भारत में अंग्रेजी राज (पण्डित सुन्दरलाल - ब्रिटिश औपनिवेशिक लूट व षड्यन्त्रों का प्रामाणिक इतिहास)
Bharat Mein Angreji Raj by Pandit Sunderlal
पण्डित सुन्दरलाल (प्रस्तावना: महात्मा गाँधी) द्वारा
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बाज़ी की शरण नहीं लेनी पड़ती और इतने ईमानदार हैं कि न
इन्हें अपने दरवाज़ों में ताले लगाने पड़ते हैं और न लेन देन में
इन्हें लिखा पढ़ी की ज़रूरत होती है। कभी भी किसी भारत-
वासी को झूठ बोलते हुए नहीं सुना गया।"*
उस समय के भारतवासियों के चरित्र की इस समय के भारतवासियों
के चरित्र से तुलना करना अत्यन्त दुखकर है। इस तुलना पर टीका करते हुए
और मिश्र यूनान इत्यादि की मिसालें देते हुए ई० ए० रॉस लिखता है—
"भारतवासियों के उच्चतर जीवन के ऊपर विदेशी शासन
का प्रभाव ऐसा ही है जैसा किसी चीज़ को पाला मार गया हो।"†
निस्सन्देह पिछले पौने दो सौ साल से यह प्राचीन देश वेग के साथ
मानसिक, नैतिक और भौतिक सर्वनाश की ओर बढ़ता चला जा रहा है।
हमारा कर्त्तव्य
अंगरेज़ी राज कब से
सब से अन्तिम, किन्तु सब से अधिक गम्भीर प्रश्न हमारे सामने यह
है कि इस घातक विपत्ति से निकलने का हमारे लिए अब क्या उपाय हो
- "They are remarkably brave, superior in war to all Asiatics; they
are remarkable for simplicity and integrity; so reasonable as never to have
recourse to a law suit and so honest as neither to require locks to their
doors nor writings to bind their agreement. No Indian was ever known to
tell an untruth."—The Greek Historian Arrian, as quoted in Ibid, pp. 132, 133.
- " . . . the alien dominion has a blighting effect upon the higher
life of the people of India."—Ibid.