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भारत में अंग्रेजी राज (पण्डित सुन्दरलाल - ब्रिटिश औपनिवेशिक लूट व षड्यन्त्रों का प्रामाणिक इतिहास)

भारत में अंग्रेजी राज (पण्डित सुन्दरलाल - ब्रिटिश औपनिवेशिक लूट व षड्यन्त्रों का प्रामाणिक इतिहास)

Bharat Mein Angreji Raj by Pandit Sunderlal

पण्डित सुन्दरलाल (प्रस्तावना: महात्मा गाँधी) द्वारा

DevanagariHindipublished727 पृष्ठ

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[Header] मुग़लों का समय १८१

ख़िलाफ़ खड़े हो गए । जिस तरह औरङ्गज़ेब ने सङ्कीर्ण मुसलिम शक्तियों
को अपनी ओर किया, उसी तरह मराठों और सिखों ने, हिन्दू सङ्कीर्णता
का आश्रय लिया । सारा देश दो विरोधी दलों में बँट गया । कुछ वर्षों के
अन्दर ही कबीर और अकबर जैसों के महान प्रयत्नों और सदियों की
राष्ट्रीय प्रगति का सत्यानाश हो गया । औरङ्गज़ेब संयमी और बलवान था ।
वह अपनी ज़िन्दगी भर केवल उस सङ्गठित शक्ति के सहारे, जो बाबर से
लेकर शाहजहाँ तक के शासनकालों में मुग़ल साम्राज्य ने प्राप्त कर ली थी,
चारों ओर के विद्रोहों को दमन करता रहा । किन्तु जिस साम्राज्य की नींव
देश वासियों के हित और उनकी सहानुभूति पर क़ायम की गई थी वह
अब केवल हथियारों के बल के सहारे चलाया जाने लगा । दुर्भाग्यवश
औरङ्गज़ेब का शासनकाल भी बहुत लम्बा था ! अलग अलग धार्मिक
सङ्कीर्णता को दोनों ओर बल प्राप्त करने और समता, उदारता, प्रेम और
एकता की शक्तियों को तितर बितर होने का काफ़ी मौक़ा मिल गया ।
औरङ्गज़ेब के मरते ही भारतीय साम्राज्य के टुकड़े टुकड़े होने लगे । देश की
प्रधान राजनैतिक सत्ता के निर्बल होने के साथ साथ देश के समस्त
उद्योग धन्धों, व्यापार, साहित्य और सुख समृद्धि के भी नाश के बीज
बोए गए ।

औरङ्गज़ेब के बाद

बहुत सम्भव है कि औरङ्गज़ेब के बाद देश फिर अपनी ग़लती को
अनुभव कर उस ग़लती के बुरे नतीजों को दूर कर लेता और शीघ्र ही फिर
एक बार पहले की तरह ऐक्य, स्वस्थता और उन्नति के पथ पर चलने लगता,
बहुत दरजे तक देश ने ऐसा किया भी । जज़िया औरङ्गज़ेब ही के समय में