भारत में अंग्रेजी राज (पण्डित सुन्दरलाल - ब्रिटिश औपनिवेशिक लूट व षड्यन्त्रों का प्रामाणिक इतिहास)
Bharat Mein Angreji Raj by Pandit Sunderlal
पण्डित सुन्दरलाल (प्रस्तावना: महात्मा गाँधी) द्वारा
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की अवहेलना शुरू की, उनकी आँखें खुल गई । उन्होंने सन् ५७ में विदेशी
सत्ता से अपने तईं आज़ाद करने का वह ज़ोरदार प्रयत्न किया जिसने एक
बार वास्तव में अंगरेज़ी राज की जड़ों को हिला दिया और उसके अस्तित्व
को ख़तरे में डाल दिया। सन् ५७ का स्वाधीनता संग्राम हमारी पराधीनता
के इतिहास की उस समय तक की सब से महत्वपूर्ण घटना थी। उसकी
प्रगति और असफलता के कारणों को हमने इस पुस्तक में विस्तार के साथ
दूसरे स्थान पर बयान किया है।
स्वाधीनता के प्रयत्न
वास्तव में अंगरेज़ी हुकूमत भारतवर्ष में बाज़ाब्ता और पूरी तरह सन्
१८५६ ही से जमी। उस समय ही भारतीय साम्राज्य की बाग विधिवत्
उस व्यापारी कम्पनी के हाथों से नहीं, जो अन्त समय तक दिल्ली सम्राट
की प्रजा होने का बनावटी दावा करती रही, बल्कि स्वयं भारत के अन्तिम
सम्राट बहादुरशाह के हाथों से छीनकर इंगलिस्तान की मलका विक्टोरिया के
हाथों में दी गई। ७० साल का समय या १७० साल का समय भी किसी
देश के इतिहास में और ख़ास कर भारत जैसे प्राचीन और सुसभ्य देश के
इतिहास में कोई लम्बा समय नहीं होता। सन् ५७ के बाद भी भारत ने
अपनी आज़ादी की कोशिशों को एक क्षण के लिए भी ढीला होने नहीं
दिया। सन् ५७ की क्रान्ति और पंजाब के कूका विद्रोह में केवल १५ साल
का अन्तर था, सन् ५७ और काँग्रेस के जन्म में २८ साल का, काँग्रेस के
जन्म और बङ्गभङ्ग के बाद के आन्दोलन में २० साल का, बङ्गभङ्ग और उस
असहयोग आन्दोलन में, जिसने फिर एक बार सन् ५७ की क्रान्ति से भी
अधिक और उससे उच्चतर उपायों द्वारा अंगरेज़ी राज के अस्तित्व को ख़तरे