भारत में अंग्रेजी राज (पण्डित सुन्दरलाल - ब्रिटिश औपनिवेशिक लूट व षड्यन्त्रों का प्रामाणिक इतिहास)
Bharat Mein Angreji Raj by Pandit Sunderlal
पण्डित सुन्दरलाल (प्रस्तावना: महात्मा गाँधी) द्वारा
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अंगरेज़ों का आना
उस समय के अङ्गरेज़ व्यापारी
अंगरेज़ों के भारत आने और उस समय के इङ्गलिस्तान और भारत
दोनों की हालत का चित्र ऊपर दिया जा चुका है । भारत में उनकी १००
साल से ऊपर की कोशिशों और काररवाइयों का विस्तृत हाल प्रामाणिक
अंगरेज़ लेखकों ही के आधार पर पाठकों को इस पुस्तक में मिलेगा ।
औरङ्गज़ेब के समय तक भारत के अन्दर अंगरेज़ व्यापारियों की हालत
क़रीब क़रीब वैसी ही थी जैसी आजकल के भारत में हींग बेचने वाले
काबुलियों या काग़ज़ के खिलौने बेचने वाले चीनियों की । औरङ्गज़ेब की
अनुदार और अदूरदर्शी नीति ने थोड़े दिनों में चारों ओर छोटी छोटी और
एक दूसरे की प्रतिस्पर्धी रियासतें पैदा कर दीं, साम्राज्य की केन्द्रीय शक्ति
को निर्बल कर दिया, और देश के अन्दर हिन्दू और मुसलमानों के परस्पर
प्रेम और एकता की उन अलौकिक राष्ट्रीय लहरों को एक समय के लिए
पीछे हटा दिया जो कबीर के समय से लेकर क़रीब तीन सौ साल की लगा-
तार कोशिशों से देश को चिरस्थाई सुख और समृद्धि की ओर ले जाती
हुई दिखाई दे रही थीं । देश के शत्रुओं को अपनी कोशिशों के लिए खुला
मैदान मिल गया ।
औरङ्गज़ेब की मृत्यु के चन्द साल के अन्दर ही मद्रास और बंगाल में
ईस्ट इण्डिया कम्पनी की साज़िशें शुरू हो गईं जो बढ़ते बढ़ते औरङ्गज़ेब की
मृत्यु के पचास साल बाद प्लासी के मैदान में अपना रंग लाईं। कुदरती तौर
पर अंगरेज़ों का हित इसी में था कि भारतीय जीवन की उस समय की
अव्यवस्था को जिस तरह हो सके चिरस्थाई बना दें और राष्ट्रीय ऐक्य की