भक्ति सागर ग्रन्थ: सन्त चरनदास (अष्टांग योग, धर्म-संवाद एवं सम्पूर्ण भक्ति रस महाकोश)
Bhakti Sagar Granth of Swami Charandas
सन्त चरनदास जी महाराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें३१० श्रीस्वामीचरणदासजीकाग्रन्थ ।
निराकार रहि जायगो, मूरति ना ठहराय ॥
निराकार आकार धर, खेलौ कै इकवार ।
स्वप्नो ह्वै ह्वै मिटगयो, रहो सारको सार ॥
आप आपमें खेल मचायो । ज्यों पानी बुदबुद ह्वै आवो ।
ऐसे ब्रह्मधरी है काया । आपहि पुरुष आपही माया ॥
आप नरायण लछमी भई । नाभि कमल अरु आगहि दई ॥
आपहि धरती आपहि पानी । आपहि रुद्र चतुर विज्ञानी ॥
ह्वै नारायण विष्णु कहायो । शेषनाग ह्वै तलै पठायो ॥
तेंतिस कोटि देवता भयो । ऋषिमुनि कोटि अठासी छयो ॥
चारौयुग आपहि भयो लोका । पापपुण्य आपहि भयो शोका ॥
आपहि फूल शूल अरु बारी । आपहि पुरुष आपही नारी ॥
दो० जल थल पावक रामहै, राम रमो सब माहिं ।
हरि सबमें सब राममें, और दूसरो नाहिं ॥
दशअवतार१ आप ह्वै आयो । सेवक साहब आप कहायो ॥
आपहि गिरिवर आपहितरुवर । आपहि हंस आपही सरवर२ ॥
आपहिचारि वरण३ षट दरसन । पूजै आप आपही परसन ॥
आपहि ध्यानी आपहि प्रेमी । आपहि योग भोग अरुनेमी ॥
चरणदास शुकदेव कहायो । अपनो भेद आपही गायो ॥
तारा मण्डल आप अकाशा । आपहि चंद सूर परकाशा ॥
जैसे जल तरंग है आई । उलटिफेरि जलमाहिं समाई ॥
आप आपमें स्वप्न उठायो । आपहि स्वप्न आप ह्वै आयो ॥
ना कछु गयो नहीं कछुआयो । अपनो भेद आपही पायो ॥
ना कछु कटे मिलै नहिं छीजै । ना कछु उठै चलै नहिं भीजै ॥
१ मच्छ कच्छ बाराह वामन नृसिंह परशुराम राम कृष्ण बौद्ध कल्कि।
२ समुद्र ३ ब्राह्मण क्षत्रिय वैश्य शूद्र ॥