भारत में अंग्रेजी राज (पण्डित सुन्दरलाल - ब्रिटिश औपनिवेशिक लूट व षड्यन्त्रों का प्रामाणिक इतिहास)
Bharat Mein Angreji Raj by Pandit Sunderlal
पण्डित सुन्दरलाल (प्रस्तावना: महात्मा गाँधी) द्वारा
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करनल मालेसन ने अपनी पुस्तक 'दी डिसाइसिव बैटिल्स ऑफ़ इण्डिया' में
स्वीकार किया है कि सन् १७५७ से १८२७ तक जो असंख्य लड़ाइयाँ
अंगरेज़ों और भारतवासियों के बीच लड़ी गईं उनमें एक भी ऐसी नहीं
हुई जिसमें अंगरेज़ी सेना एक ओर रही हो और हिन्दोस्तानी सेना दूसरी
ओर, और फिर अंगरेज़ों ने विजय प्राप्त की हो। इस तरह के संग्राम,
जिनमें अंगरेज़ एक ओर थे और हिन्दोस्तानी दूसरी ओर, अनेक बार
हुए, किन्तु उनमें सदा अंगरेज़ों को ज़िल्लत के साथ हार खानी पड़ी। जहाँ
कहीं किसी संग्राम में अंगरेज़ों ने विजय प्राप्त की है वहाँ सदा हिन्दोस्तानियों
में दो दल दिखाई दिए हैं, एक विदेशियों के विरुद्ध और दूसरा उनके पक्ष
में। यह एक अकाट्य, किन्तु लज्जाजनक सच्चाई है कि अंगरेज़ों ने भारतवर्ष
को तलवार से नहीं जीता, बल्कि भारतवासियों ने अपनी तलवार से
अपने देश को जीत कर विदेशियों के हवाले कर दिया। हमारे इस कथन के
यथेच्छ सबूत पाठकों को इस पुस्तक के क़रीब क़रीब हर अध्याय में मिलेंगे।
हमारा पतन
किन्तु जो हो, अब हमें इस भीषण सच्चाई की ओर ध्यान देना होगा
कि हमारी इन दो सौ साल की लगातार ग़लतियों या कमज़ोरियों ने हमें
कहाँ से कहाँ पहुँचा दिया। केवल दो सौ साल पहले जो देश संसार का
सब से अधिक खुशहाल और सब से अधिक बलवान देश समझा जाता था
वह आज संसार का सब से अधिक दरिद्र और सब से अधिक निर्बल और
असहाय देश माना जाता है। केवल डेढ़ सौ साल पहले जिस देश में एक
भी पुरुष या स्त्री किसी गाँव के अन्दर ऐसा न मिल सकता था जो लिखना
पढ़ना न जानता हो, वहाँ आज ९३ फ़ी सदी आबादी बिल्कुल अनपढ़ है।