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भारत में अंग्रेजी राज (पण्डित सुन्दरलाल - ब्रिटिश औपनिवेशिक लूट व षड्यन्त्रों का प्रामाणिक इतिहास)

भारत में अंग्रेजी राज (पण्डित सुन्दरलाल - ब्रिटिश औपनिवेशिक लूट व षड्यन्त्रों का प्रामाणिक इतिहास)

Bharat Mein Angreji Raj by Pandit Sunderlal

पण्डित सुन्दरलाल (प्रस्तावना: महात्मा गाँधी) द्वारा

DevanagariHindipublished727 पृष्ठ

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अंगरेज़ों का आना १८७

( १ ) अपने और पराए का भाव जिसे आज कल 'राष्ट्रीयता' का भाव
कहा जाता है उदार भारतवासियों के चित्तों में कभी भी अधिक स्थान न
कर पाया था । हम ऊपर लिख चुके हैं कि १८ वीं सदी के शुरू में भारत के
अन्दर कोई प्रबल केन्द्रीय शक्ति न रही थी । अनेक छोटी बड़ी शक्तियाँ उस
समय देश के अन्दर प्राधान्य प्राप्त करने के लिए उत्सुक और प्रयत्नशील
थीं। मुसलमानों और हिन्दुओं में भी ऊपर के कारणों से जगह जगह एक
तरह की पृथकता पैदा हो गई थी। ऐसी हालत में एक तीसरी बाहर की
ताक़त अनेक लोगों को निष्पक्ष मध्यस्थ की तरह दिखाई दी। इससे पहले
जितने लोगों ने बाहर से आकर भारत में प्रवेश किया उनमें से, उन थोड़े सों
को छोड़ कर, जो महमूद ग़ज़नवी या नादिरशाह की तरह लूट मार कर
चार दिन के अन्दर वापस चले गए, और किसी से भारतवासियों को किसी
तरह का कड़ुवा अनुभव न हुआ था। हम ऊपर दिखा चुके हैं कि इन सब
लोगों ने भारत में बस कर भारत को अपना घर बना लिया और समस्त
भारतवासियों की उन्नति और विकास में पूरा पूरा भाग लिया। ऐसी सूरत
में अपने और और का भेद भारतवासियों के लिए कोई विशेष अर्थ ही न रखता
था । भारतवासियों के धार्मिक और नैतिक आदर्श भी उनके अन्दर इस तरह
का विचार पैदा होने न दे सकते थे। कुदरती तौर पर भारतवासियों ने सात
समुद्र पार के यूरोपनिवासियों के साथ उसी तरह के प्रेम और सत्कार का
व्यवहार किया जिस तरह का वे आपस में एक दूसरे के साथ करने के आदी
थे। ऐसी सूरत में अंगरेज़ों का विविध भारतीय नरेशों के परस्पर संग्रामों
में कभी एक और कभी दूसरे का साथ देना या अपनी साज़िशों द्वारा इस
तरह के संग्राम खड़े करके उनसे पूरा लाभ उठाना अत्यन्त सरल हो गया ।