भक्ति सागर ग्रन्थ: सन्त चरनदास (अष्टांग योग, धर्म-संवाद एवं सम्पूर्ण भक्ति रस महाकोश)
Bhakti Sagar Granth of Swami Charandas
सन्त चरनदास जी महाराज द्वारा
पृष्ठ 353, कुल 690 में से
संदर्भ में पढ़ें३१४ श्रीस्वामीचरणदासजीकाग्रन्थ ।
झूठ सांच दोनों नहीं, तहँ कुछ सील न आंच ॥
बंध नहीं मुक्तौ नहीं, पाप पुण्य भी नाहिं ।
उतपति ना परलय नहीं, नहीं नहीं भी नाहिं ॥
इन्द्री ना निग्रह करौं, मन नहिं जीतूं ताहि ।
भूलौं ना चेतौं नहीं, मैं नहिं खोजौं वाहि ॥
योग नहीं जुगता नहीं, नहीं ज्ञान नहिं ध्यान ।
बुधिबिचार पहुँचै नहीं, तहँ कछु लाभ न हान ॥
जैनधर्म शिव शक्ति ना, स्वर्ग नरक नहिं बास ।
षट दरशन चौबरण ना, नहीं कर्म संन्यास ॥
सिद्ध नहीं साधक नहीं, नहीं तिमिर नहिं भान ।
शून्य नहीं बेशून्य ना, नहीं तत्त्व विज्ञान ॥
धर्म कर्म अरु मोह ना, अरु नाहीं बैराग ।
ज्योंका ज्यों सो भी नहीं, नहीं दुखी अनुराग ॥
ब्रह्मज्ञान बिन मिटै न दोई । ब्रह्मज्ञान बिन मुक्त न होई ॥
जोग जज्ञ तप नाना भोगा । ब्रह्मज्ञान बिन सबही रोगा ॥
कलह कल्पना मनमें दोष । ब्रह्मज्ञान बिन ना संतोष ॥
तिमिर अविद्या सबही भागै । ब्रह्मज्ञानमें जौं तू जागै ॥
मतमारग मिलि भर्म बढ़ावैं । पक्षपातलै सब भर्मावैं ॥
गुरु बिन ब्रह्मज्ञान नहिं पावै । गुरुबिन तत्त्व कौन दर्शवै ॥
गीता अरु वेदान्त बतावै । सामवेद भी योंही गावै ॥
ब्रह्मज्ञान में निश्चय आवै । जीवन्मुक्ता सोई कहावै ॥
दो० तू नाहीं सब राम है, वेद भेद की सीख ।
एक रमैया रमिरह्यो, सकल अण्ड ब्यापीक ॥
सिन्धु स्वरूपी ब्रह्ममें, ज्यों पाला सब लोक ।
पाला गलि पानी भवै, कछू न निकसै फोक ॥