भारत में अंग्रेजी राज (पण्डित सुन्दरलाल - ब्रिटिश औपनिवेशिक लूट व षड्यन्त्रों का प्रामाणिक इतिहास)
Bharat Mein Angreji Raj by Pandit Sunderlal
पण्डित सुन्दरलाल (प्रस्तावना: महात्मा गाँधी) द्वारा
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सबसे पहली बात इस सम्बन्ध में हमें यह समझनी होगी कि किसी
एक कम सभ्य कौम का अपने से अधिक सभ्य कौम पर विजय प्राप्त कर
लेना या उसे पराजित कर लेना कोई नई घटना नहीं है। संसार के
इतिहास में अनेक बार अधिक सभ्य कौमें अपने से कम सभ्य कौमों का
इस तरह शिकार होती रही हैं। यूरोप में गॉल और वेण्डाल कौमों के
जिन लोगों ने उत्तर और पूरब से जाकर विशाल रोमन साम्राज्य पर
हमला किया और उस साम्राज्य के सदा के लिए टुकड़े टुकड़े कर डाले, वे
रोमन लोगों की निस्बत कहीं कम सभ्य थे। जिन तातारियों और मुगलों
ने आज से हज़ार डेढ़ हज़ार साल पहले पूरब और मध्य एशिया से निकल
कर बगदाद और ईरान के गौरवान्वित साम्राज्यों का अन्त किया वे उस
समय के अरबों और ईरानियों के मुकाबले में सर्वथा असभ्य थे। मध्य
एशिया की असभ्य जातियों ने ही समृद्ध यूनानी साम्राज्य का ख़ात्मा कर
डाला। भारतवासियों का भी अपने से किसी कम सभ्य जाति के इस तरह
अधीन हो जाना इसी तरह की एक घटना थी। इस विचित्र ऐतिहासिक घटना
के आम तौर पर दो सबब हो सकते हैं। एक तो अधिक उच्च सभ्यता लोगों
में थोड़ी बहुत आरामतलबी की आदत पैदा कर देती है और असभ्य कौमों
की उद्दण्ड पराक्रमशीलता उनमें नहीं रह जाती। दूसरे यह कि असभ्य या
कम सभ्य लोग जिस निस्सङ्कोच भाव के साथ अपनी पाशविक प्रवृत्तियों
और शक्तियों का उपयोग कर सकते हैं, अधिक सभ्य लोग अपने यहाँ के
नैतिक आदर्शों के अधिक स्थिर हो जाने के कारण उस तरह नहीं कर सकते।
पराजय के तीन कारण
भारत की इस दुर्घटना के हमें तीन मुख्य कारण साफ़ दिखाई देते हैं—