  • "It would seem as though the British Government claimed to itself

१६२ पुस्तक प्रवेश
एडमण्ड बर्क ने इङ्गलिस्तान की पार्लिमेण्ट के सामने बारन हेस्टिंग्स
के मुक़दमें के सिलसिले में कहा था—"एक भी ऐसी सन्धि नहीं है जो
अंगरेज़ों ने भारतवर्ष में किसी के साथ की हो और जिसे उन्होंने बाद में
तोड़ा न हो।"
दोनों के चरित्र में अन्तर
अंगरेज़ों और भारतवासियों के सम्बन्ध की अनेक छोटी मोटी घटनाएँ
इस तरह की मिलती हैं जिनसे पता चलता है कि दोनों जातियों के चरित्र
में इस बात में कितना ज़बरदस्त अन्तर था। इस विषय की एक दो मिसालें
यहाँ पर बे मौके न होंगी। हैदरअली और अंगरेज़ों की लड़ाइयों में अनेक
ही बार ऐसा हुआ कि हैदरअली ने पराजित अङ्गरेज़ सैनिकों और सेना-
पतियों को उनसे यह वादा लेकर छोड़ दिया कि हम इसके बाद कम से
कम बारह महीने तक आपके ख़िलाफ़ कहीं न लड़ेंगे। किन्तु फिर चन्द
दिन के बाद ही वे ही अंगरेज़ सैनिक और सेनापति किसी दूसरी जगह के
संग्राम में हैदरअली के ख़िलाफ़ लड़ते हुए दिखाई दिए। इसके विपरीत
हैदरअली ने एक बार जब कि वह अंगरेज़ी इलाक़े में विजय पर विजय प्राप्त
करता हुआ बढ़ा चला जा रहा था, कम्पनी के अंगरेज़ दूत से यह वादा
किया कि मद्रास के फाटक पर पहुँचकर मैं आपकी ओर से सुलह की
बातचीत सुन लूँगा। विजयी हैदर मद्रास के फाटक तक पहुँच गया। वह
the exclusive right of breaking through engagements. If the violation of
existing covenants ever involved ipso facto a loss of territory, the British
Government in the East would not now possess a rood of land between the
Brahmaputra and the Indus. "—Sir John Kaye in the Calcutta Review, vol. i,
p. 219.

अंगरेज़ों का आना १६३
चाहता तो बात की बात में मद्रास के क़िले पर क़ब्ज़ा कर लेता और कम
से कम दक्षिण भारत से उसी समय अङ्गरेज़ों को निकाल कर बाहर कर
देता। किन्तु मद्रास पहुँचते ही उसने अपने वचन का पालन किया। सुलह
की बातचीत हुई और विजयी हैदरअली ने पराजित अङ्गरेज़ों के साथ सुलह
स्वीकार कर ली।
सन् ५७' के विप्लव में अवध के अन्दर बेशुमार ही मिसालें इस बात
की मिलती हैं, जिनमें कि अवध के उन ज़मींदारों और ताल्लुक़ेदारों ने,
जो अपने अपने इलाक़े में विप्लव के खुले नेता थे, मुसीबतज़दा अङ्गरेज़
पुरुषों, स्त्रियों और बच्चों को अपने क़िलों के अन्दर आश्रय दिया, और
उनकी प्रार्थना पर उन्हें अपनी किश्तियों में बैठा कर इलाहाबाद और
बनारस भेज दिया। किन्तु चन्द महीने के बाद ये ही अंगरेज़ अवध वापस
जाकर उन्हीं ताल्लुक़ेदारों के विरुद्ध लड़ते हुए दिखाई दिए। इस तरह की
और अधिक मिसालें देना केवल इस विषय को विस्तार देना होगा।
जिन भारतवासियों ने अगरेज़ों और भारत के सम्बन्ध में समय समय
पर देशभक्तता का परिचय दिया उनमें भी शायद बिरले ही ऐसे होंगे
जिन्होंने अंगरेज़ों के साथ अपने वचनों का पालन न किया हो। सच यह
है कि यदि मध्य काल के और आजकल के यूरोप के इतिहास को ध्यान से
पढ़ा जाय तो मालूम होगा कि देशीयता या राष्ट्रीयता के सङ्कीर्ण भाव यूरोप
की विशेष सामाजिक परिस्थिति की एक उपज हैं। मध्य कालीन यूरोप में
ज़मींदारों और काश्तकारों, रईसों और ग़रीबों के बीच वह ज़बरदस्त संग्राम
क़रीब एक हज़ार साल तक जारी रहा जिसकी वजह से वहाँ की जनता में
अपने और पराए का भेद ज़ोरों से जम जाना क़ुदरती था। धार्मिक पक्षपात
१३

१६४ पुस्तक प्रवेश
का भी यूरोप में सदियों तक साम्राज्य रहा, जिससे इस तरह की सङ्कीर्णता
के बढ़ने को और अधिक मौक़ा मिला। इसके अलावा यूरोप भर में अनेक
छोटे छोटे देश, क़रीब क़रीब हर देश में भोजन और वस्त्र के सामान की
कमी, और इस पर श्रेणी श्रेणी के बीच लगातार आर्थिक कलह और प्रति-
स्पर्द्धा, इन सब कारणों से भी यूरोप के अन्दर मेरे और तेरे देश के भाव
ज़ोर पकड़ते चले गए।
किन्तु भारत के दो हज़ार साल के इतिहास में इस तरह के कोई
भी कारण मौजूद न थे। यदि प्रान्तीय नरेशों में यदा कदा लड़ाइयाँ होती
थीं, या बाहर से चन्द रोज़ के लिए कोई हमला भी होता था तो करोड़ों
जनता के रहन सहन, उनके जीवन, उनके धन्धों और उनकी खुशहाली पर
इन लड़ाइयों का कोई किसी तरह का भी असर न पड़ता था।
निस्सन्देह आजकल की राष्ट्रीयता आजकल के राष्ट्रों के स्वार्थमय जीवन
संग्राम का फल है। हम स्वीकार करते हैं कि यह राष्ट्रीयता का भाव मनुष्य
को एक दरजे तक व्यक्तिगत स्वार्थ के भाव से ऊपर उठा कर राष्ट्र के नाम
पर अपनी आहुति देने के लिए तैयार कर देता है। इस दरजे तक यह भाव
निस्सन्देह मनुष्य को ऊँचा उठाने वाला भी है। किन्तु यदि उच्च मानव प्रेम
और मानव जाति के हित की दृष्टि से देखा जाय तो इसमें कोई सन्देह नहीं
कि आज कल की 'राष्ट्रीयता' का भाव अधिक से अधिक एक अनिवार्य
आपत्ति है और इस समय भी समस्त मानव समाज के विकास में एक बहुत
बड़ी बाधा साबित हो रहा है। जो हो, भारत में इस भाव के पैदा होने
के लिए अंगरेज़ों के आने से पहले कोई गुञ्जाइश ही न थी। यही वजह है
कि भारतवासियों में अपने और पराए का भेदभाव मौजूद न था।

अंगरेज़ों का आना १४५
इसीलिए यदि निष्पक्षता के साथ देखा जाय तो ईस्ट इण्डिया कम्पनी
के सौ साल के इतिहास में जिन भारतवासियों ने अंगरेज़ों के साथ मिलकर
अपने देश और देशवासियों को हानि पहुँचाई, उनमें से थोड़े सों को
छोड़ कर बाक़ी का पाप केवल इतना ही था जितना किसी भी दो राजाओं
के संग्राम में एक मनुष्य का एक पक्ष से दूसरे पक्ष की ओर चला जाना ।
यही वजह थी कि इनमें से अधिकांश देशघातकों ने विदेशियों के साथ
अपनी प्रतिज्ञाओं का सदा सच्चाई के साथ पालन किया ।
हमें यह लज्जा के साथ स्वीकार करना पड़ता है कि उन सौ साल के
इतिहास में हमें अपनी ओर कई अक्षम्य देशघातकता और विश्वासघातकता
की मिसालें भी मिलती हैं। किन्तु इस तरह की मिसालें किसी भी देश के
इतिहास में इस तरह की परिस्थिति में थोड़ी बहुत मिलना स्वाभाविक है।
इतिहास से स्पष्ट है कि अन्य अनेक दोषों के होते हुए भी भारतवासियों
में अपने वचन का पालन करना एक सामान्य नियम था जिसके कहीं कहीं
सम्भव है अपवाद मिल सकते हों, दूसरी ओर कम्पनी के अंगरेज़ प्रति-
निधियों में अपनी प्रतिज्ञाओं का निस्सङ्कोच उल्लङ्घन एक सामान्य नियम
था; जिसका शायद एक भी अपवाद मिलना कठिन है। इसीलिए सन्
१७५७ से लेकर १८५७ तक बार बार के प्रतिकूल अनुभवों के होते हुए भी
भारतवासियों ने सदा अंगरेज़ों की प्रतिज्ञाओं पर विश्वास कर लिया ।
इन सौ साल के इतिहास से यह भी ज़ाहिर है कि वीरता, साहस या
युद्ध कौशल में भारतवासी कहीं भी अंगरेज़ों से पीछे नहीं रहे । अंगरेज़ों के
भारतीय संग्राम अंगरेज़ों ने नहीं जीते, बल्कि भारतवासियों ने अंगरेज़ों के
लिए जीत कर अपनी विजय का फल अंगरेज़ों के हवाले कर दिया ।

१३६ पुस्तक प्रवेश
करनल मालेसन ने अपनी पुस्तक 'दी डिसाइसिव बैटिल्स ऑफ़ इण्डिया' में
स्वीकार किया है कि सन् १७५७ से १८२७ तक जो असंख्य लड़ाइयाँ
अंगरेज़ों और भारतवासियों के बीच लड़ी गईं उनमें एक भी ऐसी नहीं
हुई जिसमें अंगरेज़ी सेना एक ओर रही हो और हिन्दोस्तानी सेना दूसरी
ओर, और फिर अंगरेज़ों ने विजय प्राप्त की हो। इस तरह के संग्राम,
जिनमें अंगरेज़ एक ओर थे और हिन्दोस्तानी दूसरी ओर, अनेक बार
हुए, किन्तु उनमें सदा अंगरेज़ों को ज़िल्लत के साथ हार खानी पड़ी। जहाँ
कहीं किसी संग्राम में अंगरेज़ों ने विजय प्राप्त की है वहाँ सदा हिन्दोस्तानियों
में दो दल दिखाई दिए हैं, एक विदेशियों के विरुद्ध और दूसरा उनके पक्ष
में। यह एक अकाट्य, किन्तु लज्जाजनक सच्चाई है कि अंगरेज़ों ने भारतवर्ष
को तलवार से नहीं जीता, बल्कि भारतवासियों ने अपनी तलवार से
अपने देश को जीत कर विदेशियों के हवाले कर दिया। हमारे इस कथन के
यथेच्छ सबूत पाठकों को इस पुस्तक के क़रीब क़रीब हर अध्याय में मिलेंगे।
हमारा पतन
किन्तु जो हो, अब हमें इस भीषण सच्चाई की ओर ध्यान देना होगा
कि हमारी इन दो सौ साल की लगातार ग़लतियों या कमज़ोरियों ने हमें
कहाँ से कहाँ पहुँचा दिया। केवल दो सौ साल पहले जो देश संसार का
सब से अधिक खुशहाल और सब से अधिक बलवान देश समझा जाता था
वह आज संसार का सब से अधिक दरिद्र और सब से अधिक निर्बल और
असहाय देश माना जाता है। केवल डेढ़ सौ साल पहले जिस देश में एक
भी पुरुष या स्त्री किसी गाँव के अन्दर ऐसा न मिल सकता था जो लिखना
पढ़ना न जानता हो, वहाँ आज ९३ फ़ी सदी आबादी बिल्कुल अनपढ़ है।

अंगरेज़ों का आना १६७
केवल सवा सौ साल पहले यानी १९ वीं सदी के शुरू तक जो देश
अपने उद्योग धन्धों की दृष्टि से शायद केवल एक चीन को छोड़कर
संसार का सब से अधिक उन्नत देश स्वीकार किया जाता था और जो
उस समय तक आधे से अधिक सभ्य संसार की, जिसमें इङ्गलिस्तान और
फ्रांस भी शामिल थे, कपड़े इत्यादि की आवश्यकता को पूरा करता था,
वह आज अपने जीवन की एक एक आवश्यकता के लिए, यहाँ तक कि
अपना तन ढकने के लिए दूसरों का मोहताज है। इन सब बातों के अकाट्य
सबूत इस पुस्तक में उचित स्थान पर दिए जायेंगे।
ऊपर लिखी हानियों से कहीं अधिक भयङ्कर हानि जो दूसरे देश की
राजनैतिक अधीनता किसी भी देश को पहुंचा सकती है, वह उस देश के
चरित्र का नाश है। समाज विज्ञान का प्रसिद्ध अमरीकन विद्वान ई० ए०
रॉस लिखता है।
“किसी भी राष्ट्र के चरित्र के अधःपतन के सबसे प्रबल
कारणों में से एक कारण उस राष्ट्र का किसी विदेशी क़ौम के
अधीन हो जाना है।”*
अपने समय के भारतवासियों के चरित्र को बयान करते हुए यूनानी
इतिहास लेखक एरियन लिखता है कि—
“इन लोगों में अद्भुत वीरता है, युद्ध विद्या में ये
समस्त एशिया निवासियों से बढ़कर हैं। सरलता और सच्चाई के
लिए ये विख्यात हैं। ये इतने समझदार हैं कि इन्हें कभी मुक़दमे-

  • "Subjugation to a foreign yoke is one of the most potent causes of
    the decay of national character."—Professor E. A. Ross: Principles of
    Sociology, pp. 132, 133.

१६८ पुस्तक प्रवेश
बाज़ी की शरण नहीं लेनी पड़ती और इतने ईमानदार हैं कि न
इन्हें अपने दरवाज़ों में ताले लगाने पड़ते हैं और न लेन देन में
इन्हें लिखा पढ़ी की ज़रूरत होती है। कभी भी किसी भारत-
वासी को झूठ बोलते हुए नहीं सुना गया।"*
उस समय के भारतवासियों के चरित्र की इस समय के भारतवासियों
के चरित्र से तुलना करना अत्यन्त दुखकर है। इस तुलना पर टीका करते हुए
और मिश्र यूनान इत्यादि की मिसालें देते हुए ई० ए० रॉस लिखता है—
"भारतवासियों के उच्चतर जीवन के ऊपर विदेशी शासन
का प्रभाव ऐसा ही है जैसा किसी चीज़ को पाला मार गया हो।"†
निस्सन्देह पिछले पौने दो सौ साल से यह प्राचीन देश वेग के साथ
मानसिक, नैतिक और भौतिक सर्वनाश की ओर बढ़ता चला जा रहा है।
हमारा कर्त्तव्य
अंगरेज़ी राज कब से
सब से अन्तिम, किन्तु सब से अधिक गम्भीर प्रश्न हमारे सामने यह
है कि इस घातक विपत्ति से निकलने का हमारे लिए अब क्या उपाय हो

  • "They are remarkably brave, superior in war to all Asiatics; they
    are remarkable for simplicity and integrity; so reasonable as never to have
    recourse to a law suit and so honest as neither to require locks to their
    doors nor writings to bind their agreement. No Indian was ever known to
    tell an untruth."—The Greek Historian Arrian, as quoted in Ibid, pp. 132, 133.
  • " . . . the alien dominion has a blighting effect upon the higher
    life of the people of India."—Ibid.

हमारा कर्तव्य १६६
सकता है। इस सम्बन्ध में हमें सब से पहले दो बातों की ओर से सावधान
रहना होगा। एक यह कि घबराहट या किसी तरह के आवेश में आकर
हम मानव जीवन के उन उच्च नैतिक सिद्धान्तों से न डिगने पाएँ जिनके
बिना मानव समाज का सुख से रह सकना सर्वथा असम्भव है और जो
मनुष्य के ऐहिक जीवन के आध्यात्मिक आधार स्तम्भ हैं। दूसरे यह कि
नैराश्य या अकर्मण्यता को हमें एक क्षण के लिए भी अपने पास नहीं
फटकने देना चाहिए। इन दोनों बातों में से हम पहले दूसरी के विषय में
कुछ कहना चाहते हैं।
आज से पौने दो सौ साल पहले भारतवर्ष की एक चप्पा ज़मीन पर भी
अंगरेज़ों का किसी तरह का अधिकार न था। आज (१६२६) से ८७ साल
पहले यानी सन् १८४२ तक वे दिल्ली सम्राट को अपना सम्राट स्वीकार
करते थे, अपने तईं उसकी विनम्र आज्ञाकारी प्रजा कहा करते थे,
ईस्ट इण्डिया कम्पनी के सिक्कों में दिल्ली सम्राट का नाम खुदा
होता था और कम्पनी के भारतीय इलाक़ों के अंगरेज़ गवरनर जनरल की
मोहर में 'दिल्ली के बादशाह का फ़िदविए ख़ास' ये शब्द खुदे रहते थे।
निस्सन्देह अनभ्यस्त और भोले भारतवासी विदेशियों की इन चालों से
धोखे में आते रहे। दिल्ली दरबार की निर्बलता ने धीरे धीरे उन्हें और भी
अपाहज कर दिया। किन्तु ज्योंही भारतवासियों ने यह अनुभव करना शुरू
किया कि इस नए राजनैतिक प्रयोग के नतीजे विविध प्रान्तों में देशी
रियासतों और देश के जीवन के लिए कितने घातक साबित हो रहे हैं,
ज्योंही सम्राट शाहआलम की मृत्यु (१८०६) के बाद कम्पनी के प्रति-
निधियों ने सम्राट अकबरशाह और उसके बाद सम्राट बहादुरशाह के पद

२०० पुस्तक प्रवेश
की अवहेलना शुरू की, उनकी आँखें खुल गई । उन्होंने सन् ५७ में विदेशी
सत्ता से अपने तईं आज़ाद करने का वह ज़ोरदार प्रयत्न किया जिसने एक
बार वास्तव में अंगरेज़ी राज की जड़ों को हिला दिया और उसके अस्तित्व
को ख़तरे में डाल दिया। सन् ५७ का स्वाधीनता संग्राम हमारी पराधीनता
के इतिहास की उस समय तक की सब से महत्वपूर्ण घटना थी। उसकी
प्रगति और असफलता के कारणों को हमने इस पुस्तक में विस्तार के साथ
दूसरे स्थान पर बयान किया है।
स्वाधीनता के प्रयत्न
वास्तव में अंगरेज़ी हुकूमत भारतवर्ष में बाज़ाब्ता और पूरी तरह सन्
१८५६ ही से जमी। उस समय ही भारतीय साम्राज्य की बाग विधिवत्
उस व्यापारी कम्पनी के हाथों से नहीं, जो अन्त समय तक दिल्ली सम्राट
की प्रजा होने का बनावटी दावा करती रही, बल्कि स्वयं भारत के अन्तिम
सम्राट बहादुरशाह के हाथों से छीनकर इंगलिस्तान की मलका विक्टोरिया के
हाथों में दी गई। ७० साल का समय या १७० साल का समय भी किसी
देश के इतिहास में और ख़ास कर भारत जैसे प्राचीन और सुसभ्य देश के
इतिहास में कोई लम्बा समय नहीं होता। सन् ५७ के बाद भी भारत ने
अपनी आज़ादी की कोशिशों को एक क्षण के लिए भी ढीला होने नहीं
दिया। सन् ५७ की क्रान्ति और पंजाब के कूका विद्रोह में केवल १५ साल
का अन्तर था, सन् ५७ और काँग्रेस के जन्म में २८ साल का, काँग्रेस के
जन्म और बङ्गभङ्ग के बाद के आन्दोलन में २० साल का, बङ्गभङ्ग और उस
असहयोग आन्दोलन में, जिसने फिर एक बार सन् ५७ की क्रान्ति से भी
अधिक और उससे उच्चतर उपायों द्वारा अंगरेज़ी राज के अस्तित्व को ख़तरे