सामग्री पर जाएँ
सर्वकोश
संग्रह पर लौटें

भक्ति सागर ग्रन्थ: सन्त चरनदास (अष्टांग योग, धर्म-संवाद एवं सम्पूर्ण भक्ति रस महाकोश)

Bhakti Sagar Granth of Swami Charandas

सन्त चरनदास जी महाराज द्वारा

DevanagariHindipublished690 पृष्ठ

शब्दवर्णन । ३६७
कंचन खंभ जटित हीरनसों नग लागे तामाहिं ।
पटुली अधिक अनूपम सोहै डोरी सुरंग सुहाहिं ॥
चहूँओर बदरा घेरिआये उमड़ घुमड़ गहराहीं ।
गरजत मेघ पवन झकझोरत दामिनि दमक दुराहीं ॥
गावत गीत मलार सहेली मिल मिल दै दै तार ।
झोंटा देत विशाखा ललिता आनंद बढ़ो अपार ॥
बोलत मोर पपीहा कोयल दादुर हंस चकोर ।
हरी भूमि ऋतु भई सुहाई भौंर करत अतिशोर ॥
भीजत रंगरंगीले प्यारे शोभा कही न जाय ।
चरणदास शुकदेव श्यामकी दोउ कर लेत बलाय ॥
झूलत कोइ कोइ संत लगन हिंडोलने ।
पौन उमाह उछाह धरती शौच सावन मास ।
लाजके जहाँ उड़त बगले मोर हैं जगहास ॥
हरष शोक दोउ खंभ रोपे सुरत डोरी लाय ।
बिरह पटरी बैठि सजनी उमंग आवै जाय ॥
सकल विकल तहाँ देत झोंके विपति गावनहार ।
सखी बहुतक रंगराती रँगी पाँचौ नार ॥
नैन बादल उमगि बरसें - दामिनी दमकात ।
बुद्धिको ठहराव नाहीं नेह की नहि जात ॥
शुकदेव कहैं कोई बली झूलै शीश देत अकोर ।
चरणदासा भये बौरे जति वरण कुल छोर ॥
हेली ॥
मो बिरहिन की बात हेली बिरहिन होय सोइ जानिहै।
मैंन बिछोहा जानतीरी अरीहेली बिरहैं कीन्हो घात ॥
या तनकुं बिरहा लगोरी अरीहेली ज्यों घुनलागो काठ।

३६८ श्रीस्वामीचरणदासजीकाग्रन्थ ।
निशि दिन खाये जात है देखूं हरि की बाट ॥
हिरदे में पावक जलैरी अरीहेली ताप नैनाभये लाल ।
आंसू पर आंसू गिरैं यही हमारो हाल ॥
प्रियतमबिन कलनापरैरी अरीहेली कलकल सबअकुलाहिं ।
डिगीपरूं सत ना रहो कब पिय पकरैं बाहिं ॥
गुरु शुकदेव दया करैं री अरीहेली मोहिं मिलावैं लाल ।
चरणदास दुख सब भजैं सदारहूं पति नाल ॥
तरसैं मेरे नैन हेली राममिलन कब होयगो ।
पिय दर्शनबिन क्यों जिऊंरी अरीहेली कैसे पाऊं चैन॥
तीर्थ बर्त बहुतै कियेरी अरीहेली चितदै सुने पुरान ।
बाट . निहारतही रहूं छांड़ दई कुलकान ॥
लगी उमाहेही रहूँरी अरीहेली सुधि नहिं लीनी आय ।
यह योबन योंही चलो चालो जन्म सिराय ॥
बिरहादल साजेरहैरी अरीहेली छिन छिन में दुखदेह ।
मन लालन के वश परो भई भाखसी देह ॥
गुरु शुकदेव कृपा करोजी अरीहेली दीजै बिरहछुटाय ।
चरणदास पियसूं मिलैं शरण तुम्हारी धाय ॥
तिनकूं कछुन सोहाय हेली प्रीतिलगी घनश्यामसूूं ।
जो सुखहै संसारकेरी अरीहेली सो सब दिये बहाय ॥
भवनतजोअरुधनतजोरीअरीहेलीतजीकुलनकीरीत ।
मान बड़ाई सब तजी रहा एक हरि मीत ॥
भूखप्यासनिद्रातजीरीअरीहेलीतजिदियोवादविवाद ।
राग दोष दोऊ तजे तजो पाँच को स्वाद ॥
बहुत डरै सकुची रहैरी अरीहेली कहै न काहू बात ।
लगी रहै हरि ध्यान में ऐसे रैनि बिहात ॥

शब्दवर्णन । ३६६
श्रीशुकदेव भले कहीरी अरीहेली बारम्बार सँभार ।
चरणदासहो श्याम की वही निबाहनहार ॥
मोमन कछु न सुहाय हेली प्रीतिलगी प्यारेलाल सूं ।
हँसिहँसिकै टोना कियोरी अरीहेली दैगयो मुरली गहाय ॥
जबहीं सूं चेटक लगोरी अरीहेली ढूंढूं कुंजनमाहिं ।
बौरीहो दौरौ फिरूं वह छवि दीखै नाहिं ॥
मोहिं मिलावै सांवरोरी अरीहेली ताके बलि बलि जावैँ ।
जन्म जन्म दासी रहूं कबहुं न छोड़ों पावैँ ॥
है कोइ पूरी रामकीरी अरीहेली मोहिं बतावै ठौर ।
जहाँ बिराजै श्यामजी वह बड़भागी पौर ॥
चरणदास घायल भईरी अरीहेली मोहन मारो बान ।
श्रीशुकदेव दिखाइये मेरो जीवन प्रान ॥
वह छवि करूं बखान हेली जा छावसौं नैनालगे ।
हितू देखि तोसूं कहूँरी अरीहेली और न पावैं जान ॥
मोर मुकुट माथे दियेरी अरीहेली कुण्डल सरवन माहिं ।
अलकें बल खाई रहें योगी देखि लुभाहिं ॥
भौंहन मधि बेंदा दिपेरी अरीहेली सुन्दर नैन विशाल ।
मोतीनासा सोहनो अरु बैजन्ती माल ॥
नीमोअङ्ग पीरो खुभोरी अरीहेली घूम घुमारो फेर ।
लाल खराऊं पावँ में मोमन राखत घेर ॥
पहुंचन में पहुंची कड़ेरी अरीहेली अँगुरिन मुँदरीछाप ।
अधरनपै मुरली धरे गावत रीझत आप ॥
चरणदास तिनकी भईरी अरीहेली तनमन डारोवार ।
गुरु शुकदेव सराहिया बुरो कहै परिवार ॥
बंशीबट की छांहिं हेली लाल लाड़िली मैं लखे ।

३७० श्रीस्वामीचरणदासजीकाग्रन्थ ।
दोउ खड़े गावैं हँसैं री अरीहेली अरु डारे गलवाहिं ॥
मोर मुकुट माथे दिपेरी अरी हेली सुन्दर नैन विशाल ।
पीताम्बर पट सोहनो कर मुरली उरमाल ॥
वाके विराजैं चन्द्रिकारीअरीहेली लीलवसन जरतार ।
नखशिख भूषण सोहने अरु फूलनके हार ॥
गुरु शुकदेव बताइयारी अरीहेलीजवहमलिये पिछान ।
चरणदासी तिनकी भई लगोरहै वहि ध्यान ॥
अथ सन्त शूरका अंग ॥
दो० सन्त समान न शूरिमा, कहैं रणजीत विचार ।
टेक गहैं सम्मुख चलैं, बांधि प्रेम हथियार ॥
राग सोरठ ॥
सन्त समान नहीं कोई शूरा ।
मोह सहित सब सेना मारी ऐसो साँवत पूरा ॥
क्षमा कि ढाल गही कर अपने बांधे सत तरवारा ।
कर्म भर्म के दलको पेलै पल पल वारंवारा ॥
सुरत को तीर हृदय को तरकस ध्यान कमान बनावै ।
प्रेमहाथ सूं खैंचनलागे चोट निशाने लावै ॥
बुद्धि विवेक कटारी बांधै वचन विलास की बरछी ॥
सतपुरुषों के हियरे बेधै कहिकहि बतियां तिरछी ॥
चितमें चाव चौगुनो उनके सुन सुन अनहद तूरा ।
अगम पंथसों पग न डिगावै होयजाय चकचूरा ॥
मन हुलास आसधर पीकी सुन्न खेत में धावै ।
चरणदास शुकदेव कहतहैं अमर लोक पद पावैं ॥
राग सोरठ वा आसावरी ॥
साधू- पैज गहै सोइ शूरा ।

शब्दवर्णन । ३७१
काके मुख पर नूर है जब बाजै मारू तूरा ॥
कलँगी अरु गजगाह बनावै इसका परन दुहेला ।
सांवत भेष बनाय चलत है यह नहिं सहज सुहेला ॥
या बानेको नेम यही है पगधरि फिरि न उठावै ।
जो कछुहोय सो आगेहि आगे आगेहीं को धावै ॥
रणमें पैठि झड़ाझड़ खेलै सम्मुख शस्तर खावै ।
खेत न छोड़ै हाई जूझै तबहीं शोभा पावै ॥
गुरु शुकदेव दियोहै हेला ऐसा होय सो आवै ।
चरणदास बाना संतन का तौले शीश चढ़ावै ॥
साधौ टेक हमारी ऐसी ।
कोटि जतन करि छूटै नाहीं कोउ करौ अब कैसी ॥
यह पग धरो संभाल अचल हो बोल चुके सोइ बोली ।
गुरु मारगमें लेन न दीन्हो अब इत उत नहिं डोली ॥
जैसे शूर सती अरु दाता पकरी टेक न टारैं ।
तन करि धनकरि मुख नहिं मोड़ैं धर्मन अपनो हारैं ॥
पावक जारो जल में बोरो टूक टूक करि डारो ।
साध संगति हरि भगतिन छाँडूं जीवन प्राण हमारो ॥
पैज न हारूं दाग न लागे नेक न उतरै लाजा ।
चरणदास शुकदेव दयासूं सबविधि सुधरे काजा ॥
राग सारंग ॥
हमारे राम नामकी टेक टारी ना टरै ।
लाखकरो कोइ कोटि करोजी काहूतैं कुछ ना सरै ॥
ज्यों कामीकूं तिरिया प्यारी ज्यों लोभी को दाम ।
अलमदार कूं अमल पियारो ऐसे हमकूं राम ॥
दुष्ट छुटावै गहि गहिकै पकरों हारिलकी लकड़ी भई ।

३७२ श्रीस्वामीचरणदासजीकाग्रन्थ ।
अब कैसे करि छूटै मोसों रोम रोम तन मन मई ॥
ज्यों प्रहलाद पैज दृढ़ कीन्ही हरणाकुश से बहुअरे ।
उबरोसंत असुर गहिमारो परगटहो हरि आखरे ॥
गुरु शुकदेव सहाय करि है अब पग पाछे क्यों परै ।
चरणहिदास वचन नहिं मोड़ै सूरसती मूये टरै ॥
साधौ टेकगई जाको सबगयो ।
लाजगई अरु काजगये सब वचन धर्म कछु ना रह्यो ॥
जगमें हांस फांस हियमाहीं कायरपन यों दहिगयो ।
अब पछिताये होत कहा है वह पानपतेरो बहिगयो ॥
पैज तजी मुखकारो हूवो धिक धिक जीवन तासको ।
बोझगयो ओछेकी संगति यह प्रताप कुबासको ॥
चरणदास शुकदेव कहै यों टेक न देवो शिर देवो ।
बार बार नर देहन पइये अपयश जगमें क्यों लेवो ॥
राग सोरठ ॥
साधौ भेष वही जामें टेक है ।
टेक नहीं तौ कहा भरोसो टेक विना नरतेकहै ॥
टेक विना कैसी सतवंती टेक विना नहिं सूरमां ।
टेक विना दाता भी नाहीं टेक विना योगी बूबना ॥
टेक विना नहिं भक्ता हरिको टेक विना नहिं सिद्धिहै ।
टेक विना सब भ्रर्मत डोलैं टेक विना नहिं ऋद्धिहै ॥
साधु संत अरु वेद कहत हैं टेक पकरि चढ़ु धाम कूं ।
चरणदास शुकदेव बतावैं टेक मिलावै राम कूं ॥
साधौ जो पकरी सो पकरी ।
अब तौ टेक गही सुमिरण की ज्यों हारिल की लकरी ॥
ज्यों शूरा ने शस्तर लीन्हो ज्यों बनिये ने तखरी ।

शब्दवर्णन । ३७३
ज्यों सतवंती लियो सिंधौरा तार गह्यो ज्यों मकरी ॥
ज्यों कामी कूं तिरिया प्यारी ज्यों किरपिणकूं दमरी ।
ऐसे हमकूं राम पियारे ज्यों बालककूं ममरी ॥
ज्यों दीपककूं तेल पियारो ज्यों पावककूं समरी ।
ज्यों मछलीकूं नीर पियारो बिछुरे देखै यमरी ॥
साधौ के संग हरिगुण गाऊं ताते जीवन हमरी ।
चरणदास शुकदेव दृढ़ायो और छुटी सब गमरी ॥
अरे ले गुरुके बचन चितधररे ।
छिन छिन तेरी आय घटत है बेगि सँभारो घररे ॥
शील क्षमायत दृढ़करि राखो गरब गुमान निवारो ।
पांचौइन्द्री वशकरि अपने मन गनीम को मारो ॥
काया कोटि बुहारि युक्तिसूं सतसिंहासन धरिये ।
तापर बैठि अमर पदवी लै राज अभैपुर करिये ॥
सबपर अमल चलै जब तेरो तो सम और न कोई ।
सेवक साहिब लोहा कञ्चन बूंद समुन्दर होई ॥
विघ्न कलेश आपदा नाशै निर्मल आनंद पावै ।
चरणदास शुकदेव दयासूं रहनि गहनि समुझावै ॥
जब गुरुशब्द नगारे बाजैं ।
पांच पचीसों बड़े मवासी सुनिकै डंका भाजैं ॥
दृढ़ दस्तकले ज्ञान सजावल जाय नगर के माहीं ।
हरि के धाम भजन करि मांगै चित्त चौधरी पाहीं ॥
कानोगोय लोभ के खोटे छलबल पाहीं झूठे ।
काम किसानरु मोह मुकद्दम सबै बांधिकरि लूटे ॥
तृष्णा आमिल मदको मातो पकरि गांवसूं काढै ।
मन राजाको निश्चल झण्डा प्रेमप्रीतिहित गाड़ै ॥

३७४ श्रीस्वामीचरणदासजीका ग्रन्थ ।
सुबुधि दिवान शीलको बक्सी यतको हाकिम भारी ।
धर्म्म कर्म्म सन्तोष सिपाही जाके आज्ञाकारी ॥
सांच करिन्दा पटवारी धीरज नेम बिचारै ।
दया क्षमा अरु बड़ी दीनता पूरी जमा सँभारै ॥
मगन होय चौकस कण करिकै सुमति मेवड़ी मांपै ।
दर्शन द्रव्य ध्यानको पूरण वांटापावै आपै ॥
श्रीशुकदेव अमल करिगाढ़ो सूवस देश बसावै ।
चरणदास हूं तिनको नायव तत परवाना पावै ॥
जोनर इकछत भूप कहावै ।
सतसिंहासन ऊपर बैठे यतही चँवर दुरावै ॥
दया धर्म्म दोउ फौज महालै भक्ति निशान चलावै ।
पुण्य नगारा नौबति बाजै दुर्जन सकल हलावै ॥
पाप जलाय करै चौगाना हिंसा कुबुधि नशावै ।
मोह मुकद्दम काढ़ि मुलकसों लावै राग बसावै ॥
साधन नायब जित तित भेजै दे दे संयम साथा ।
राम दुहाई सिगरै फेरै कोइ न उठावै माथा ॥
निर्भय राजकरै निश्चल है गुरु शुकदेव सुनावै ।
चरणदास निश्चयकरि जानौ बिरलाजन कोइपावै ॥
राग कल्याण ॥
वह राजा सो यह विधि जानै । काया नगर जीतिबो ठानै ॥
काम क्रोध दोउ बल के पूरे । मोह लोभ अति सांवत शूरे ॥
बल अपनो अभिमान दिखावै । इनको मारि राहगढ़ धावै ॥
पांचौ थाने देह उठाई । जब गढ़में कूदै मनलाई ॥
ज्ञान खङ्ग लै द्वन्द मचावै । कपट कुटिलता रहन न पावै ॥
चुनि चुनि दुर्जनहनि सब डारै । रहते सहते सकल विडारै ॥

शब्दवर्णन । ३७५
मन सों ब्रह्म होय गति सोई । लक्षण जीव रहै नहिं कोई ॥
अचल सिंहासन जब तू पावै । मुक्तिखवासी चँवर दुरावै ॥
आठौसिद्धि जहां कर जोरैं । सौहीं ताके मुख नहिं मोरैं ॥
निश्चल राज अमल करै पूरा । बाजै नौबत अनहद तूरा ॥
तीन तीन अरु कोटि अठासी । वै सब तेरी करें खवासी ॥
गुरु शुकदेव भेद दियो नीको । चरणदास मस्तक कियो टीको ॥
रणजीता यह रहनी पावै । थोथी करनी कथनि वहावै ॥
अथ योग का अंग ॥
राग करखा ॥
साधौ गुरु दया योग इह विधि कमायो ।
मूलको शोधि संकोच करि शङ्खिनी खैंचि आपान उलटो
चलायो ॥ बन्ध पर बन्ध जब बन्ध तीनों लगेँ पवन भइ
थकित नभ गर्जिज आयो । द्वादशा पलटि करि सुरति दो दल
धरी दशौ परकार अनहद बजायो ॥ रोंक जब नवन को द्वार
दशवें चढ़ो शून्य के तख्त आनँद बढ़ायो । सहस दल कमल
को रूप अद्भुत महा अमीरस उमँग आ झरि लगायो ॥ तेज
अतिपुञ्ज परलोक जहँ जगमगे कोटि छवि भानु परकाश
लायो । उनमनी और चित हेत करि बसिरहो देखि निज
रूप मनुवां मिलायो ॥ काल अरु ज्वाल जग व्याधि सब मिटि
गई जीवसों ब्रह्मगति वेगि पायो । चरणदास रणजीत शुक-
देव की दयासों अभयपद परशि अविगत समायो ॥ साधो
पिण्ड ब्रह्माण्ड की शैल गुरु गमक्री परसिया युक्तिसों अल-
खराई । सहजही सहज पग धरा जब अगम को दशौपरकार
झागड़ बुझाई ॥ खोलि कापाट अरु वज्रद्वारे चढ़ो कलाके
२६

३७६ श्रीस्वामीचरणदासजीकाग्रन्थ ।
भेद कुंजी लगाई । पहल के महलपर जाय आसनकिया दूसरे
महलकी खबरि पाई ॥ तीसरे महलपर सुरति जा बसिरही
महल चौथे दुही अमीगाई । पांचवें महल को साधु कोइ पाइहै
महल छठवां दिया गुरु बताई ॥ सातवें महलपर कोटि सूरज
दिये आठवें महल अविगति गोसाईं । रूप अद्भुत तहां देखि
अचरज जहां देखिया दरश सब बिपति जाई ॥ शुकदेवकी
सहासों धारण गहासो आपने पीवके भवन आई । चरणदास
आपा दिया प्रेम प्याला पिया शीश सदके किया पूजि पाई ॥
साधो परसिया देश जहँ भेश नाहीं ।
घाट तिसलखि जहां बाट सूझै नहीं सुरतिके चांदने सन्त
जाई ॥ चन्द षोड़शदिपै गंग उलटीबहैं सुषमना सेज पर लम्ब
दमकै । तासुके ऊपरै अमी का ताल है झिलमिली ज्योति
परकाश झमकै ॥ चारि योजन परे शून्य अस्थान है तेज
अति पुंज परलोक राजै । द्वार पश्चिम धँसे मेरही दण्डहो
उलटिकर आय छाजै विराजै ॥ नूर जगमग करै खेल अ-
गाध है वेदकत्तेब नहिं पार पावैं । गुरुमुखी जायहैं अमरपद
पाय हैं शीश का लोभतजि पन्थधावैं ॥ तीनसुन्न छेदि रण-
जीत चौथे बसै जन्म अरु मरण फिरि नाहिं होई । चरणदास
करि बास शुकदेव बकसीस सों पूज बेगमपुरी अमरसोई ॥
राग सोरठ ॥
ऐसा देश दिवानारे लोगो जाय सो माताहोय ।
बिन मदिरा मतवारे झूमें जन्म मरण दुख खोय ॥
कोटि चन्द सूरज उजियारो रविशशि पहुंचत नाहीं ।
बिना सीप मोती अनमोलक बहुदामिनि दमकाहीं ॥

शब्दवर्णन ३७७
बिन ऋतु फूले फल रहत हैं अमृत फल रस पागो।
पवन गवन बिन पेवन बहतहै बिन बादर झरि लागो ॥
अनहद शब्द भँवर गुंजारैं शंख पखावज बाजैं ।
ताल घंट मुरली घनघोरा भेरि दमामें गाजैं ॥
सिद्धगर्जना अतिही भारी घुंघुरू गति झनकारैं ।
रम्भा नृत्यकरैं बिन पगसों बिन पायल ठनकारैं ॥
गुरु शुकदेवकरैं जब किरपा ऐसो नगर दिखावैं ।
चरणदास वा पग के परसे आवागमन नशावैं ॥
राग सारंग व विलावल व सोरठ ॥
साधो अजब नगर अधिकाई ।
औघट घाट वाट जहाँ बांकी उस मारग हम जाई ॥
श्रवण विना बहु वाणी सुनिये बिन जिह्वा स्वर गावैं ।
बिना नैन जहां अचरज दीखै विना अंग लपटावैं ॥
विना नासिका बास पुष्पकी विना पावँ गिरि चढ़िया ।
विना हाथ जहँ मिलो धायकै बिन पाधा जहँ पढ़िया ॥
ऐसा घर बड़भागी पाया पहिरि गुरूका बाना ।
निश्चल ह्वैकै आशा मारी मिटिगा आवनजाना ॥
गुरू शुकदेव करी जब किरपा अनभय बुद्धि प्रकासी ।
चौथे पद में आनंद भारी चरणदास जहाँ वासी ॥
राग सोरठ ॥
सो गुरु बिन वह घर कौन दिखावै ।
जिहिघर अग्नि जलै जलमाहीं यह अचरज दरशावै ॥
कामधेनु जहाँ ठाढ़ी सोहैं नैन हाथ बिन दुहना ।
धाये दूधा थोड़ा देवै भूखे दे पै दूना ॥

३७८ श्रीस्वामीचरणदासजीकाग्रन्थ ।
पीवैं जन जगदीश पियारे गुरुगम बहुत अघावैं ।
मूरख कायर और अयोगी सोवै नेक न पावैं ॥
अमृत अँचवै वा पद पहुँचे महातेजको धारै ।
होय अमर निश्चल ह्वै बैठे आवागमन निवारै ॥
भेद छिपावै तौ फल पावै काहू से नहिं कहिये ।
वह अद्भुत है ठौर अनूठी बड़भागन सों लहिये ॥
या साधन के बहु रखवारे ऋषि मुनि देवत योगी ।
करन न देवैं बुधि हरि लेवैं होय न गोरस भोगी ॥
लोभी हलके को नहिं दीजै कहै शुकदेव गुसाईं ।
चरणदास त्यागी वैरागी ताहि देहु गहि बाहीं ॥
सो गुरु गम मगन भया मन मेरा ।
गगन मण्डल में निज घर कीन्हो पंच विषय नहिं घेरा ॥
प्यास क्षुधा निद्रा नहिं व्यापी अमृत अँचवन कीन्हा ।
छूटी आस बास नहिं कोई जग में चित नहिं दीन्हा ॥
दरशी ज्योति परम सुख पायो सबही कर्म जलावै ।
पाप पुण्य दोऊ भै नाहीं जन्म मरण बिसरावै ॥
अनहद आनँद अति उपजावै कहि न सकूं गतिसारी ।
अति ललचावै फिरि नहिं आवै लगी अलख सों यारी ॥
हंस कमलदल सतगुरु राजै रुचि रुचि दरशन पाऊं ।
कहि शुकदेव चरणहींदासा सब बिधि तोहिं बताऊं ॥
राग मलार ॥
चहूँदिशि झिलमिल झलक निहारी ।
आगे पीछे दहिने बायें तल ऊपर उजियारी ॥
दृष्टि पलक त्रिकुटी है देखे आसन पद्म लगावै ।
संयम साधै दृढ़ आराधै जब ऐसी सिधि पावै ॥

शब्दवर्णन । ३७६
बिन दामन चमकार बहुतही सीप बिना लर मोती ।
दीपमालिका बहु दरसावैं जगमग जगमग ज्योती ॥
ध्यान फलै तब नभके माहीं पूरण हो गति सारी ।
चन्द घने सूरज अणकी ज्यों सू भर भरिया भारी ॥
यहतो ध्यान प्रत्यक्ष बतायो श्रद्धा होय तौ कीजै ।
कहि शुकदेव चरणहींदासा सो हमसों सुनि लीजै ॥
राग केदारा ॥
अवधू सहस दल अब देख ।
श्वेत रंग जहां पंखरी छवि अग्र डोर विशेख ॥
अमृत वरषा होत अतिझरि तेज पुंज प्रकास ।
नाद अनहद बजत अद्भुत महाब्रह्म विलास ॥
घंट किंकिणि मुरलि वाजै शंखध्वनि मनसान ।
ताल भेरि मृदंग वाजत सिन्धुगर्जन जान ॥
कालको जहाँ पहुँच नाहीं अमर पदवी पाव ।
जीति आठौ सिद्धि ठाढ़ी गगन मध्ये आव ॥
करै गुरु परताप करणी जाय पहुँचे सोय ।
चरणदास शुकदेव कृपा जीव ब्रह्मै होय ॥
राग धनाश्री ॥
सो गुरुगम इहि विधि योग कमायो ।
आसन अचल मेर कियो सीधो कसि बँध मूल लगायो ॥
संयम साधि कला वश कीन्ही मन पवना घर आयो ।
नो दरवाजे पट दै राखे अद्धूं ऊर्ध्व मिलायो ॥
नाभि तलै पैंड़ो करि पैठे शक्ति पताल गई है ।
कांप्यो शेष कमंठ अकुलायो सायर थाह दई है ॥
१ आकाश २ कछुवा ॥

३८० श्रीस्वामीचरणदासजीकाग्रन्थ ।
उलटि चले मठ फोरि इकीसौ गये अभय पद माहीं ।
अति उजियारो अद्भुत लीला कहन सुनन गम नाहीं ॥
जित भयेलीन सबै सुधि बिसरी छूटी जगत बियाधा ।
चरणदास शुकदेव दयासों लागी शून्य समाधा ॥
सो साधो ऐसी योग युक्ति गति भारी ।
मूलहि बंध लगाय युक्ति सों मूंदि लई नौनारी ॥
आसन पद्म महादृढ़ कीन्हो हिरदय चिबुकै लगाई ।
चंद सूर दोउ सम करि राखे निरति सुरति घर आई ॥
ऊपर खैंचि अपान सहज में सहजै प्राण मिलाई ।
पवन फिरी पश्चिम को दौरी मेरुँहि मेरु चलाई ॥
ऐसेहि लोक अमर पद पहुँचे सूरज कोटि उज्यारी ।
श्वेत सिंहासन सतगुरुपरशे करि दरशन बलिहारी ॥
आपा बिसरि परम सुख पायो उनमनी लागी तारी ।
चरणदास शुकदेव दया सों जन्म मरण छुटि बारी ॥
राग मलार ॥
वा पद रामसों करि नेह ।
विषकी बूंद न पह्ये जित हां बरषत अमृतमेह ॥
चमकत बिजुली गरजत गगना बाजत अनहद घोर ।
यहमन थकत गलतजित पाँचौ मिटिहैं निशि अरुभोर ॥
जाग्रत मिटि है स्वप्नौ मिटि है मिटिहु सुषोपत जाय ।
षट ऋतु पह्ये नाहिंन अवधू एकहि रस दर्शाय ॥
बिनहीं जोते बिनहीं बोये उपजत खेत है धीर ।
लागत अचरज फल महँ मुक्ता बिनहीं सींचे नीर ॥
राजा गुरु शुकदेव न बांटै सबहि करैं बकसीस ॥
१ दाढ़ी २ मेरुदंडनाड़ी वह है जो पृष्ठभाग से सीधी शिरतक चलीगई है।

शब्दवर्णन । ३८१
चरणदास रास सब पावैं मिलि है बिस्वेबीस ॥
राग सोरठ ॥
अवधू ऐसी मदिरा पीजै ।
बैठि गुफामें यह जग बिसरै चंद सूर सम कीजै ॥
जहाँ कलाल चढ़ाई भाठी ब्रह्म ज्वाल परजारी ।
भरि भरि प्याला देत कलाली बाढ़ै भक्ति खुमारी ॥
माता हो करि ज्ञान खङ्ग लै काम क्रोध को मारै ।
घूमत रहै गहै मन चंचल दुबिधा सकल बिड़ारै ॥
जो चाखै यह प्रेम सुधारस निज पुर पहुँचै सोई ।
अमर होय अमरापद पावै आवागमन न होई ॥
गुरु शुकदेव किया मतवारा तीनि लोक तृण बूझा ।
चरणदास नहीं रही वासना आनँद आनँद सूझा ॥
राग सारंग ॥
पीवै कोई यह प्याला मतवारा ।
सुर नर मुनि जा मदको तरसैं गुरुबिन लहै न बारा ॥
शूदर के घर भाठी औटै ब्रह्मा अग्नि जलाई ।
शिव शोधैं अरु विष्णु चुवावैं पीवै साधु अघाई ॥
सीता प्याला भरि भरि देवैं हनूमान हंकारैं ।
व्यास शेष नारद सनकादिक किरिया नाहिं विचारैं ॥
नवधा नेम औ संयम पूजा बिसरी सब कहा कहिये ।
घूमत रहें महारस चाखे स्वर्गमुक्ति ना चहिये ॥
श्रीशुकदेव सुधारस अमृत नितप्रति अँचवन कीन्हा ।
चरणदास पर किरपा करिकै निज प्रसाद करि दीन्हा ॥

३८२ श्रीस्वामीचरणदासजीकाग्रन्थ ।
साधौ यह प्याला मतवार है ।
अचवैगा कोइ योगयुगन्ता चित आस्थिरमन मारिहै ॥
चन्द सूर दोउ समकरि राखै ब्रह्मज्याल अन्तर बरै ।
मुद्रा लगै खेचरी जबहीं वङ्क नाल अमृत झरै ॥
भँवर गुफा में भाठी औटै भभक भभक सुषमन चुवै ।
सुगुरा पी पी रहित भये हैं बिन पीये उपजें मुये ॥
शिव सनकादिक नारद शारद और पिया नौ नाथहै ।
सिधि चौरासी हरिपदवासी मगन भया सव साथहै ॥
रामानन्द कवीर नामदे अमर हुये जिन जिन पिया ।,
गुरु शुकदेव करी जब किरपा चरणदासको सो दिया ॥
राग धनाश्री ॥
जो जन अनहद ध्यान धरै ।
पांचौ निर्बल चञ्चल थाके जीवतही जु मरै ॥
शोधे मूलबन्ध दै राखै ; आसन सिद्ध करै ।
त्रिकुटी सुरति लाय ठहरावै कुम्भक पवन भरै ॥
घन गरजै अरु बिजुली चमकै कौतुक गगन धरै ।
बहुत भांति जहां वाजन बाजें सुनि सुनि सन्ध अरै ॥
सहज सहज में हो परकाशा बाधा सकल हरै ।
जग की आस बास सब टूटैं ममता मोह जरै ॥
शून्य शिखर पर आपा बिसरै काल सों नाहिं डरै ।
चरणदास शुकदेव कहत हैं सब गुण ज्ञान गरै ॥
तबते अनहद घोर सुनी ।
इन्द्री थकित गलित मन हूवो आशा सकल भुनी ॥
घूमत नैन शिथिल भइ काया अमल जु सुरति सनी ।
रोम रोम आनन्द उपजि करि आलस सहज बनी ॥

शब्दवर्णन । ३८३
मतवारैं ज्यों शब्द समायौ अन्तर भीज कनी ।
भर्म्म कर्म्म के बन्धन छूटैं दुबिधा बिपति हनी ॥
आपा बिसरि जक्त को बिसरो कितरहिं पांच जनी ।
लोक भोग सुधि रही न कोई भूलो ज्ञान गुनी ॥
हो तहाँ लीन चरणहिंदासा कहैं शुकदेव मुनी ।
ऐसो ध्यान भाग्य सों पहूये चढ़ि रहे शिखर अनी ॥
राग बिलावल ॥
घट में खेलि ले मन खेला ।
सकल पदारथ घटही माहीं हरिसों होय जुमेला ॥
घट में देवल घट में जाती घट में तीरथ सारे ।
वेगहि आव उलटि घटमाहीं बीतैं परबीनहारे ॥
घट में मानसरोवर सू भर मोती और मराला ।
घट में ऊंचा ध्यान शब्द का सोहं सोहं माला ॥
घट में बिन सूरज उजियारा राति दिना नहिं सूझै ।
अमृत भोजन भोग लगंत है बिरलाजन कोइ बूझै ॥
घट में पापी घट में धर्मी घट में तपसी योगी ।
गुण अवगुण सब घटही माहीं घटमें वैद्य अरु रोगी ॥
रामभक्ति घटही में उपजै घट में प्रेम प्रकासा ।
शुकदेव कहैं चौथापद घट में पहुँचे चरणहिंदासा ॥
राग विलास ॥
घट में तीरथ क्यों न नहावो ।
इतउंत डोलो पथिक बनेही भरमि भरमि क्यों जन्म गंवांवो ॥
गोमती कर्म सुकारथ कीजै अधरम मैल छुटावो ।
शील सरोवर हितकरि न्हइये काम अग्निकी तपनि बुझावो ॥
रेवा सोई क्षमा को जानौ तामें गोता लीजै ।

३८४ चरणदासजीकाग्रन्थ ।
तन में क्रोध रहन नहिं पावै ऐसी पूजा चित्तदै कीजै ॥
सत यमुना संतोष सरस्वति गंगा धीरज धारो ।
झूठ पटकि निर्लोभ होय करि सबही बोझा शिरसों डारो ॥
दया तीर्थ कर्मनाशा कहिये परसे बदला जावै ।
चरणदास शुकदेव कहत हैं चौरासी में फिरि नहिं आवै ॥
राग विभास ॥
घट में तीरथ यों तुम न्हावो ।
तिनकेन्हान अमरपद पहुँचौ आदि पुरुष निश्चय करिपावो ॥
काशी सो तत करणी कीजै कलिमल सकल नशावो ।
रहनि गहनि पुष्कर को जानौ यामें मज्जन क्यों न करावो ॥
ध्यान द्वारका दृढ़ करि परसो हितकी छाप लगावो ।
इन्द्रीजित सोइ बदरीनाथा यह गति सतकरि चिन्हमें लावो ॥
भँवर गुफा में है तिर्बेणी सुरति निरति लै धावो ।
योग युक्ति सों डुबकी लेकरि काग पलटि हंसा ह्वै जावो ॥
तन मथुरा अरु मन वृन्दावन तामें रास रचावो ।
हिरदयकमल खिले परकाशादरशन देखि अधिकहुलसावो ॥
गुरु चरणन में सबही तीरथ सिमिटि सिमिटि तहाँ आवों ।
चरणदास शुकदेव कहत हैं अपनो मस्तक भेंट चढ़ावो ॥
राग पर्ज ॥
सुधारस कैसे पइये हो ।
कूप¹ कहां केहि ठौर है कैसे करि लहिये हो ॥
नेजू कित कित गागरि कित भरने वारी हो ।
कैसे खुलै कपाट ही को ताला ताली हो ॥
कौन समै किस गृह बिषे अँचवै किन माहीं हो ।
१ कुवाँ

शब्दवर्णन ३८५
तुम से जानै भेद को अरु बहुतक नाहीं हो ॥
पीकरि किस कारज लगै अरु स्वाद बताओ हो ।
फल याका कहि दीजिये सब खोलि जतावो हो ॥
शुकदेव सो पूछन करें यह चरणहिंदासा हो ।
किरपा करिकै कीजिये मेरि पूरी आशा हों ॥
गुरू हमारे प्रेम पिआयो हो ।
तादिन ते पलटो भयो कुल गोत नशायो हो ॥
अमल चढ़ो गगनै लगो अनहद मन छायो हो ।
तेज पुंजकी सेज पै प्रीतम गल लायो हो ॥
गये दिवाने देसड़े आनँद दर्शायो हो ।
सब किरिया सहजै छुटी तप नेम भुलायो हो ॥
त्रैगुणते ऊपर रहूं शुकदेव बसायो हो ।
चरणदास दिन रैन-नहिं तुरियापद पायो हो ॥
राग जैजैवंती ॥
ऐसी जो युक्ति जानै सोई योगी न्यारा। आसन जो सिद्धि
करै त्रिकुटी में ध्यान धरै बिना तेल दिया बरै ज्योति हूँ
उज्यारा ॥ संयम सँभाल साधै मूल द्वार बन्ध बांधै शंखनी
उलटि साधै कामदेव जारा । प्राण वायु हिये माहीं खैंचिकै
अपान लाहीं दोऊ नीके मिलि जाहीं ऐसा खेल धारा ॥ कुँभक
अथक राखै अनहद ओर ताकै सुषमन पैठि नाकै आगे जो
विचारा । खोलि कै कपाट सिरा कोऊ चढ़ शूरवीरा कामधेनु
जावै तीरा अमी को उतारा ॥ उनमनी जाय लागै निज गृह
माहीं जागै जन्म मरण भागै छूटै जग भारा । गुरुशुकदेव
कहै करणी यही विधि लहै चरणदास होय रहै आप को
सँभारा ॥

३८६ श्रीस्वामीचरणदासजीकाग्रन्थ ।
राग सोरठ व सारंग ॥
पांचन मोहि लियो बलिमा ।
नासा त्वचा और श्रवणीया नैनन अरु रसना ॥
एक एक ने बारी बांधी गहि गंहि लै लै जाहिं ।
निशिदिन उन्हीं के रस पागो घरमें ठहरतं नाहिं ॥
अलि पतंग गज मीन मृगा ज्यों होय रह्यो पराधीन ।
अपनो आप सँभारत नाहीं विषय वासना लीन ॥
हौं कुलवन्ती टोना सीखो अनहद सुरति धरूं ।
गगन मँडल में उलटा कूंवां तासों नीर भरूं ॥
भँवर गुफा में दीपक बारौं मन्तर एक पढूं ।
काम क्रोध मद लोभ मोहकर लालन चित्त हरूं ॥
यतन यतन करि पीव छुटाऊं फिर नहिं जाननदूं ।
चरणदास शुकदेव बतावैं निज मनहीं करलूं ॥
राग सोरठ ॥
तू सदा सोहागिनि नारी है ।
पियके संग मिली मद् पीवै ताते लागत प्यारी है ॥
भँवरगुफा में भँवनबनावो बिन घृत ज्योती जारी है ।
सुषमन सेज महा सुखदायी भोगत भोग दुलारी है ॥
वशकियो कंथा चलै न पंथा टोनाडारो भारी है ।
आठ पहर तुम्हरे रँग राचो हमको मिल न वारी है ॥
पति मनमानी सो पटरानी सोई रूप उजारी है ।
हम चारौ जो सौति तुम्हारी तुम गुणआगे हारी है ॥
चरणहिंदास भई त्वहिं सेवैं लगीरहै नितलारी है ।
शुकदेवा शिर छत्र हमारो सो वशभयो तुम्हारी है ॥