भारत में अंग्रेजी राज (पण्डित सुन्दरलाल - ब्रिटिश औपनिवेशिक लूट व षड्यन्त्रों का प्रामाणिक इतिहास)
Bharat Mein Angreji Raj by Pandit Sunderlal
पण्डित सुन्दरलाल (प्रस्तावना: महात्मा गाँधी) द्वारा
१२४ पुस्तक प्रवेश
प्राणनाथ
औरंगज़ेब के अन्त के दिनों में प्राणनाथ और धरनीदास के नाम भी
मशहूर हैं। प्राणनाथ ने अपनी गुजराती पुस्तक 'कुलज़ुम सरूप' में वेदों
और क़ुरान दोनों से हवाले देकर दोनों के सिद्धान्तों की समानता दर्शाई
है। प्राणनाथ जाति भेद, मूर्तिपूजा और ब्राह्मणों के प्रभुत्व के विरुद्ध था ।
उसके अनुयाइयों में हिन्दू और मुसलमान दोनों थे। और हर नए दीक्षा
लेने वाले को हिन्दू और मुसलमान दोनों के साथ बैठ कर भोजन करना
पड़ता था। यही उनकी दीक्षा थी। प्राणनाथ की एक ख़ास पुस्तक 'क़यामत
नामा' है, जिसमें उसने साफ़ लिखा है कि—"तुम सब का, चाहे हिन्दू
हो या मुसलमान, एक ईमान होना चाहिए।" इस पुस्तक में उसने यहूदी,
ईसाई, मुसलमान और हिन्दू सब के पीर, पैग़म्बरों और महात्माओं की
जीवनियाँ दी हैं और सब में मौलिक समानता दर्शाई है। ईश्वर के लिए
उसने अल्लाह और खुदा दोनों नामों का उपयोग किया है ।
अन्य प्रयत्न
जगजीवनदास, बुल्ला साहब, केशव, चरनदास, सहजोबाई, दयाबाई,
ग़रीबदास, शिवनारायन, रामसनेही इत्यादि के उपदेशों का भी ठीक यही
सार था । जगजीवन के शिष्यों में ब्राह्मण, ठाकुर, चमार और मुसलमान,
सब जातियों के लोग शामिल थे । बुल्ला साहब के उपदेशों में फ़ारसी के
शब्द और सूफ़ी परिभाषाएँ भरी हुई हैं । बुल्ला साहब और केशव दोनों,
दिल्ली के एक मुसलमान फ़क़ीर यारी साहब के शिष्य थे । मुसलमान
फ़क़ीरों के हिन्दू शिष्य और हिन्दू फ़क़ीरों के मुसलमान शिष्य उन दिनों
लाखों की तादाद में पाए जाते थे । सहजो और दयाबाई दोनों स्त्रियाँ थीं
मानव धर्म १२५
और चरनदास की शिष्य थीं। चरनदास ने मूर्तिपूजा का विरोध किया, गुरु
की महिमा और भक्ति का उपदेश दिया। ग़रीबदास कबीर का अनुयायी था,
उसके पद्यों में भी फ़ारसी के शब्द और सूफ़ी परिभाषाएं भरी हुई हैं।
रामसनेही सम्प्रदाय का संस्थापक रामचरन भी मूर्तिपूजा का कट्टर
विरोधी था। ये लोग भी दिन में पाँच मरतबा प्रार्थना करते थे और हर
जाति और हर मज़हब के लोगों को अपने में ले लेते थे। स्वामी नारायन
सिंह की क़ायम की हुई शिवनारायनी सम्प्रदाय में भी सब जाति और सब
मज़हबों के लोग लिए जाते थे। जब कोई शिवनारायनी मरता था तो
उसकी अन्तिम इच्छा के अनुसार उसके शरीर को दफ़न कर दिया जाता था,
या फूँक दिया जाता था और या दरिया में बहा दिया जाता था। मुग़ल
सम्राट मोहम्मदशाह स्वामी नारायनसिंह का शिष्य था। मोहम्मदशाह की
सहायता से यह सम्प्रदाय कुछ दिनों खूब फैली।
पिछले दो तीन सौ साल के अन्दर इनमें से अनेक सम्प्रदायों के रूप
में आकाश पाताल का अन्तर पड़ गया और कहीं कहीं उनके अनुयाइयों का
रहन सहन सम्प्रदाय के क़ायम करने वालों की इच्छा और उनके उपदेशों के
ठीक विपरीत साँचे में ढल गया, फिर भी सम्राट मोहम्मदशाह का दस्तख़ती
परवाना अभी तक शिवनारायनियों के मुख्य मठ बलिया ज़िले में मौजूद है।
अठारवीं सदी में सहजानन्द, दुलनदास, गुलाल, भीका और पल्टूदास
के नाम काफ़ी मशहूर हैं।
जगजीवन के शिष्य दुलनदास ने अपने पद्यों में मुसलमान सूफ़ियों
मनसूर, शम्स तबरेज़, निज़ामुद्दीन, हाफ़िज़, बूअली क़लन्दर और फ़रीद
१२६ पुस्तक प्रवेश
की खूब तारीफ़ें की हैं और ईश्वर को "अल्लाह ला मकाँ" बताया है । गुलाल,
भीका और पल्टूदास के कोई कोई पद्य कविता, भाव और भक्तिरस, तीनों
की दृष्टि से अत्यन्त उच्च कोटि के हैं। इन सब में सूफ़ी परिभाषाएँ भरी
हुई हैं। ख़ुदा को उन्होंने प्रायः 'हक़' (सत्य) कह कर पुकारा है।
पल्टूदास का एक पद है—
पूरब में राम है पच्छिम खुदाय है,
उत्तर औ दक्खिन कहो कौन रहता ।
साहिब वह कहाँ है, कहाँ फिर नहीं है,
हिन्दू औ तुरुक तोफ़ान करता ॥
हिन्दू औ तुरुक मिलि परे हैं खँचि में,
अपनी बर्ग दोउ दोन बहता ।
दास पलटू कहै साहिब सब में रहै,
जुदा ना तनिक मैं सांच कहता ॥
यानी—यदि राम पूरब में है और ख़ुदा पच्छिम में है, तब फिर उत्तर
और दक्खिन में कौन रहता है ? ख़ुदा कहाँ है और कहाँ नहीं है ? हिन्दू
और मुसलमान व्यर्थ तूफ़ान खड़ा करते हैं । हिन्दू और मुसलमान लड़ते'हैं
और दोनों मज़हबों को एक दूसरे के विरुद्ध खँचते हैं । दास पलटू सच
कहता है, ख़ुदा सब में है, वह हरगिज़ बटा हुआ नहीं है । यही सच है।
सत्यपीर की पूजा
जिस तरह उत्तर भारत में हिन्दू और मुसलमानों के धार्मिक मेल की
लहरें चल रही थीं, उसी तरह बङ्गाल और महाराष्ट्र में भी उनके अक्स
दिखाई देने लगे। बारहवीं सदी के बङ्गाल में हिन्दुओं का मुसलमानों की
[Page Header]
मानव धर्म १२७
दरगाहों में मिठाई चढ़ाना, कुरान पढ़ना, और मुसल्मानों के त्योहार
मनाना और इसी तरह मुसल्मानों का हिन्दुओं के धार्मिक रिवाजों की ओर
क्रियात्मक आदर दिखलाना एक आम बात थी। इसी मेल जोल में से
बङ्गाल के अन्दर एक नए देवता की पूजा शुरू हुई, जिसे 'सत्यपीर' कहते
थे। हिन्दू और मुसल्मान दोनों सत्यपीर की पूजा करते थे। कहा जाता है
कि गौड़ का बादशाह हुसेनशाह इस नई सम्प्रदाय का संस्थापक था।
निस्सन्देह सत्यपीर की पूजा सम्राट् अकबर के 'दीने इलाही' का एक
प्रारम्भिक रूप थी।
चैतन्य
पन्द्रवीं सदी के अन्त में बङ्गाल के अन्दर महाप्रभु चैतन्य का जन्म
हुआ। दिनेशचन्द्र सेन ने बङ्गला भाषा और बङ्गला साहित्य के इतिहास
पर एक अत्यन्त महत्त्वपूर्ण पुस्तक लिखी है। उसमें वह लिखता है कि
चैतन्य के जन्म से पहले—
“ब्राह्मणों का प्रभुत्व बहुत कष्टकर हो गया था। कुलीनता
के पक्का होने के साथ साथ जाति भेद अधिकाधिक कड़ा होता
चला गया। ब्राह्मण लोग कहने के लिए अपने धर्म में ऊँचे आदर्शों
का प्रतिपादन करते थे, किन्तु जाति बन्धन के सबब मनुष्य
मनुष्य में अन्तर बढ़ता जा रहा था। नीची जातियों के लोग
ऊँची जातियों के लोगों के स्वेच्छाचार के नीचे आहें भर रहे थे।
इन ऊँची जाति के लोगों ने नीची जाति वालों के लिए विद्या के
दरवाज़े बन्द कर रक्खे थे। इन लोगों के लिए अधिक ऊँचे
जीवन में प्रवेश करने की मनाही थी और नए पौराणिक धर्म
१२८ पुस्तक प्रवेश
पर ब्राह्मणों का ठेका हो गया था, मानो वह कोई बाज़ारी
चीज़ हो ।"*
इसलाम के सरल धार्मिक सिद्धान्तों और मनुष्य मात्र की समता के
आदर्श ने उस समय के बङ्गाली समाज में तहलका मचा दिया । चैतन्य ने
इस स्थिति पर गम्भीरता के साथ विचार किया । वह घर बार छोड़ कर
देशाटन करने लगा । अनेक साधुओं और फ़क़ीरों से उसकी भेंट हुई ।
चैतन्य के जीवन चरित्र का रचयिता कृष्णदास लिखता है कि बृन्दावन में
एक मुसलमान पीर के साथ चैतन्य की भेंट हुई और पीर ने अपनी धार्मिक
पुस्तक के आधार पर चैतन्य को एक ख़ुदा की पूजा का उपदेश दिया । जदु
भट्टाचार्य लिखता है—"चैतन्य के जीवन की अनेक घटनाएँ ऐसी हैं जिनसे
पूरी तरह साबित है कि वह मुसलमानों से बड़ा प्रेम करता था ।"† इसमें
सन्देह नहीं कि मुसलमानों के विचारों का चैतन्य के उपदेशों पर बहुत
बड़ा असर पड़ा ।
चैतन्य ने गुरु की सेवा और भक्ति का उपदेश दिया । जाति भेद का
उसने कड़ा विरोध किया । ब्राह्मणों के तमाम कर्मकाण्ड को उसने त्याज्य
बताया । चैतन्य के शिष्यों में हिन्दू और मुसलमान, उच्च जाति के लोग
और नीच जाति के लोग, सब शामिल थे । उसके मुख्य शिष्यों में से तीन
रूप, सनातन और हरिदास, मुसलमान थे । अपने तमाम शिष्यों में वह
हरिदास से सब से अधिक प्रेम रखता था ।
कर्ताबाबा
चैतन्य की सम्प्रदाय की एक शाखा का नाम कर्ताभज था । उसका
- History of Bengali Language and Literature, by Dinesh Chandra Sen.
† Jadu Bhattacharya: Hindoo Castes and Sects. p. 464.
मानव धर्म १२६
संस्थापक कर्ताबाबा एक मुसलमान फ़क़ीर की दुआ से पैदा हुआ था और
उस फ़क़ीर ने ही उसे पाला था । कर्ताबाबा के बाईस मुख्य शिष्य 'बाईस
फ़क़ीर' के नाम से मशहूर हुए । इनमें से एक रामदुलाल की बाबत, जो
कर्ताबाबा का उत्तराधिकारी हुआ, कहा जाता है कि उसके अन्दर उसी
मुसलमान फ़क़ीर की रूह आ गई थी । इस सम्प्रदाय के आचार्यों में से
अनेक हिन्दू हुए और अनेक मुसलमान । ये लोग केवल एक ईश्वर को
मानते थे, गुरु को ईश्वर का अवतार मानते थे, दिन में पाँच बार गुरुमन्त्र
का जाप करते थे, मांस मदिरा से परहेज़ करते थे, शुक्रवार को पवित्र दिन
मानते थे और उसे धर्म चर्चा में व्यतीत करते थे, जात पाँत, ऊँचनीच,
हिन्दू, मुसलमान, ईसाई का उनमें कोई भेद न था, साल में कम से कम
एक दो बार सम्प्रदाय के सब लोग एक साथ मिल कर भोजन करते थे,
इत्यादि ।
बौद्ध ग्रन्थों में मुसलमान
बङ्गाल में जिन दिनों बौद्धों के ऊपर शैवों के अत्याचार जारी थे,
मालूम होता है, एक दरजे तक बौद्धों को मुसलमानों से सहायता, दिलासा
और आश्रय मिला । बङ्गाल के उस समय के बौद्ध ग्रन्थों, 'शून्य पुराण',
'धर्म पूजा पद्धति', 'धर्म गजन', 'बाद जननी', इत्यादि में और बौद्ध गीतों
में ब्राह्मणों के प्रति कोष और बदले का भाव और मुसलमानों, मुसलिम
विचारों और मुसलमान ग्रन्थों के प्रति प्रेम भरा हुआ है । उस समय के
इन बौद्ध काव्यों से कुछ विचित्र बातों का पता चलता है । मसलन यह कि
उस समय बङ्गाल जाने वाले बहुत से मुसलमान मांस से परहेज़ करते थे,
एक जगह लिखा है—
ह
१३० पुस्तक प्रवेश
“खोंकड़ ( ? ) पच्छिम की तरफ को मुँह किए ईश्वर से
प्रार्थना कर रहा है ।
“कोई अल्लाह की पूजा करता है, कोई अली की और कोई
महमूद साईं की ।
“मियाँ किसी जीव की हत्या नहीं करता और न मुरदार
खाता है ।
“धीमी आँच के ऊपर वह अपना भोजन पका रहा है ।
“जात पाँत के भेद अब धीरे धीरे टूट जायेंगे, क्योंकि देखो
हिन्दू कुटुम्ब के अन्दर एक मुसलमान है ।
✕ ✕ ✕
“ऐ खुदा-! मैं जानता हूँ तू और सब से बड़ा है । मैं बहुत
चाहता हूँ कि तेरे मुँह से कुरान सुनूँ ।”
महाराष्ट्र सन्त
उत्तर भारत की तरह महाराष्ट्र के हिन्दू महात्माओं ने भी हिन्दू और
मुसलमान धर्मों को मिलाने का प्रयत्न किया । प्रसिद्ध महाराष्ट्र विद्वान
महादेव गोविन्द रनाडे लिखता है—
“इसलाम का कठोर एक ईश्वरवाद कबीर, नानक इत्यादि
सन्तों के चित्तों में साफ़ घर कर गया था । हिन्दू त्रिमूर्ति दत्तात्रेय
के उपासक अक्सर अपने देवता को मुसलमान फ़क़ीर के से कपड़े
पहनाते थे । यही प्रभाव महाराष्ट्र जनता के चित्तों पर और भी
ज़ोरों के साथ काम कर रहा था । ब्राह्मण और अब्राह्मण दोनों
तरह के प्रचारक वहाँ लोगों को उपदेश दे रहे थे कि राम और
मानव धर्म १३१
रहीम को एक समझो, कर्मकाण्ड और जातिभेद के बन्धनों को
तोड़ दो और ईश्वर में विश्वास और मनुष्य मात्र के साथ प्रेम
को सब मिलकर अपना एक समान धर्म बनाओ ।" ✤
नामदेव
महाराष्ट्र का पहला सन्त, जिसने लोगों को जातिभेद, कर्मकाण्ड
और धार्मिक सङ्कीर्णता के बन्धन से हटा कर स्वतन्त्रता, प्रेम और भक्ति
का उपदेश दिया, नामदेव था। रनाडे लिखता है कि नामदेव और दूसरे
सन्तों के उपदेशों का नतीजा यह हुआ कि—मराठी भाषा के साहित्य की
उन्नति हुई, जातिभेद ढीला हुआ, स्त्रियों का पद ऊँचा हुआ, उदारता और
दयालुता फैली, इसलाम के साथ हिन्दू मत का एक दरजे तक मेल हो
गया, कर्मकाण्ड, तीर्थयात्रा इत्यादि का महत्व घटा, प्रेम का महत्व बढ़ा,
अनेक देवी देवताओं की पूजा कम हुई, और विचारों और क्रियाओं दोनों
के क्षेत्रों में राष्ट्र की ताक़त बढ़ी। †
खेचर
नामदेव के गुरु खेचर ने नामदेव को जो उपदेश दिया उससे ज़ाहिर है
कि खेचर मूर्तिपूजा का कट्टर विरोधी था। उसने कहा कि—
“पत्थर का देवता कभी नहीं बोलता, तो फिर वह हमारे
इस जीवन के दुःखों को कैसे दूर कर सकता है ? पत्थर की मूर्ति
को लोग ईश्वर समझ बैठते हैं, किन्तु सच्चा ईश्वर बिलकुल दूसरा
ही है। यदि पत्थर का देवता हमारी इच्छाएँ पूरी कर सकता तो
- Ranade : Rise of the Maratha Power, pp. 50, 51.
† Ibid.
५३२ पुस्तक प्रवेश
गिराने पर वह टूट क्यों जाता ? जो लोग पत्थर के बने हुए
देवता की पूजा करते हैं वे अपनी मूर्खता से सब कुछ खो बैठते
हैं। जो लोग ये कहते हैं और जो ये सुनते हैं कि पत्थर का
देवता अपने भक्तों से बातचीत करता है, वे दोनों मूर्ख हैं।
× × ×।"*
नामदेव के अनेक शिष्यों और अनुयाइयों में पुरुष और स्त्री, हिन्दू
और मुसलमान, ब्राह्मण और मराठा, कुनबी, दरज़ी और कुम्हार यहाँ तक
कि अन्त्यज, महार और धर्मनिष्ठ वेश्याएँ तक शामिल थीं।†
चोखमेला और बहिराम
नामदेव का एक महार शिष्य चोखमेला जिस समय पण्डरपुर के मशहूर
मन्दिर में जाने लगा और ब्राह्मण पुरोहित ने उसे मना किया तो चोख-
मेला ने उत्तर दिया—
“उच्च जाति में पैदा होने से क्या लाभ × × × चाहे मनुष्य
नीच जाति का भी हो, किन्तु यदि वह दिल का सच्चा है, ईश्वर से
प्रेम करता है, सब प्राणियों को अपने समान समझता है, अपने
और दूसरों के बच्चों में कोई भेद भाव नहीं रखता, और सच बोलत .
है, तो उसकी जाति पवित्र है और ईश्वर उससे प्रसन्न है। जिस
मनुष्य के हृदय में ईश्वर पर विश्वास है और मनुष्य के साथ प्रेम
है, उससे जाति कभी न पूछो। ईश्वर अपने बच्चों से प्रेम और
भक्ति चाहता है, वह उनकी जाति की परवा नहीं करता।।”‡
- Bhandarkar : Vaishnavism
† Ranade : Rise of the Maratha Power, p. 146
‡ Ibid p. 154
बहिर्राम भट्ट सत्य की खोज में दो दफ़े हिन्दू से मुसलमान और
मुसलमान से हिन्दू हुआ । अन्त में उसने कहा—"न मैं हिन्दू हूँ और न
मुसलमान ।”
शेख मोहम्मद
दक्खिन के अन्दर शेख मोहम्मद एक बहुत बड़ा भक्त हुआ है। उसके
अनुयायी रमज़ान के रोज़े भी रखते हैं और एकादशी का व्रत भी, मक्के की
भी यात्रा करते हैं और पण्डरपुर के मन्दिर की भी ।
तुकाराम
सन्त तुकाराम दक्खिन का शायद सब से अधिक सर्वमान्य भक्त था ।
कबीर इत्यादि के समान तुकाराम जात पाँत, मूर्तिपूजा, यज्ञ, हवन और
अन्य कर्मकाण्ड का कट्टर विरोधी और एक हरि की भक्ति का प्रचारक था ।
प्रत्येक प्राणी के रूप में उसे हरि ही दिखाई देता था । इस्लाम और हिन्दू
धर्म को मिलाने का तुकाराम का प्रयत्न उसके एक पद्य से ज़ाहिर है जिसका
भाषान्तर यह है—
जो 'अल्लाह' चाहता है, ऐ मेरे बाबा ! वही होता है ।
सब का बनाने वाला सब का बादशाह है। पशु और मित्र, बग़ीचे
और माल, सब जाते रहेंगे । ऐ बाबा ! मेरा चित्त मेरे 'साहेब'
पर लगा है। वही मेरा बनाने वाला है । मैं मन के घोड़े पर
सवार हूं और आत्मा सवारी करती है। ऐ बाबा ! अल्लाह का
ज़िक्र करो, सब उसी के रूप हैं । तुका कहता है, जो मनुष्य इस
बात को समझे, वही दरवेश है ।
बड़े नामों में सब से पहला नाम 'अल्लाह' है । उसे सदा
१३४ पुस्तक प्रवेश
दोहराते रहो, भूलो नहीं। सचमुच अल्लाह एक है, सचमुच नबी
एक है, वहाँ तू भी एक है, वहाँ तू भी एक है, वहाँ तू भी एक
है ! वहाँ न मैं हूँ और न तू है ! ❀
निस्सन्देह हिन्दूमत, बौद्धमत और इसलाम के मेल से उस समय
भारत के अन्दर उत्तर से दक्खिन तक और पूर्व से पच्छिम तक एक सुन्दर
सार्वजनिक मानव धर्म की नींव रक्खी जा रही थी, जिसका मूल मन्त्र
एकता, प्रेम और सब की सेवा था।
भारतीय कला और मुसलमान
निर्माणकला
जिस तरह धार्मिक विचारों पर उसी तरह भारतीय निर्माणकला
और भारत की चित्रकारी पर भी मुसलमानों के आने का बहुत गहरा और
हितकर प्रभाव पड़ा। प्रोफ़ेसर जदुनाथ सरकार लिखता है कि मुसलमानों
के समय में भारत की निर्माणकला ने साफ़ उन्नति की।
ईसा की आठवीं सदी तक भारतीय शिल्पकला पर बौद्धमत का ख़ास
असर था। आठवीं से तेरहवीं सदी तक इस कला में हिन्दू आदर्शों की
प्रधानता रही, किन्तु फिर भी बौद्धमत का प्रभाव उस पर साफ़
दिखाई देता रहा। हम इस विषय की वैज्ञानिक बारीकियों में पड़ना नहीं
- Tukaram's Abhanga, p. 85, 86, Godbole's edition.
सन्त तुकाराम
[ श्री वासुदेव राव सूबेदार, सागर, की कृपा द्वारा
The provided image is completely blank and contains no visible text, marks, or content to transcribe.
भारतीय कला और मुसलमान १३५
चाहते । किन्तु एक दो बातें स्पष्ट हैं । हर देश के लोगों के कला सम्बन्धी
आदर्शों पर बहुत बड़ा असर उस देश की भौगोलिक स्थिति का पड़ता है ।
भारत अभेद्य जङ्गलों, प्रचण्ड ऋतुओं, बड़ी बड़ी नदियों, पहाड़ों और
घनी वनस्पतियों का देश है । यही वजह है कि भारतीय शिल्पकला में
सदा से विशालता, स्थूलता और विस्तार पर अधिक ज़ोर दिया जाता
रहा है । भारत के बनों में बेशुमार तरह तरह की फूल पत्तियाँ इधर से
उधर तक गुथी हुई दिखाई देती हैं, नीचे की ओर या ऊपर की ओर कहीं
भी नज़र डाली जाय, एक गज़ भर ज़मीन सूनी दिखाई नहीं देती ।
यही वजह है कि प्राचीन भारतीय मन्दिरों और प्रासादों की दीवारों
के ऊपर, और कोनों में कहीं एक फुट ज़मीन भी ख़ाली दिखाई नहीं देती ।
पुराने समय के हिन्दू मन्दिरों में नींव के ऊपर नींव, मञ्जिल के ऊपर
मञ्जिल, कङ्गरे के ऊपर कङ्गरा और कलश के ऊपर कलश आकाश तक
पहुँचते हुए दिखाई देते हैं, और इसके साथ साथ कोई कोना या दीवार का
हिस्सा नहीं रहता जो मूर्तियों या चित्रों से न भरा हो । शिल्पकला
विशारदों की राय है कि संसार के किसी भी दूसरे देश की निर्माणकला
विस्तार बाहुल्य और अतिशोभा में हिन्दू निर्माणकला का मुकाबला नहीं
कर सकती ।
इसके ठीक विपरीत अरब एक विशाल रेगिस्तान है, जिसमें दूर दूर
और कहीं कहीं थोड़े से हरे भरे नख़लिस्तान दिखाई देते हैं । इसके ऊपर
अरब की तेज़ गरमी, भोजन और वस्त्र के लिए परिमित और इनी गिनी
सामग्री और रेत के पहाड़ । कुदरती तौर पर मुसलमानों की शुरू की
निर्माणकला में बड़े बड़े भवन, सादी साफ़ दीवारें और ऊँचे मीनार और
१३६ पुस्तक प्रवेश
गुम्बद् अधिक देखने में आते हैं। इसलाम के एक ईश्वरवाद और मूर्तिभञ्ज-
कता ने भी पुराने मूर्तिपूजक धर्मों के मुक़ाबले में मुसलिम कला के इस आदर्श
को अपना एक ख़ास रूप दिया और उसे और अधिक पक्का कर दिया ।
जिस मनुष्य की आँखें प्राचीन हिन्दू मन्दिरों के विस्तार प्रपञ्च से उकता
गई हों उसे एक सीधी सादी मुसलिम मसजिद की साफ़ दीवारों में विश्राम
मिलना क़ुदरती है । इसी तरह जो मनुष्य पुरानी मुसलिम मसजिदों या
प्रासादों की अमिश्रता से ऊब गया हो, उसके लिए हिन्दू निर्माणकला का
बाहुल्य एक दरजे तक अवश्य आकर्षक होगा ।
दो कलाओं का आलिंगन
यह भी स्पष्ट ज़ाहिर है कि इन दोनों आदर्शों के मेल जोल से एक इस
तरह की निर्माणकला को जन्म दिया जा सकता था, जो दोनों की अपेक्षा
सुन्दर और अधिक आकर्षक हो । धार्मिक और जातीय पक्षपात इस तरह
के सम्मिश्रण के रास्ते में बाधक होते हैं, किन्तु फिर भी दो अलग अलग
आदर्शों के मिलने से जाने या अनजाने इस तरह का सम्मिश्रण हुए बिना
नहीं रह सकता । इसके अलावा हम ऊपर दिखला चुके हैं कि मुसलमानों
के भारत आने के समय से ही इस धार्मिक या जातीय पक्षपात के मिटाने
के लिए भी अनेक कोशिशें जारी थीं। जिस तरह धार्मिक विचारों में उसी
तरह निर्माणकला और चित्रकारी के मैदान में भी भारत ने नए आदर्शों को
जन्म देना शुरू किया, जो हिन्दू और मुसलिम दोनों अलग अलग आदर्शों से
उच्चतर थे और जिनके नतीजे भी उन दोनों के नतीजों से अधिक सुन्दर
थे । इन तीनों तरह के आदर्शों को साक्षात करने के लिए हमें एक ओर
दक्खिन के प्राचीन मन्दिरों या जगन्नाथपुरी के मन्दिर, दूसरी ओर अजमेर
[Page Header]
भारतीय कला और मुसलमान १३७
[Body Text]
और दिल्ली इत्यादि की पुरानी मसजिदों, और तीसरी ओर मुग़ल समय के
आगरे और दिल्ली के शाही महलों या भारतीय निर्माणकला के सब से
अधिक सुन्दर नमूने, आगरे के ताज की ओर दृष्टि डाल लेना काफ़ी है।
निस्सन्देह आगरे का ताज संसार की सब से उत्कृष्ट और सब से अधिक
सुन्दर इमारतों में गिना जाता है, भारतीय निर्माणकला के मस्तक पर वह
झूमर का काम देता है, देश की इस पतित अवस्था में भी प्रत्येक भारतवासी
के सच्चे अभिमान और गौरव का पात्र है, और शिल्प के मैदान में इसलाम
से पूर्व के भारतीय आदर्शों और बाद के मुसलिम आदर्शों, दोनों के
प्रेमालिंगन का सबसे सुन्दर नमूना है।
शिल्पकला के पण्डित हमें बताते हैं कि ईसा की तेरहवीं सदी से पहले
की भारत की हिन्दू और मुसलमान इमारतें दो साफ़ अलग अलग आदर्शों
के अनुसार बनी हुई दिखाई देती हैं, किन्तु उसके बाद की हिन्दू इमारतों
पर मुसलिम छाप और मुसलिम इमारतों पर हिन्दू छाप भी उतनी ही
साफ़ दिखाई देती हैं और दोनों के सौन्दर्य को बढ़ाती हुई नज़र आती है।
यही वजह है कि भारत की मुसलिम शिल्पकला, मिश्र की मुसलिम शिल्प-
कला, शाम की मुसलिम शिल्पकला, ईरान की मुसलिम शिल्पकला और
टर्की की मुसलिम शिल्पकला, इन सब में बहुत बड़ा अन्तर है।
दिल्ली और आगरे के अलावा राजपूताना और काशमीर इत्यादि में
भी इस मिश्रित कला आदर्श के काफ़ी नमूने अभी तक मौजूद हैं। सोलवीं
सदी के बने हुए वृन्दावन के कुछ वैष्णव मन्दिर, सोनागढ़ के कुछ जैन मन्दिर,
विजयनगर की अनेक इमारतें और सत्रवीं सदी का बना हुआ मदुरा का
तिरूमलाई नायक का प्रसिद्ध महल भी इसी मिश्रित कला आदर्श के नमूने हैं।
१३८ पुस्तक प्रवेश
सोलवीं सदी के क़रीब 'समाधियाँ' या 'छतरियाँ' बनाना हिन्दुओं में
पहली बार शुरू हुआ और निस्सन्देह यह रिवाज हिन्दुओं में मुसलमानों
से पड़ा। इमारतों में महराब का उपयोग, डाट की गोल छत और आज
कल की उद्यान कला ये तीनों भारत ने मुसलमानों ही से सीखीं। वर्तमान
भारत के सुन्दर से सुन्दर बाग़ मुग़ल सम्राटों के समय के बने हुए हैं, जिनमें
जहांगीर के समय का बना हुआ काश्मीर का शालामार बाग़ अभी तक
संसार का सब से सुन्दर बाग़ स्वीकार किया जाता है।
चित्रकला
इसी तरह चित्रकला में भी दो अलग अलग आदर्शों के मेल से
मुग़ल सम्राटों के अधीन भारत ने एक अधिक उच्च और अधिक सुन्दर
चित्रकला को जन्म दिया। हुमायूँ, अकबर, जहाँगीर और शाहजहाँ
के महलों में सैकड़ों हिन्दू चित्रकार केवल अपनी कला को तरक़्क़ी
देने के लिए बड़ी बड़ी तनख़्वाहें पाते थे। शीराज़, तबरेज़ यहाँ तक
कि चीन के बड़े बड़े चित्रकार भी वहाँ पर मौजूद रहते थे और
निस्सन्देह ये सब एक दूसरे की सहायता से अपनी अपनी कला को उन्नति
देते थे। उस समय की फ़ारसी पुस्तकों और दस्तावेज़ों में जयपुर, ग्वालियर,
गुजरात, काश्मीर इत्यादि के रहने वाले मुग़ल दरबार के अनेक हिन्दू और
मुसलमान चित्रकारों के नाम मिलते हैं, जिनमें से कुछ के हाथ के खिंचे हुए
सुन्दर चित्र अभी तक चित्रकला विशारदों को चकित करते रहते हैं। दिल्ली
और आगरे से लेकर जयपुर, जम्मू, चम्बा, काँगड़ा, लाहौर, अमृतसर और
दक्खिन में तंजोर तक उस समय एक सुन्दर भारतीय चित्रकला फैलती
और उन्नति करती हुई दिखाई देती थी। दिल्ली और आगरे में जिन आदर्शों
मुग़लों का समय १३६
को जन्म दिया जाता था, राजपूताना और शेष भारत के हिन्दू दरबारों
में उन्हीं का अनुसरण किया जाता था। प्रोफ़ेसर जदुनाथ सरकार
लिखता है—
"चित्रकला के मैदान में हमारे चित्रकारों ने जो असाधारण
उन्नति मुग़लों के ज़माने में की वह और कभी नहीं की।" ✼
उस समय के अनेक अंगरेज़ यात्री स्वीकार करते हैं कि जहाँगीर के
उदार प्रोत्साहन के प्रताप से जहाँगीर के समय की भारतीय चित्रकला
संसार भर में सब से अधिक उन्नत चित्रकला थी।†
मुग़लों का समय
मुग़लों के हमले
अब हम यह देखना चाहते हैं कि धार्मिक विचारों, शिल्प और चित्र-
कारी से बाहर बाक़ी भारतीय जीवन पर बाहर के मुसलमानों का क्या
असर पड़ा। हम ऊपर लिख चुके हैं कि मोहम्मद ग़ोरी के हमले के समय
से लेकर ३०० साल तक भारत में लगातार संग्रामों और छोटी बड़ी
सल्तनतों का समय था। इसके बाद दिल्ली के मुग़ल साम्राज्य का समय
- . . . the highest genius was displayed by our artists in this field in the Mughal age."—Mughal Administration by J. N. Sarkar, p. 128.
† History of Jehangir, by Dr. Beniprasad, M. A., pp. 92-94.
१४० पुस्तक प्रवेश
आया । मुग़ल साम्राज्य के दिनों में ही भारत के अन्दर मुसलमानों की
हुकूमत, उनकी सभ्यता और उनका प्रभाव अपनी पराकाष्ठा को पहुँचा ।
किन्तु मुग़लों के शासन और भारत के ऊपर मुग़ल साम्राज्य के उपकारों या
अपकारों को बयान करने से पहले हम मुग़लों द्वारा संसार के अन्य देशों
की विजय पर भी एक नज़र डालना चाहते हैं ।
ईसा की तेरवीं सदी के शुरू में चङ्गेज़ ख़ाँ ने पूर्वी एशिया से निकल
कर उत्तरी चीन, तातार और शेष अधिकांश एशिया को विजय कर लिया
था । सन् १२२७ ईसवी में चङ्गेज़ ख़ाँ की मृत्यु हुई । इसके ६८ साल के
अन्दर चङ्गेज़ ख़ाँ के उत्तराधिकारियों ने भारत को छोड़ कर बाक़ी क़रीब
क़रीब तमाम एशिया को और यूरोप के एक बहुत बड़े हिस्से को मुग़ल
साम्राज्य में शामिल कर लिया । यूरोप पर उनका हमला सन् १२३८
ईसवी में हुआ । यूरोपियन इतिहास लेखक कहते हैं कि ईसा की आठवीं
सदी से जब कि अरबों ने यूरोप पर हमला किया था उस समय से सन्
१२३८ तक कोई और इतनी भयंकर आपत्ति यूरोप पर न आई थी । कुछ
साल के अन्दर ही तमाम रूस, पोलैण्ड, बलकान, हङ्गेरी यहाँ तक कि
उत्तर में बाल्टिक समुद्र और पच्छिम में जरमनी तक, आधे से ज़्यांदा
यूरोप मुग़लों के अधीन हो गया । रूस के ऊपर दो सौ साल तक मुग़लों
की हुकूमत रही । शुरू के मुग़ल बौद्ध थे । स्वयं चङ्गेज़ ख़ाँ बौद्धमत का
अनुयायी था और साथ ही अपने देश मङ्गोलिया के कुछ प्राचीन धार्मिक
विचारों अश्वपूजा इत्यादि को भी मानता था । इन्हीं मुग़लों ने अधिकांश
एशिया और यूरोप को विजय किया । बौद्ध मुग़लों ने मुसलिम ईरान और
मुसलिम इराक़ को फ़तह किया और उसके बाद चङ्गेज़ ख़ाँ के पौत्र हुलाकू
मुग़लों का समय | १४९
ख़ाँ और उसके साथ के दूसरे मुग़लों ने पराजित ईरानियों और अरबों से
इसलाम मत की दीक्षा ली ।
भारत पर मुग़लों का सब से पहला हमला सन् १३९८ ईसवी में तैमूर
का हमला था । महमूद तुग़लक उस समय दिल्ली के तख़्त पर था । किन्तु
सिवाय चन्द रोज़ की लूट खसोट और संहार के जिसमें हिन्दू और मुसलमानों
का कोई फ़र्क़ नहीं किया गया और कोई असर तैमूर के हमले का भारत
पर न रह सका और न तैमूर १५ दिन से ज़्यादा दिल्ली में ठहर सका ।
मुग़लों का दूसरा हमला इस देश के ऊपर सन् १५२६ ईसवी में बाबर
का हमला था । उस समय तक मुग़ल अपनी जन्मभूमि मङ्गोलिया से कहीं
अधिक सभ्य देश ईरान में बरसों रह चुकने के सबब से चङ्गेज़ और तैमूर के
मुक़ाबले में कहीं अधिक सभ्य और सभ्यताप्रेमी बन चुके थे । पानीपत के
मैदान में बाबर ने इब्राहीम लोधी को शिकस्त दी और भारत में मुग़ल
साम्राज्य की नींव रक्खी ।
पानीपत की विजय के बाद ही बाबर ने भारत को अपना घर बना
लिया । हुमायूँ को छोड़कर उसके बाक़ी वंशज भारत ही में पैदा हुए ।
भारत में एक प्रधान शक्ति की ज़रूरत
सम्राट हर्षवर्धन के बाद से यानी ईसा की सातवीं सदी के मध्य से
सोलवीं सदी के शुरू तक क़रीब ९०० साल तक भारत के अन्दर कोई भी
प्रधान राजनैतिक शक्ति ऐसी उत्पन्न होने न पाई थी जो समस्त भारत को
एक शासन के सूत्र में बाँध सकती । ९०० साल के अन्दर भारत अनेक
छोटी बड़ी एक दूसरे की प्रतिस्पर्धी रियासतों का युद्धक्षेत्र बना हुआ था ।
वह समय भारत के इतिहास में राजनैतिक निर्बलता, अनैक्य और अव्यवस्था