भारत में अंग्रेजी राज (पण्डित सुन्दरलाल - ब्रिटिश औपनिवेशिक लूट व षड्यन्त्रों का प्रामाणिक इतिहास)
Bharat Mein Angreji Raj by Pandit Sunderlal
पण्डित सुन्दरलाल (प्रस्तावना: महात्मा गाँधी) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंहमारा कर्तव्य १६६
सकता है। इस सम्बन्ध में हमें सब से पहले दो बातों की ओर से सावधान
रहना होगा। एक यह कि घबराहट या किसी तरह के आवेश में आकर
हम मानव जीवन के उन उच्च नैतिक सिद्धान्तों से न डिगने पाएँ जिनके
बिना मानव समाज का सुख से रह सकना सर्वथा असम्भव है और जो
मनुष्य के ऐहिक जीवन के आध्यात्मिक आधार स्तम्भ हैं। दूसरे यह कि
नैराश्य या अकर्मण्यता को हमें एक क्षण के लिए भी अपने पास नहीं
फटकने देना चाहिए। इन दोनों बातों में से हम पहले दूसरी के विषय में
कुछ कहना चाहते हैं।
आज से पौने दो सौ साल पहले भारतवर्ष की एक चप्पा ज़मीन पर भी
अंगरेज़ों का किसी तरह का अधिकार न था। आज (१६२६) से ८७ साल
पहले यानी सन् १८४२ तक वे दिल्ली सम्राट को अपना सम्राट स्वीकार
करते थे, अपने तईं उसकी विनम्र आज्ञाकारी प्रजा कहा करते थे,
ईस्ट इण्डिया कम्पनी के सिक्कों में दिल्ली सम्राट का नाम खुदा
होता था और कम्पनी के भारतीय इलाक़ों के अंगरेज़ गवरनर जनरल की
मोहर में 'दिल्ली के बादशाह का फ़िदविए ख़ास' ये शब्द खुदे रहते थे।
निस्सन्देह अनभ्यस्त और भोले भारतवासी विदेशियों की इन चालों से
धोखे में आते रहे। दिल्ली दरबार की निर्बलता ने धीरे धीरे उन्हें और भी
अपाहज कर दिया। किन्तु ज्योंही भारतवासियों ने यह अनुभव करना शुरू
किया कि इस नए राजनैतिक प्रयोग के नतीजे विविध प्रान्तों में देशी
रियासतों और देश के जीवन के लिए कितने घातक साबित हो रहे हैं,
ज्योंही सम्राट शाहआलम की मृत्यु (१८०६) के बाद कम्पनी के प्रति-
निधियों ने सम्राट अकबरशाह और उसके बाद सम्राट बहादुरशाह के पद