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भारत में अंग्रेजी राज (पण्डित सुन्दरलाल - ब्रिटिश औपनिवेशिक लूट व षड्यन्त्रों का प्रामाणिक इतिहास)

भारत में अंग्रेजी राज (पण्डित सुन्दरलाल - ब्रिटिश औपनिवेशिक लूट व षड्यन्त्रों का प्रामाणिक इतिहास)

Bharat Mein Angreji Raj by Pandit Sunderlal

पण्डित सुन्दरलाल (प्रस्तावना: महात्मा गाँधी) द्वारा

DevanagariHindipublished727 पृष्ठ

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अंगरेज़ों का आना १६३
चाहता तो बात की बात में मद्रास के क़िले पर क़ब्ज़ा कर लेता और कम
से कम दक्षिण भारत से उसी समय अङ्गरेज़ों को निकाल कर बाहर कर
देता। किन्तु मद्रास पहुँचते ही उसने अपने वचन का पालन किया। सुलह
की बातचीत हुई और विजयी हैदरअली ने पराजित अङ्गरेज़ों के साथ सुलह
स्वीकार कर ली।
सन् ५७' के विप्लव में अवध के अन्दर बेशुमार ही मिसालें इस बात
की मिलती हैं, जिनमें कि अवध के उन ज़मींदारों और ताल्लुक़ेदारों ने,
जो अपने अपने इलाक़े में विप्लव के खुले नेता थे, मुसीबतज़दा अङ्गरेज़
पुरुषों, स्त्रियों और बच्चों को अपने क़िलों के अन्दर आश्रय दिया, और
उनकी प्रार्थना पर उन्हें अपनी किश्तियों में बैठा कर इलाहाबाद और
बनारस भेज दिया। किन्तु चन्द महीने के बाद ये ही अंगरेज़ अवध वापस
जाकर उन्हीं ताल्लुक़ेदारों के विरुद्ध लड़ते हुए दिखाई दिए। इस तरह की
और अधिक मिसालें देना केवल इस विषय को विस्तार देना होगा।
जिन भारतवासियों ने अगरेज़ों और भारत के सम्बन्ध में समय समय
पर देशभक्तता का परिचय दिया उनमें भी शायद बिरले ही ऐसे होंगे
जिन्होंने अंगरेज़ों के साथ अपने वचनों का पालन न किया हो। सच यह
है कि यदि मध्य काल के और आजकल के यूरोप के इतिहास को ध्यान से
पढ़ा जाय तो मालूम होगा कि देशीयता या राष्ट्रीयता के सङ्कीर्ण भाव यूरोप
की विशेष सामाजिक परिस्थिति की एक उपज हैं। मध्य कालीन यूरोप में
ज़मींदारों और काश्तकारों, रईसों और ग़रीबों के बीच वह ज़बरदस्त संग्राम
क़रीब एक हज़ार साल तक जारी रहा जिसकी वजह से वहाँ की जनता में
अपने और पराए का भेद ज़ोरों से जम जाना क़ुदरती था। धार्मिक पक्षपात
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