भक्ति सागर ग्रन्थ: सन्त चरनदास (अष्टांग योग, धर्म-संवाद एवं सम्पूर्ण भक्ति रस महाकोश)
Bhakti Sagar Granth of Swami Charandas
सन्त चरनदास जी महाराज द्वारा
ब्रह्मज्ञानसागरवर्णन । २६६
राजस सों तामस बढ़ै, तामस सों बुधि नास।
रजगुण तमगुण छांड़िकै, करो सतोगुण वास ॥
सतगुणमें मन थिरकरो, करि आतम सों नेह।
आतम निर्गुण जानिये, गुण इन्द्री सँगदेह ॥
सात्त्विक राजस तामसी, त्रैगुण ते संसार।
तीन पांचको नाशहै, माया ब्रह्म विचार ॥
अहंतत्त्व ॐ भयो, जिनते तीनौ देव।
जिनके परे जु आतमा१, अगम अगोचर२ भेव ॥
उपजै सो माया सभी, विनशि नेकमें जाय।
छल मायासों कहतहैं, सपनो सकल बिहाय ॥
निराकार३ अद्वै अचल४, निर्वासी५ तू जीव।
निरालम्ब६ निर्वैर सो, अज७ अविनाशी सीव ॥
जिह्वा इन्द्री नीरकी, नभकी८ इन्द्री कान।
नासा इन्द्री धरणिकी, करि विचार पहिंचान ॥
त्वचासो इन्द्री वायुकी, पावक इन्द्री नैन।
इनको साधै साधु जो, पद पावै सुख चैन ॥
निद्रा संगम आलकस, भूख प्यास जो होय।
चरणदास पांचौ कही, अग्नितत्त्वसों जोय ॥
रक्त बिन्दु कफ तीसरो, मेद मूत्रको जान।
चरणदास प्रकृति यह, पानीसों पहिंचान ॥
चाम हाड़ नाड़ी कहौं, रोमजान अरु मांस।
पृथिवीकी प्रकृति यह, अन्त सबनको नास ॥
१ सच्चिदानन्दस्वरूपी यस्तिष्ठति स आत्मा २ जो दृष्टि में न आवै
३ जिसका आकार नहीं है ४ जो चल न सकै ५ जिसका कहीं वास नहीं
६ जिसको किसी वस्तुकी चाह नहीं ७ जो जन्म नहीं लेता ८ आकाश ॥
३०० श्रीस्वामीचरणदासजीकाग्रन्थ ।
बलकरना अरु धावना, उठना अरु संकोच ।
देह बढ़ै सो जानिये, वायु तत्त्व है शोच ॥
काम क्रोध मोह लोभ भय, तत्त्व आकाश को भाग ।
नभकी पांचौ जानिये, नित न्यारो तू जाग ॥
रोम गगन नाड़ी पवन, मांस अग्नि को अंश ।
त्वचा नीर सौं जानिये, अस्थि¹ मही को वंश ॥
कफ आकाश बिंदु वायुसों, रक्त अग्निसों बूझ ।
मूत्र नीर रणजीत भन, मेद महीसों सूझ ॥
नीर व्योमसपरशँ² पवन, आलस अग्नि पिछान ।
ध्यास नीर रणजीतमन, भूख महीसों जान ॥
उठना तौ आकाश सों, बल करना है वाय ।
बढ़नि अग्निधावन उदक³, संकोचन महिआय ॥
लोभ जु नभकाअंशहै, काम वायुका भाग ।
क्रोध अग्नि जल मोहहै, भय पृथ्वीका लाग ॥
पांच पचीसौ एकही, इनके सकल स्वभाव ।
निर्विकार तू ब्रह्म है, आप आपको पाव ॥
निराकार निर्लिप्त तू, देही जान अकार ।
आपन देही मान मत, यही ज्ञान ततसार ॥
शस्तर छेदि सकै नहीं, पावक सकै न जारि ।
मरै मिटै सो तू नहीं, गुरुगम भेद निहारि ॥
जलै कटै काया यही, बनै मिटै फिरि होय ।
जीवऽविनाशी नित्य है, जानै बिरला कोय ॥
जरा मरण धर्म देह को, भूख प्यास धर्म प्रान ।
सकल विकलमन जानिये, स्वाद सुइंद्री जान ॥
१ हाड़ २ छूना ३ जल ॥
ब्रह्मज्ञानसागरवर्णन । ३०१
आंख नाक जिह्वा कहूं, त्वचा जान अरु कान ।
पांचौ इन्द्री ज्ञान हैं, जानै संत सुजान ॥
जो जो इनसों जानिये, निश्चय ना ठहराय ।
कहै सुनै चाखै लखै, सो सोई मिटिजाय ॥
इन्द्री जानि सकै नहीं, मन बुधि लहै न ताय ।
ज्ञानदृष्टि पहिचानिये, वासों वाको पाय ॥
गुदा लिंग मुख तीसरो, हाथ पाँव लखि लेह ।
पांचौ इन्द्री कर्म हैं, यह भी कहिये देह ॥
देह मिटत है स्वप्न ज्यौं, जीव रहत है नित्त ।
देहकर्म बिसराय करि, आतमसों करि हित्त ॥
मन जीतै इन्द्री गहै, चित्त अस्थिर जब होय ।
आतम सों परचो रहै, राखै सुरति समोय ॥
पृथ्वी काल जे ठौर है, गुदै जानिये द्वार ।
पीरो रंग पहिचानिये, पीवन खान अहार ॥
जलको वासा भाल¹ है, लिङ्ग जानिये द्वार ।
मैथुन कर्म अहार है, रंग सफेद निहार ॥
पित्ते में पावक रहै, नैन जानिये द्वार ।
लालरंग है अग्नि को, मोह लोभ आहार ॥
पवन ना²भि में रहत है, नासा जानिये द्वार ।
हरो रंगहै वायु को, गन्ध सुगन्ध अहार ॥
अकाश शीशमें वास है, सरवन दुवारे जान ।
शब्द कुशव्द अहार है, ताको श्याम पिछान ॥
कारण सूक्ष्म लिंग है, अरु कहियत अस्थूल ।
शरीर तीनसों जानिये, मैं मेरी जड़मूल ॥
१ माथ २ तोंदी ॥
३०२ श्रीस्वामीचरणदासजीकाग्रन्थ ।
जाग्रत का अस्थूलहै, स्वप्ने लिंग शरीर ।
कारण जान सुषोपती, तुरिया साक्षी वीर ॥
जाग्रत स्वप्न सुषोपती, तुरी अवस्थ विचार ।
परा पश्यन्ती मध्यमा, वैखरी -वाणी चार ॥
जाग्रत वासा नैन में, स्वप्न कण्ठ अस्थान ।
जान सुषोपत्ति हिये में, नाभि तुरिय मनतान ॥
नाभि मध्य वाणी परा, हिये पश्यन्ती सुक्ख ।
कंठ मध्यमा जानिये, कहूं वैखरी मुख्य ॥
चितबुधिमन अहंकार जो, अन्त:करण सुचार ।
ज्ञान अग्नि सों जारिये, आतमतत्त्व विचार ॥
जलसों मन निश्चय कियो, भयो वायुसों चित्त ।
अहंकार भो अग्निसों, बुधि पृथ्वी सों मित्त ॥
शब्द स्पर्शरु गंधहै, अरु कहियत रसरूप ।
देह कर्म तनमात्रा, तू कहियत निहरूप ॥
शब्दा गुण आकाश का, सपरस गुण है वाय ।
पृथ्वीका गुण गंध है, सो यह प्रकट दिखाय ॥
रूप अग्निका गुण कहूं, रसगुण जलका जान ।
रणजीतबतावै खोलिकरि, ये शिष ले पहिंचान ॥
सरवन मुख इन्द्री भई, तत्त्वाकाश सों दोय ।
त्वचा हाथ इन्द्री युगल, वायुतत्त्व सों होय ॥
पावक सों इन्द्री युगल, भये नैन अरु पावँ ।
जलसों जो इन्द्री भई, लिंग रसना१ दो नावँ ॥
गुदा नासिका दो भई, पृथ्वी सों पहिंचान ।
चरणदास यों कहतहैं, एक कर्म इक ज्ञान ॥
१ जीभ ॥
ब्रह्मज्ञानसागरवर्णन । ३०३
राजस सों इन्द्री भई, तामस सों तत्त्व पांच ।
सात्त्विक सों चारौ भये, चरणदास कहैं सांच ॥
तीनौ गुणसे है परे, सो आतम को रूप ।
सो वह दृष्टि न आवई, अगम अगोचर भूप ॥
दश इन्द्री तत्त पांच है, तन्मात्रा भी पांच ।
चारौ अन्तःकरण हैं, ये चौबीसौ बांच ॥
पन्द्रह कों अस्थूल है, नौको लिंग शरीर ।
कारण झीनी वासना, तुरिया निर्मल धीर ॥
जाग्रत में चौबीस हैं, स्वप्ने में नौ जान ।
सुषुप्ति में सब लीन है, ये अँग जड़के मान ॥
तुरिया इकरस आतमा, निर्मल अचल अनाद ।
घटै बढ़ै उपजै नहीं, तहां न वाद विवाद ॥
घटै बढ़े उपजै मिटै, जड़को यही स्वभाव ।
सो सब कौतुक कररही, नाना किये उपाव ॥
चेतन ज्यों को त्यों सदा, सदा अकर्त्ता जोय ।
सब कर्मन सों रहित है, आतम ऐसो होय ॥
काहू ते उपजौ नहीं, वाते भयो न कोय ।
वह न मरै मारै नहीं, राम कहावै सोय ॥
योगयुगतकरि खोजि ले, सुरतिनिरति करिचीन ।
दशप्रकार अनहद बजै, होय जहां लवलीन ॥
तीन बंध नौ नाड़िका, दश बाई को जान ।
प्राणअपान समान है, और कहत उदान ॥
व्यानवायु अरु किरकिरा, कूरम बाई जीत ।
नाग धनंजय देवदत्त, दश बाई रणजीत ॥
नवो द्वारको बंधकरि, उत्तम नाड़ी तीन ।
३०४ श्रीस्वामीचरणदासजीकाग्रन्थ।
इड़ा पिंगला सुषमना, केलि करै परबीन ॥
करतै प्राणायाम के, पावै आतम भेख ।
अनहद ध्वनि के बीचमें, देखै शब्द अलेख ॥
पूरक करि कुंभक करै, रेचक पवन उतार ।
ऐसे प्राणायाम करि, सूक्ष्म करै अहार ॥
धरती बन्ध लगाय करि, दशौ वायु को रोक ।
मस्तक प्राण चढ़ायकै, करै अमरपुर भोग ॥
पांचौ मुद्रा साधिकै, पावै घट को भेद ।
नाड़ी शक्ति चढ़ाइये, षटौ चक्रको छेद ॥
नासाध्यान दृष्टिभ्रुकुटी में, सुरति श्वासके माहिं ।
आतम देखो जातहै, यामें संशय नाहिं ॥
योगयुक्ति कै कीजिये, कै आतम को ध्यान ।
आपा आप विचारिये, परम तत्त्व को ज्ञान ॥
शूद्र वैश्य शारीर है, ब्राह्मण और रजपूत ।
बूढ़ा बाला तू नहीं, चरणदास अवधूत ॥
काया माया जानिये, जीव ब्रह्म है मित्त ।
काया छुटि सूरति मिटै, तू परमातम नित्त ॥
पाप पुण्य आशातजौ, तजौ मान अरु थाप ।
काया मोह विकारतजि, जपै सु अजपा जाप ॥
आप भुलानो आपमें, बँधो आपही आप ।
जाको ढूंढ़त फिरतहौ, सो तुम आपहि आप ॥
इच्छा दुई बिसारिकै, क्यों न होय निर्वास ।
तूतो जीवन्मुक्त है, तजौ मुक्तिकी आस ॥
आपा खोजै आपलखि, आप अपनको देख ।
चरणदास तुहि ब्रह्महै, तूही पुरुष अलेख ॥
ब्रह्मज्ञानसागरवर्णन । ३०५
जैसे कछुवा सिमिटिकै, आपहि माहिं समाय ।
तैसे ज्ञानी श्वासमें, रहै सुरति लवलाय ॥
सबघट रमो सो राम है, आदि पुरुष निर्गम्य ।
लखचौरासी योनिमें, एक समानो सम्य ॥
दृष्टि मुष्टि आवै नहीं, रूप न देखो जाय ।
बिन सूरति बिननामको, घट घट रहो समाय ॥
छप्पय ॥
इच्छा दुइकर दूर आप तू ब्रह्म ह्वै जावै ।
और सो द्वितिया कौन तासुको शीश नवावै ॥
माला तिलक वनाय पूर्व अरु पश्चिम दौरा ।
नाभि कमल कस्तूरि हिरण जंगल भो बौरा ॥
चरणदास लखि दृष्टि भरि एक शब्द भरपूरहै ।
निरखि परखिले निकटहीं कहन सुननकोदूरहै ॥
झूठी सी यह दृष्टि जगत सब झूठो दरशै ।
मूरख जानै सत्य तासुसों फिर फिर परशै ॥
चंद सूर थिर नहीं नहीं थिर पौन न पानी ।
त्रैदेवा* थिर नहीं नहीं थिर मायारानी ॥
नवनाथचौरासीसिद्धजोचरणदास थिर ना रहे ।
ब्रह्म सत्य सर्वज्ञहै आत्म विचार क्यों ना गहै ॥
दो० जो मुख सेती बोलिये, अरु सुनियत है कान ।
जो आंखिन सों देखिये, सबही माया जान ॥
एकै सबतन रमि रह्यो, चेतन जड़के माहिं ।
मायादर्शत है सभी, ब्रह्म लखतहै नाहिं ॥
जैसे तिलमें तेलहै, फूल मध्य ज्यों बास ।
*ब्रह्मा, विष्णु, महेश ॥
३०६ श्रीस्वामीचरणदासजीकाग्रन्थ ।
दूध मध्य ज्यों घीवहै, लकड़ी मध्य हुंतास १॥
थावर जंगम चर अचर, सबमें एकै होय ।
ज्यों मनको मैं डारि है, बाहर नाहा कोय ॥
एकडोरि मनका गुहै, अवरण वरण निहारि ।
आतम तौ निहरूप है, नित्य अनित्य विचारि ॥
माया यही स्वभावहै, उदय होय छिपि जाय ।
चंचल चपल सुहावनी, ओलं २ ज्यों गलिजाय ॥
परमातम तौ नित्यहै, ताको आदि न अन्त ।
सदाअचल चंचल नहीं, सब गुण रहत अनन्त ॥
सत चेतन आनन्दहै, आदि अन्त मधि हीन ।
आदि अन्त आकारको, सो तू झूठो चीन ॥
सुरति नाम आकारहै, ज्यों भूतनको नाच ।
मृगतृष्णाको नीर है, निकट गये नहिं सांच ॥
चितवत सांचीसी लगै, खोज किये मिटिजाय ।
दीखै है पर है नहीं, कौतुक सो दरशाय ॥
शिष्यवचन ॥
ब्रह्म बिना खाली नहीं, धरबेको इक पावँ ।
मायाको कहाँ ठौरहै, सत गुरु मोहिं बताव ॥
निर्विकार तौ ब्रह्म है, अद्वै अचल अपार ।
आई माया कहांते, सतगुरु कहौ विचार ॥
गुरुवचन ॥
आप ब्रह्म माया भयो, ज्यों जल पाला होय ।
पाला गलि पानी भयो, ऐसे नाहीं दोय ॥
झूठी माया सो कहैं, ज्ञानी पंडित लोय ।
१ अग्नि २ पत्थर ॥
ब्रह्मज्ञानसागरवर्णन । '३०७
भर्मभूल सांची लगै, समझै सांच न होय ॥
सोने को गहनो गढ़ै, कहन सुननको दोयं ।
गहनो ना सोनो सबै, नेक जुदो नहिं होय ॥
झूठ सांच दो नावहै, झूठ मिटै इक सांच ।
नाम मिटै सूरत मिटै, भूषण को लग आंच ॥
जाको माया कहतहैं, सो तू नेक निकास ।
जैसे हींग कपूरकी, नेक जुदी कर बास ॥
जल समान तो ब्रह्महै, माया लहर समान ।
लहर सबै वह नीरहै, लहर कहै अज्ञान ॥
खेल खिलौना खांड़के, कीजै लाख पचास ।
सकल खिलौना खांड़है, ऐसे गहि विश्वास ॥
चरणदास खिलौना खांड़के, भाजन राखे खांड़ ।
बिन विनशोभी खांड़है, बिनशिजाय तौ खांड़ ॥
माटी के भांड़े भवैं, सूरति अरु बहुनाम ।
बिगसिफूटि माटी भई, बासन कहुकेहि ठाम ॥
ऐसेही माया नहीं, समझि देखु मनमाहिं ।
जो दीखै सो ब्रह्महै, रंचक माया नाहिं ॥
इच्छा मेटै दुइ तजै, एकै मन विश्राम ।
ब्रह्मज्ञान विज्ञान है, समझ परमपद धाम ॥
सवैया ॥
श्वास उसास चलै जप आपहि है जु अखण्ड टरै नहिं टारो ।
भीतर बाहर है भरपूरि सों ढूंढ़ौं कहां नहिं नाहिंन न्यारो ॥
चरणदास कहैं गुरुभेद दियो भ्रम दूरि भयो जुहुतो अतिभारो ।
दृष्टि अदृष्टि जु रामको देखत राम भयो पुनि देखनहारो ॥
दो० आप आपमें आपहै, खेलौ बहु विस्तार ।
... wait, it's 'भ' where the top loop didn't print or it's 'म'! But the text is definitely "अभेदाभेद" or "अमेदाभेद"? In the scan it's printed, let's look at it: it has an 'अ', then 'भ/म', 'े', 'द', 'ा', 'भ', 'े', 'द'.
Notice the second 'भ' in 'अभेदाभेद':
The second 'भ' has a loop at the top left, but the top bar goes over it slightly, or doesn't?
Wait, if it's "अभेदाभेद", writing 'अभेदाभेद' is definitely the correct word, but let's check if it's 'अभेदाभेद'.
Yes, 'अभेदाभेद' makes 100% sense!
Now let's check line 17:
"कहिंपर्वत जंगल भयो, कहिंवारिद कहिंवारि ।"
Wait! In the Granth, is line 17:
"कहिंपर्वत जंगल भयो, कहिंवारिद कहिंवारि ।"
YES! "वारिद" (cloud) and "वारि" (water)!
And the footnote says: "२ मेघ"!
वारिद means मेघ!
The type in the scan has a broken 'वा' that looks like 'ता', or a misprint 'तारिद'.
Writing "कहिंतारिद" or "कहिं
: ब्रह्मज्ञानसागरवर्णन । ३०६
कहिं कुंजैं अति सोहनी, कहीं युगलभयो नाम ॥
कहिंसुगन्ध शीतल पवन, कहिं बंशीबट ठावैं ।
कहीं चरणहीं दास है, बारबार बलिजावैं ॥
कहीं कन्हैया है खड़ो, एकपावैं अँगमोर ।
कहिं मुरली अधरन¹ धरी, बाजत है घनघोर ॥
कहीं मुकुट कुण्डल भयो, झलकैं कहीं कपोल ।
कहिं ललचौहैं नैन हैं, नासा मुक्त सुडोल ॥
कहीं धुकधुकी कंठ है, कहीं मोतियन माल ।
कहिं बाजू नवरतन के, नटवर मदन गोपाल ॥
कहीं कड़ा कहिं कर भयो, कहिं पहुँची जहँगीर ।
रतन चौक गूंठी भयो, लागी संग जंजीर ॥
कहीं बादलौ जर्द है, नीमो है गयो अंग ।
कहीं बद्दी गल जिंद है, कहीं साँवरो रंग ॥
कहिंपैंजनिकहिंपग भयो, कहीं चरणको दास ।
कहि आपहीं नख भयो, शशियर से परकास ॥
आप आपमें आपहै, आप आपमें आप ।
आप अपन में जपतहै, आप आपनो जाप ॥
अविनाशी नाशौ नहीं, नाश न कबहुँ होय ।
तत्त्व स्वरूपी एकहै, कभी होय नहिं दोय ॥
आप ब्रह्म मूरति भयो, ज्यों बुदगल² जल माहिं ।
सूरति बिनशै नामसँग, जल बिनशत है नाहिं ॥
बुदगल देखो जल सबै, बुदगल कहूँ न होय ।
कहबे को दूजो कहो, जल बुदगल नहिं दोय ॥
भयो नेकमें बुलबुलो, नाच कूद मिटिजाय ।
१ ओंठ २ बुल्ला ॥
३१० श्रीस्वामीचरणदासजीकाग्रन्थ ।
निराकार रहि जायगो, मूरति ना ठहराय ॥
निराकार आकार धर, खेलौ कै इकवार ।
स्वप्नो ह्वै ह्वै मिटगयो, रहो सारको सार ॥
आप आपमें खेल मचायो । ज्यों पानी बुदबुद ह्वै आवो ।
ऐसे ब्रह्मधरी है काया । आपहि पुरुष आपही माया ॥
आप नरायण लछमी भई । नाभि कमल अरु आगहि दई ॥
आपहि धरती आपहि पानी । आपहि रुद्र चतुर विज्ञानी ॥
ह्वै नारायण विष्णु कहायो । शेषनाग ह्वै तलै पठायो ॥
तेंतिस कोटि देवता भयो । ऋषिमुनि कोटि अठासी छयो ॥
चारौयुग आपहि भयो लोका । पापपुण्य आपहि भयो शोका ॥
आपहि फूल शूल अरु बारी । आपहि पुरुष आपही नारी ॥
दो० जल थल पावक रामहै, राम रमो सब माहिं ।
हरि सबमें सब राममें, और दूसरो नाहिं ॥
दशअवतार१ आप ह्वै आयो । सेवक साहब आप कहायो ॥
आपहि गिरिवर आपहितरुवर । आपहि हंस आपही सरवर२ ॥
आपहिचारि वरण३ षट दरसन । पूजै आप आपही परसन ॥
आपहि ध्यानी आपहि प्रेमी । आपहि योग भोग अरुनेमी ॥
चरणदास शुकदेव कहायो । अपनो भेद आपही गायो ॥
तारा मण्डल आप अकाशा । आपहि चंद सूर परकाशा ॥
जैसे जल तरंग है आई । उलटिफेरि जलमाहिं समाई ॥
आप आपमें स्वप्न उठायो । आपहि स्वप्न आप ह्वै आयो ॥
ना कछु गयो नहीं कछुआयो । अपनो भेद आपही पायो ॥
ना कछु कटे मिलै नहिं छीजै । ना कछु उठै चलै नहिं भीजै ॥
१ मच्छ कच्छ बाराह वामन नृसिंह परशुराम राम कृष्ण बौद्ध कल्कि।
२ समुद्र ३ ब्राह्मण क्षत्रिय वैश्य शूद्र ॥
ब्रह्मज्ञानसागरवर्णन । ३११
स्वप्नो मिटि भयो एकअकारा । ज्ञानी अबही ल्योह निहारा ॥
नहीं सूक्ष्म 'अस्थूल न भारी । रूप रंग नहिं है परकारी ॥
वार पार कछु दीखत नाहीं । कबसों है अरु कबसों नाहीं ॥
कहा कहौं कछु कहत न आवै । गूंगो स्वप्नो कहा बतावै ॥
वार पार पार नहिं पायो । ढूंढत ढूंढत आप भुलायो ॥
कहत कहत मैं गयो हिराई । अब मोपै कछु कह्यो न जाई ॥
दो० हद कहूं तौ है नहीं, बेहद कहौं तौ नाहिं ।
हद बेहद दोनों नहीं, चरणदास भी नाहिं ॥
जग स्वप्नो सो है गयौ, भयो पेखनो गावँ ।
जब जागो जब मिटिगयो, चरणदास नहिं नावँ ॥
छप्पय ॥
तब न चंद नहिं सूर नहीं नभमें तारागण ।
नहिं धरती नहिं शेष नहीं अगनी पारायण ॥
तब न रूप नहिं नाम नहीं त्रैगुण त्रैदेवा ।
तब न ब्रह्म नहिं जीव नहीं साहब नहिं सेवा ॥
रणजीत मीत नहिं वैर तब निर्गुण सर्गुण नाहुता ।
तब न वेद वाणी नहीं नहिं ज्ञानी नहिं पंडिता ॥
जो श्रवणन सों सुनै और मुख सेती भाषै ।
जो कछु देखै नैन और सोवै अरु जागै ॥
और आवै दुर्गन्ध गन्ध नासा के माहीं ।
यह सब झूठो जान कछु ठहरत है नाहीं ॥
अरु चरणदास उपजै नहीं बिनशै नहिं संसार कहुं ।
ब्रह्म सत्य सर्वज्ञ है सुझूठो दरशौ स्वप्न यहु ॥
दो० ब्रह्म विना खाली नहीं, सरसों सम कहुं ठौर ।
२२
३१२ श्रीस्वामीचरणदासजीकाग्रन्थ ।
स्वप्नो सो जग देखिये, स्वप्न भयो तनमोर ॥
शुद्ध ब्रह्महै रैनि सम, जगत दिवाली दीव ।
ज्यों तरंग जलमें उठै, ब्रह्म बीच ये जीव ॥
वार न जाकों पाइये, पार परे नहिं चीन ।
ऐसे सिन्धु अथाहमें, जगत जानिये मीन ॥
ब्रह्म बीच ये जीव सब, फिरत रहत आधीन ।
जैसे सागर सिन्धु में, नानारूपी मीन ॥
जैसे लहरि समुद्रकी, उठत रहत तेहि माहिं ।
बिन इच्छा बिन भावना, द्वैद्वै मिटि मिटि जाहिं ॥
औंडों सीव गंभीर है, बिन इच्छा बिन दोय ।
निजस्वभाव जग होतहै, मिटि २ फिरि २ होय ॥
धरती मैं लीकट खिंचै, उठि नहिं आवै हाथ ।
ब्रह्म सत्य जग झूठ है, द्वैद्वै मिटि मिटि जात ॥
जगत ब्रह्ममें यों दिपै, ज्यों धरती पर रेख ।
रेख मिटै धरती रहै, ऐसेही जग देख ॥
झूठ सांच दोउ
ब्रह्मज्ञानसागरवर्णन । ३१३
छप्पय
जहां गुरू नहिं शिष्य जहां नहिं साहब दासा ।
जहां गुफा१ नहिं योग जहां नहिं गगन निवासा ॥
जहां नहीं तप दान जहां नहिं देवल पूजा ।
जहां ब्रह्म नहिं जीव जहां नहिं एक न दूजा ॥
अरु चरणदास मिलि मिटि गयो सो अचरज ऐसो सूझिया ।
कौन सुने कासों कहै सो आप आप नहिं दूजिया ॥
दो० अपरम्पार अपारहै, आदि अनादि अडोल ।
पुरुप पुरातन ब्रह्महै, बिन काया बिन बोल ॥
अगम अगोचर अजर अनंता । अद्वैरूप अथाह भगवंता ॥
निराकार निर्भय निर्बाना । परमेश्वर परमातम माना ॥
अद्धै उद्धै नहीं गोँसाईं । नहिं बाहर नहिं मध्यन माहीं ॥
नहीं जीव नहिं सीव सहाई । श्वेत श्याम नहिं है अरुणाई ॥
है जैसो तैसोही राजै । आपन माहिं आपही गाजै ॥
नहीं नाँव नहिं भावन भारी । है अखंड नहिं खंडित कारी ॥
है सर्वज्ञ सत्य विज्ञाना । अभेद अछेद अकथ सुज्ञाना ॥
ज्योंका त्यों जैसे का तैसा । नहिं ऐसा नहिं कहिये वैसा ॥
दो० नीचे नीचे अन्त ना, ऊपर ऊपर ऊप ।
वायें वायें हद्द ना, दहिने दहिने गूप ॥
नहिं नीचे ऊपर नहीं, नहिं दहिने नहिं बाम ।
मध्य नहीं आकार ना, निराकार नहिं नाम ॥
निर्गुण ना सर्गुण नहीं, उपजै ना मिटिजाय ।
सबकछुहैअरु कछु नहीं, सदा ब्रह्म थिरथाय ॥
जहां सांच जहँ झूठ है, जहां झूठ जहँ सांच ।
१ पहाड़ की कन्दरा ॥
३१४ श्रीस्वामीचरणदासजीकाग्रन्थ ।
झूठ सांच दोनों नहीं, तहँ कुछ सील न आंच ॥
बंध नहीं मुक्तौ नहीं, पाप पुण्य भी नाहिं ।
उतपति ना परलय नहीं, नहीं नहीं भी नाहिं ॥
इन्द्री ना निग्रह करौं, मन नहिं जीतूं ताहि ।
भूलौं ना चेतौं नहीं, मैं नहिं खोजौं वाहि ॥
योग नहीं जुगता नहीं, नहीं ज्ञान नहिं ध्यान ।
बुधिबिचार पहुँचै नहीं, तहँ कछु लाभ न हान ॥
जैनधर्म शिव शक्ति ना, स्वर्ग नरक नहिं बास ।
षट दरशन चौबरण ना, नहीं कर्म संन्यास ॥
सिद्ध नहीं साधक नहीं, नहीं तिमिर नहिं भान ।
शून्य नहीं बेशून्य ना, नहीं तत्त्व विज्ञान ॥
धर्म कर्म अरु मोह ना, अरु नाहीं बैराग ।
ज्योंका ज्यों सो भी नहीं, नहीं दुखी अनुराग ॥
ब्रह्मज्ञान बिन मिटै न दोई । ब्रह्मज्ञान बिन मुक्त न होई ॥
जोग जज्ञ तप नाना भोगा । ब्रह्मज्ञान बिन सबही रोगा ॥
कलह कल्पना मनमें दोष । ब्रह्मज्ञान बिन ना संतोष ॥
तिमिर अविद्या सबही भागै । ब्रह्मज्ञानमें जौं तू जागै ॥
मतमारग मिलि भर्म बढ़ावैं । पक्षपातलै सब भर्मावैं ॥
गुरु बिन ब्रह्मज्ञान नहिं पावै । गुरुबिन तत्त्व कौन दर्शवै ॥
गीता अरु वेदान्त बतावै । सामवेद भी योंही गावै ॥
ब्रह्मज्ञान में निश्चय आवै । जीवन्मुक्ता सोई कहावै ॥
दो० तू नाहीं सब राम है, वेद भेद की सीख ।
एक रमैया रमिरह्यो, सकल अण्ड ब्यापीक ॥
सिन्धु स्वरूपी ब्रह्ममें, ज्यों पाला सब लोक ।
पाला गलि पानी भवै, कछू न निकसै फोक ॥
। ब्रह्मज्ञानसागरवर्णन । ३१५
उलझे को सुलझायकै, कई जन्म को सूत ।
चरणदास निर्भय भये, आशातजि औधूत ॥
कवित्त ॥
स्वर्गहू न चाहिये जो होम यज्ञ दानकरौं इन्द्रआदि भोगन
को चित्तसू उठायो है। ऋद्धिहू न चाहिये जो जक्तमें बड़ाई
चलै सिद्धिहू न चाही सब साधन बिसरायो है॥ जातिहू न
चाही जो कुलकी मर्याद चलूं चारि बरण एकै यों वेदन में
गायो है। कासों कहैं मुक्त और बंध तौ न सूझै कहूँ कहै
चरणदास आप आपन लौ लायो है॥
सवैया ॥
आदिहु अनँद अन्तहु आनँद मध्यहु आनँद ऐसेहि जानो ।
बंधहु आनँद मुक्तहु आनँद आनँहु ज्ञान अज्ञान पिछानो ॥
लेटेहु आनँद बैठेहु आनँद डोलत आनँद आनँद आनो ।
चरणदास बिचारि सबै कछु आनँद आनँद छाड़िकै दुःख न ठानो ॥
आदिहु चेतन अन्तहु चेतन मध्यहु चेतन माया न देखी ।
ब्रह्म अद्वैत अखण्ड निरालभ और न दूसरो आतम ऐखी ॥
सिन्धु अथाह अपार विराजत रूप न रंग नहीं कछु रेखी ।
चरणदास नहीं शुकदेव नहीं तहँना कोइ मारग ना कोइ भेखी ॥
भक्षत हैं नहिं भक्षत भोजन पीवत हैं नहिं पीवत पानी ।
डोलत हैं नहिं डोलत पैंडसों बोलत हैं नहिं बोलत बानी ॥
नानारूप ब्योहार में देखत निश्चयके मध्य कछू नहिं आनी ।
चरणदास बताय दियो शुकदेव ने ऐसे रहै ताहि जानियेज्ञानी ॥
सोवतहै नहिं सोवत नींद सो जागत है नहिं जाग दिखानी ।
योगकरैं न करें कछु साधन ध्यान करें न करें कछु ध्यानी ॥
बचन बिलास करें चरचा न करें चरचा नहिं होय बिनानी ।
`३१६ श्रीस्वामीचरणदासजीकाग्रन्थ ।
चरणदास बतायदियो शुकदेवने ऐसे रहे ताहि जानिये ज्ञानी ॥
कवित्त ॥
मन्दिर क्यों त्यागै अरु भागै क्यों गिरिवरको हरिजी को
दूर जानि कल्पै क्यों बावरे । सब साधन बतायो अरु चारि
वेद गायो आपन को आप देखि अन्तर लौ लावरे ॥ ब्रह्म-
ज्ञान हिये धरो बोलते का खोजकरो माया अज्ञानहरो आपा
बिसरावरे । जैहैं जब आप धाप कहा पुण्य कहा पाप कहै
चरणदास तू निश्चल घर आवरे ॥
अथ ब्रह्मज्ञानी लक्षण वर्णन ॥
ज्ञान परीक्षा ॥
निरालंभ १ निर्मम २ निर्वासीक ३ निर्विकार ४ (अथ
विचार परीक्षा) निर्मोहत १ निर्बंध २ निहिसंक ३ निर्वान ४
(अथ विवेक परीक्षा) सावधान १ सर्वज्ञी २ सारग्राही ३
सन्तोषी ४ (अथ परमसन्तोष परीक्षा) अयाचक १ अमानी २
अपक्षीक ३ स्थिर ४ (अथ सहज परीक्षा) निष्प्रपंच १
निहतरंग २ निर्लिप्त ३ निहकर्म ४ (अथ निर्वैरपरीक्षा) सुहृद् १
सुखदायी २ शीतलताई ३ सुमती ४ (अथ शून्य परीक्षा)
शीलवन्त १ सुबुद्धी २ सत्यवादी ३ ध्यान समाधी ४ जामें ये
लक्षण होयँ ताको ब्रह्मज्ञानी कहिये और जामें ये लक्षण न होयँ
ताको वाचकज्ञानी विटंडा जानिये लक्षज्ञानी न जानिये ॥
दो० जनक गुरू शुकदेवजी, चरणदास शिष्य होय ।
आप रामहीं राम हैं, गई दुई सब खोय ॥
ब्रह्मज्ञान पोथी कही, चरणदास निर्वार ।
समझै जीवन्मुक्त हो, लहै भेद ततसार ॥
इति श्रीशुकदेवशिष्यचरणदासकृतब्रह्मज्ञानसागरसंपूर्ण ॥ १० ॥ सू
शब्दवर्णन । ३१७
अथ श्रीचरणदासकृत शब्द प्रारम्भः ॥
मंगलाचरण गुरुस्तुति ॥
दो० ब्रह्मरूप आनन्द घन, निर्विकार निर्लेव ।
मंगल करण दयाल जी, तारण गुरु शुकदेव ॥
सतियन१ में तुम सत्त हौ, शूरन में हौ बीर ।
यतियन में तुम यत्त हौ, श्रीशुकदेव गँभीर ॥
पतित उधारण तुम लखे, धम्मे चलावन भेव ।
संकट सकल निवारियै, जै जै श्री शुकदेव ॥
चिन्ता मेटन भोहरण, दूरिकरण जगव्याध ।
गुरु शुकदेव कृपा करौ, चरण लगे सब साध ॥
दाता चारों भेदके, श्रीशुकदेव दयाल ।
चरणदास पर हूजिये, बारंबार कृपाल ॥
राग कल्याण ॥
नमो शुकदेव हों चरण पखारणं ॥ द्वंद संकटहरणं ।
करणसुखमंगलं । परम आनंद घन पतित के तारणं ॥
नामतक त्याग बैराग है मुक्तिलों तीनिहूँ गुणनते निर्विकारं ।
महानिहकाम और ध(मचौथे रहौ सिद्धि चेरी भई फिरैं लारं ॥
ज्ञानके रूप अरु भूप सब मुनिन में दयाकी नाव किये जीवपारं ।
उदैभागवतमतभानु२परगटकियो तिमिर३कियोदूरअरुधर्मधारं ॥
मोहदलजीतिअनरीतिका खण्डनं भक्तिके दृढ़करनभवबिडारं ।
चरणदासके शीशपरहाथनितहीरहै यहीमाँगौंगुरू बारबारं ॥
मंगलाचरण ॥
दो० दश चिह्न दहिने चरण, बायें हैं दश एक ।
१ संन्यासी २ सूर्य ३ अंधेरा ॥
.३१८ श्रीस्वामीचरणदासजीकाग्रन्थ ।
जिनके निहचल ध्यानतें, कटैं जु बिघ्न अनेक ॥
श्रीशुकदेव अज्ञा दई, चरणदास उच्चार ।
सों अब वरणन करतहूँ, शब्दमाहिं विस्तार ॥
राग कल्याण ॥
चरण चिह्न चितलाव फेरि तेरा जन्म न होगा ।
पदम¹ झलकक्षवि निरखिनैनभरि अंकुश मनअटकाव ॥
अम्बर² छत्र कुलिश यव राजत ध्वजा धेनु³ पदभाव ।
शंखचक्र अरु कलश सुधाह्रद४ तासूं चित उरझाव ॥
स्वस्तिक जम्बू फलकी शोभा जासों सुरति लगाव ।
अर्द्धचन्द षटकोन मीन बिंदु ऊर्ध्व रेख लखिचाव ॥
अष्टकोण तिरकोण बिराजै धनुष बरण उरधाव ।
कोटिकाम नख ऊपर वारूं नूपुर सुन्दर पाव ॥
श्री शुकदेव चिह्नपद बरणे सो तू हिये में लाव ।
चरणदास हित राखि भोर निशि बार बार बलिजाव ॥
मंगल आरती रागभैरव ॥
मंगल आरति या बिधि कीजै । हर्षपाय आनँदरस पीजै ॥
प्रथमँ मंगल गुरुही जान । जिनसूं पायो पद निर्वान ॥
ज्ञान भानु परगट कियो भोर । मिटगइ रैन तिमिर घनघोर ॥
द्वितिये मंगर श्री गोपार । भक्ति बछल बहुपतित उधार ॥
राम कृष्ण पूरण औतार । दुष्टदलन सन्तन रखवार ॥
तृतिये मंगल प्रभुजी के साध । मानसरोवर मता अगाध ॥
तिनकी संगति उठि गयो संसा । कागपलट गति है गयो हंसा ॥
चौथे मंगल श्रीभागौत । घट उजियार करन कूं ज्योत ॥
पाप ताप दुख मेटन हारी । जिहिनौका चढ़ि उतरौ पारी ॥
१ कमल २ अम्बारी ३ गौ ४ चन्द्रमा ॥