भक्ति सागर ग्रन्थ: सन्त चरनदास (अष्टांग योग, धर्म-संवाद एवं सम्पूर्ण भक्ति रस महाकोश)
Bhakti Sagar Granth of Swami Charandas
सन्त चरनदास जी महाराज द्वारा
पृष्ठ 350, कुल 690 में से
संदर्भ में पढ़ेंब्रह्मज्ञानसागरवर्णन । ३११
स्वप्नो मिटि भयो एकअकारा । ज्ञानी अबही ल्योह निहारा ॥
नहीं सूक्ष्म 'अस्थूल न भारी । रूप रंग नहिं है परकारी ॥
वार पार कछु दीखत नाहीं । कबसों है अरु कबसों नाहीं ॥
कहा कहौं कछु कहत न आवै । गूंगो स्वप्नो कहा बतावै ॥
वार पार पार नहिं पायो । ढूंढत ढूंढत आप भुलायो ॥
कहत कहत मैं गयो हिराई । अब मोपै कछु कह्यो न जाई ॥
दो० हद कहूं तौ है नहीं, बेहद कहौं तौ नाहिं ।
हद बेहद दोनों नहीं, चरणदास भी नाहिं ॥
जग स्वप्नो सो है गयौ, भयो पेखनो गावँ ।
जब जागो जब मिटिगयो, चरणदास नहिं नावँ ॥
छप्पय ॥
तब न चंद नहिं सूर नहीं नभमें तारागण ।
नहिं धरती नहिं शेष नहीं अगनी पारायण ॥
तब न रूप नहिं नाम नहीं त्रैगुण त्रैदेवा ।
तब न ब्रह्म नहिं जीव नहीं साहब नहिं सेवा ॥
रणजीत मीत नहिं वैर तब निर्गुण सर्गुण नाहुता ।
तब न वेद वाणी नहीं नहिं ज्ञानी नहिं पंडिता ॥
जो श्रवणन सों सुनै और मुख सेती भाषै ।
जो कछु देखै नैन और सोवै अरु जागै ॥
और आवै दुर्गन्ध गन्ध नासा के माहीं ।
यह सब झूठो जान कछु ठहरत है नाहीं ॥
अरु चरणदास उपजै नहीं बिनशै नहिं संसार कहुं ।
ब्रह्म सत्य सर्वज्ञ है सुझूठो दरशौ स्वप्न यहु ॥
दो० ब्रह्म विना खाली नहीं, सरसों सम कहुं ठौर ।
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