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भारत में अंग्रेजी राज (पण्डित सुन्दरलाल - ब्रिटिश औपनिवेशिक लूट व षड्यन्त्रों का प्रामाणिक इतिहास)

भारत में अंग्रेजी राज (पण्डित सुन्दरलाल - ब्रिटिश औपनिवेशिक लूट व षड्यन्त्रों का प्रामाणिक इतिहास)

Bharat Mein Angreji Raj by Pandit Sunderlal

पण्डित सुन्दरलाल (प्रस्तावना: महात्मा गाँधी) द्वारा

DevanagariHindipublished727 पृष्ठ

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पृष्ठ 231

अंगरेज़ों का आना १६७
केवल सवा सौ साल पहले यानी १९ वीं सदी के शुरू तक जो देश
अपने उद्योग धन्धों की दृष्टि से शायद केवल एक चीन को छोड़कर
संसार का सब से अधिक उन्नत देश स्वीकार किया जाता था और जो
उस समय तक आधे से अधिक सभ्य संसार की, जिसमें इङ्गलिस्तान और
फ्रांस भी शामिल थे, कपड़े इत्यादि की आवश्यकता को पूरा करता था,
वह आज अपने जीवन की एक एक आवश्यकता के लिए, यहाँ तक कि
अपना तन ढकने के लिए दूसरों का मोहताज है। इन सब बातों के अकाट्य
सबूत इस पुस्तक में उचित स्थान पर दिए जायेंगे।
ऊपर लिखी हानियों से कहीं अधिक भयङ्कर हानि जो दूसरे देश की
राजनैतिक अधीनता किसी भी देश को पहुंचा सकती है, वह उस देश के
चरित्र का नाश है। समाज विज्ञान का प्रसिद्ध अमरीकन विद्वान ई० ए०
रॉस लिखता है।
“किसी भी राष्ट्र के चरित्र के अधःपतन के सबसे प्रबल
कारणों में से एक कारण उस राष्ट्र का किसी विदेशी क़ौम के
अधीन हो जाना है।”*
अपने समय के भारतवासियों के चरित्र को बयान करते हुए यूनानी
इतिहास लेखक एरियन लिखता है कि—
“इन लोगों में अद्भुत वीरता है, युद्ध विद्या में ये
समस्त एशिया निवासियों से बढ़कर हैं। सरलता और सच्चाई के
लिए ये विख्यात हैं। ये इतने समझदार हैं कि इन्हें कभी मुक़दमे-

  • "Subjugation to a foreign yoke is one of the most potent causes of
    the decay of national character."—Professor E. A. Ross: Principles of
    Sociology, pp. 132, 133.