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सर्वकोश
भक्ति सागर ग्रन्थ: सन्त चरनदास (अष्टांग योग, धर्म-संवाद एवं सम्पूर्ण भक्ति रस महाकोश)

भक्ति सागर ग्रन्थ: सन्त चरनदास (अष्टांग योग, धर्म-संवाद एवं सम्पूर्ण भक्ति रस महाकोश)

Bhakti Sagar Granth of Swami Charandas

सन्त चरनदास जी महाराज द्वारा

DevanagariHindipublished690 पृष्ठ

पृष्ठ 352, कुल 690 में से

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पृष्ठ 352

ब्रह्मज्ञानसागरवर्णन । ३१३
छप्पय
जहां गुरू नहिं शिष्य जहां नहिं साहब दासा ।
जहां गुफा१ नहिं योग जहां नहिं गगन निवासा ॥
जहां नहीं तप दान जहां नहिं देवल पूजा ।
जहां ब्रह्म नहिं जीव जहां नहिं एक न दूजा ॥
अरु चरणदास मिलि मिटि गयो सो अचरज ऐसो सूझिया ।
कौन सुने कासों कहै सो आप आप नहिं दूजिया ॥
दो० अपरम्पार अपारहै, आदि अनादि अडोल ।
पुरुप पुरातन ब्रह्महै, बिन काया बिन बोल ॥
अगम अगोचर अजर अनंता । अद्वैरूप अथाह भगवंता ॥
निराकार निर्भय निर्बाना । परमेश्वर परमातम माना ॥
अद्धै उद्धै नहीं गोँसाईं । नहिं बाहर नहिं मध्यन माहीं ॥
नहीं जीव नहिं सीव सहाई । श्वेत श्याम नहिं है अरुणाई ॥
है जैसो तैसोही राजै । आपन माहिं आपही गाजै ॥
नहीं नाँव नहिं भावन भारी । है अखंड नहिं खंडित कारी ॥
है सर्वज्ञ सत्य विज्ञाना । अभेद अछेद अकथ सुज्ञाना ॥
ज्योंका त्यों जैसे का तैसा । नहिं ऐसा नहिं कहिये वैसा ॥
दो० नीचे नीचे अन्त ना, ऊपर ऊपर ऊप ।
वायें वायें हद्द ना, दहिने दहिने गूप ॥
नहिं नीचे ऊपर नहीं, नहिं दहिने नहिं बाम ।
मध्य नहीं आकार ना, निराकार नहिं नाम ॥
निर्गुण ना सर्गुण नहीं, उपजै ना मिटिजाय ।
सबकछुहैअरु कछु नहीं, सदा ब्रह्म थिरथाय ॥
जहां सांच जहँ झूठ है, जहां झूठ जहँ सांच ।
१ पहाड़ की कन्दरा ॥