भारत में अंग्रेजी राज (पण्डित सुन्दरलाल - ब्रिटिश औपनिवेशिक लूट व षड्यन्त्रों का प्रामाणिक इतिहास)
Bharat Mein Angreji Raj by Pandit Sunderlal
पण्डित सुन्दरलाल (प्रस्तावना: महात्मा गाँधी) द्वारा
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आदमियों को डाँटा और कहा—"मुमकिन है, मेरी आस पास की देसी
रिआया ने हसद के सबब फ़िरंगियों से कुछ झगड़ा किया हो। क्यों न फ़िरंगी
जिस तरह हो सके, अपनी हिफ़ाज़त का इन्तज़ाम करें ? ये बेचारे परदेसी
बहुत दूर से आए हैं और बहुत मेहनती हैं। मैं हरगिज़ दख़ल न दूँगा ।”*
भारत के व्यापारियों को भी उस समय तक कभी किसी दूसरे देश के
व्यापारियों से किसी तरह का कडुवा अनुभव न हुआ था। व्यापारी या
आक्रमक, अंगरेज़ों से पहले के किसी भी विदेशी के ज़रिये भारतीय
व्यापारियों को किसी तरह की हानि न पहुँची थी। इसके विपरीत विविध
देशों के व्यापारियों के मेल जोल से सदा एक दूसरे को लाभ ही पहुँचता
रहा था। इसलिए यह भी असम्भव था कि भारतीय व्यापारी, जिनको
अन्त में ईस्ट इण्डिया कम्पनी के कारण सबसे अधिक हानि पहुँची, कम्पनी
के कुचक्रों का मुक़ाबला करने या उसे देश से बाहर निकालने का मिल
कर कोई प्रयत्न करने की सोचते। इसके विपरीत उस समय के अंगरेज़
व्यापारी आयरलैण्ड और स्कॉटलैण्ड के व्यापारों का हाल ही में नाश करके
इन परस्पर नाशकारी तरीक़ों का पूरा अनुभव प्राप्त कर चुके थे। यहाँ तक
कि स्कॉटलैण्ड तक को, 'बिल ऑफ़ सिक्यूरिटी' पास करके इंगलिस्तान के
इन नाशकर प्रयत्नों से अपने व्यापार की रक्षा करनी पड़ी थी।
(३) भारतवासियों को इससे पहले किसी विदेशी के वचनों पर
अविश्वास करने का कोई कारण न था। भारत में सन्धिपत्रों और राजकीय
एलानों को सदा से पवित्र माना जाता था और यूरोपियनों के आने से
पहले एशियाई नरेशों के सन्धिपत्र और एलान अधिकतर सच्चे होते
- Our Empire in Asia, by Torrens, pp. 14, 15