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भारत में अंग्रेजी राज (पण्डित सुन्दरलाल - ब्रिटिश औपनिवेशिक लूट व षड्यन्त्रों का प्रामाणिक इतिहास)

भारत में अंग्रेजी राज (पण्डित सुन्दरलाल - ब्रिटिश औपनिवेशिक लूट व षड्यन्त्रों का प्रामाणिक इतिहास)

Bharat Mein Angreji Raj by Pandit Sunderlal

पण्डित सुन्दरलाल (प्रस्तावना: महात्मा गाँधी) द्वारा

DevanagariHindipublished727 पृष्ठ

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अंगरेज़ों का आना १८५
उन कल्याणकर प्रवृत्तियों को, जिनका बढ़ना औरङ्गज़ेब के समय में रुक गया
था, फिर से पनपने न दें ।
उनकी सफलता के कारण
किन्तु एक गम्भीर प्रश्न हमारे सामने यह पैदा होता है कि क्या कारण
हुए जिनसे अधिक सभ्य, अधिक बलवान और अधिक उन्नत भारतवासी
अपने से कम सभ्य, कम बलवान और अनुन्नत इङ्गलिस्तान निवासियों की
चालों में लगातार इस आसानी से आते चले गए, यहाँ तक कि अन्त में
अपना सर्वस्व खो बैठे । यही प्रश्न इस पुस्तक को पढ़ने से हर पाठक के दिल
में पैदा होगा । वास्तव में इतिहास की यह एक कठिनतम पहेलियों में से है ।
सबसे पहले कुशाग्रधी फ़्रांसीसी सेनापति दूपले ने मालूम किया कि
यूरोपीय अर्थों में 'राष्ट्रीयता' या 'देशभक्ति' का उस समय भारत में अभाव
था । दूपले के अनुसार यूरोपनिवासियों के लिए भारतवासियों को एक
दूसरे से लड़ा देना निहायत आसान था और इसी लिए भारत अपनी
आज़ादी खो बैठा । निस्सन्देह दूपले की बात एक दरजे तक सत्य अवश्य
है, किन्तु हमें इस पर और अधिक गम्भीरता के साथ विचार करना
होगा । अंगरेज़ विद्वान करनल मालेसन लिखता है कि अपने क़ौमी चरित्र
की जिन कमज़ोरियों के कारण भारतवासी पराधीन किए जा सके उनमें एक
यह थी कि उन्हें “स्वभाव से ही ग़ैरों पर विश्वास कर लेने और उनके साथ
ईमानदारी का व्यवहार करने की आदत,” थी । * कर्नल मालेसन का कथन
दूपले के कथन की निस्बत सच्चाई के ज़्यादा नज़दीक है ।

  • “. . . the trusting and faithful nature . . .”—The Decisive
    Battles of India, by Colonel Malleson, chapter i.