भक्ति सागर ग्रन्थ: सन्त चरनदास (अष्टांग योग, धर्म-संवाद एवं सम्पूर्ण भक्ति रस महाकोश)

भक्ति सागर ग्रन्थ: सन्त चरनदास (अष्टांग योग, धर्म-संवाद एवं सम्पूर्ण भक्ति रस महाकोश)
Bhakti Sagar Granth of Swami Charandas
सन्त चरनदास जी महाराज द्वारा
DevanagariHindipublished690 पृष्ठ
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३१२ श्रीस्वामीचरणदासजीकाग्रन्थ ।
स्वप्नो सो जग देखिये, स्वप्न भयो तनमोर ॥
शुद्ध ब्रह्महै रैनि सम, जगत दिवाली दीव ।
ज्यों तरंग जलमें उठै, ब्रह्म बीच ये जीव ॥
वार न जाकों पाइये, पार परे नहिं चीन ।
ऐसे सिन्धु अथाहमें, जगत जानिये मीन ॥
ब्रह्म बीच ये जीव सब, फिरत रहत आधीन ।
जैसे सागर सिन्धु में, नानारूपी मीन ॥
जैसे लहरि समुद्रकी, उठत रहत तेहि माहिं ।
बिन इच्छा बिन भावना, द्वैद्वै मिटि मिटि जाहिं ॥
औंडों सीव गंभीर है, बिन इच्छा बिन दोय ।
निजस्वभाव जग होतहै, मिटि २ फिरि २ होय ॥
धरती मैं लीकट खिंचै, उठि नहिं आवै हाथ ।
ब्रह्म सत्य जग झूठ है, द्वैद्वै मिटि मिटि जात ॥
जगत ब्रह्ममें यों दिपै, ज्यों धरती पर रेख ।
रेख मिटै धरती रहै, ऐसेही जग देख ॥
झूठ सांच दोउ