भारत में अंग्रेजी राज (पण्डित सुन्दरलाल - ब्रिटिश औपनिवेशिक लूट व षड्यन्त्रों का प्रामाणिक इतिहास)
Bharat Mein Angreji Raj by Pandit Sunderlal
पण्डित सुन्दरलाल (प्रस्तावना: महात्मा गाँधी) द्वारा
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चार दिन चल कर बन्द हो गया था। औरङ्गज़ेब के अनेक उत्तराधिकारियों
ने औरङ्गज़ेब की सङ्कीर्ण नीति को छोड़ कर फिर उदारता और विशालता
का सबूत देना शुरू कर दिया। दिल्ली दरबार में फिर से दशहरा और रक्षा
बन्धन उत्साह के साथ मनाए जाने लगे। सम्राट शाहआलम ने शिवाजी
के उत्तराधिकारी पूना के पेशवा को अपनी सल्तनत का 'वकील' क़रार
दिया, और माधोजी सिंधिया को अपना 'फ़रज़न्द जिगर बन्द' कहकर स्वयं
देहली और आगरे का सूबेदार और राजधानी का शासक नियुक्त किया।
शाहआलम के पुत्र अकबरशाह ने ब्रह्मसमाज के जन्मदाता प्रसिद्ध राममोहन
राय को राजा का ख़िताब देकर और अपना विश्वस्त वक़ील नियुक्त करके
इङ्गलिस्तान भेजा। अन्तिम सम्राट बहादुरशाह के जीवन की अनेक घटनाएँ
और उसके अनेक कथन इस तरह के मौजूद हैं जिनसे ज़ाहिर है कि वह
हिन्दू और मुसलमानों को एक आँख से देखता था और स्वयं सूफ़ी
विचारों का था। साम्राज्य के केन्द्र की इस हितकर नीति का प्रभाव भारत के
दूसरे प्रान्तों में भी जगह जगह साफ़ देखने में आता था। प्लासी के युद्ध के बाद
तक बङ्गाल के मुसलमान सूबेदारों के अधीन बड़े से बड़े प्रान्तों की दीवानी
हिन्दुओं को मिली हुई थी, और सूबेदार के दरबार में हिन्दू और मुसल-
मानों के साथ व्यवहार में किसी तरह का भेद भाव न किया जाता था।
सिराजुद्दौला का सब से विश्वस्त अनुयाई राजा मोहनलाल था जिसने
प्लासी के मैदान में सिराजुद्दौला के लिए अपने प्राण दिए। मीरजाफ़र ने
दीवान रज़ा ख़ाँ के स्थान पर महाराजा नन्दकुमार को अपना दीवान
नियुक्त करने की ज़िद की। नन्दकुमार ने ही मीर जाफ़र के मरने पर एक
हिन्दू मन्दिर से गंगा जल लाकर उसे अपने हाथ से गंगाजल से अन्तिम