भारत में अंग्रेजी राज (पण्डित सुन्दरलाल - ब्रिटिश औपनिवेशिक लूट व षड्यन्त्रों का प्रामाणिक इतिहास)
Bharat Mein Angreji Raj by Pandit Sunderlal
पण्डित सुन्दरलाल (प्रस्तावना: महात्मा गाँधी) द्वारा
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दरबार न हिन्दू दरबार थे और न मुसलिम दरबार, वे शुद्ध भारतीय दरबार
थे । औरङ्गज़ेब के दरबार के बारे में यह न कहा जा सकता था । अकबर
और शाहजहाँ को मुसलमान जितना अपना कह सकते थे उतना ही हिन्दू
अपना कह सकते थे । औरङ्गज़ेब के विषय में यह बात नामुमकिन थी ।
शाही दरबार के अन्दर दशहरे, दीवाली, रक्षा बन्धन और शिवरात्रि का
मनाया जाना और भारतीय सम्राट का उनमें हिस्सा लेना औरङ्गज़ेब ने
बन्द कर दिया । यह सब बातें फिर एक पुरानी कहानी रह गईं । .
राष्ट्र के अधिक समझदार लोगों ने, जो पहले की हितकर राष्ट्रीय
प्रगति से परिचित थे, इसका विरोध किया । उन्हें दिखाई दे गया कि
औरङ्गज़ेब की नीति बने बनाए राष्ट्रीय जीवन के टुकड़े कर देश को नाश की
ओर ले जाने वाली है । इन लोगों ने औरङ्गज़ेब को समझाने की कोशिश
की । जिस समय औरङ्गज़ेब ने 'जज़िए' के उस निरर्थक किन्तु विवादास्पद
कर को, जिसे सम्राट अकबर ने बन्द कर दिया था, फिर से जारी करना
चाहा, तो महाराजा सवाई जयसिंह ने सन् १६७८ में औरङ्गज़ेब से कहा—
"ख़ुदा केवल मुसलमानों ही का ख़ुदा नहीं, बल्कि तमाम
इनसानों का ख़ुदा है । उसके सामने हिन्दू और मुसलमान सब
एक समान हैं। हिन्दुओं के धार्मिक रिवाजों का अनादर करना
उस सर्वशक्तिमान परमात्मा की इच्छा की अवहेलना करना है ।"*
अदूरदर्शी औरङ्गज़ेब ने इस सलाह की परवा न की । स्वभाबतः राजपूत,
मराठे, सिख और अन्य हिन्दू राजे, महाराजे एक एक कर औरङ्गज़ेब के
- Rise of the Maratha Power, by Ranade, p. 81.