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सर्वकोश
भक्ति सागर ग्रन्थ: सन्त चरनदास (अष्टांग योग, धर्म-संवाद एवं सम्पूर्ण भक्ति रस महाकोश)

भक्ति सागर ग्रन्थ: सन्त चरनदास (अष्टांग योग, धर्म-संवाद एवं सम्पूर्ण भक्ति रस महाकोश)

Bhakti Sagar Granth of Swami Charandas

सन्त चरनदास जी महाराज द्वारा

DevanagariHindipublished690 पृष्ठ

पृष्ठ 354, कुल 690 में से

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पृष्ठ 354

। ब्रह्मज्ञानसागरवर्णन । ३१५
उलझे को सुलझायकै, कई जन्म को सूत ।
चरणदास निर्भय भये, आशातजि औधूत ॥
कवित्त ॥
स्वर्गहू न चाहिये जो होम यज्ञ दानकरौं इन्द्रआदि भोगन
को चित्तसू उठायो है। ऋद्धिहू न चाहिये जो जक्तमें बड़ाई
चलै सिद्धिहू न चाही सब साधन बिसरायो है॥ जातिहू न
चाही जो कुलकी मर्याद चलूं चारि बरण एकै यों वेदन में
गायो है। कासों कहैं मुक्त और बंध तौ न सूझै कहूँ कहै
चरणदास आप आपन लौ लायो है॥
सवैया ॥
आदिहु अनँद अन्तहु आनँद मध्यहु आनँद ऐसेहि जानो ।
बंधहु आनँद मुक्तहु आनँद आनँहु ज्ञान अज्ञान पिछानो ॥
लेटेहु आनँद बैठेहु आनँद डोलत आनँद आनँद आनो ।
चरणदास बिचारि सबै कछु आनँद आनँद छाड़िकै दुःख न ठानो ॥
आदिहु चेतन अन्तहु चेतन मध्यहु चेतन माया न देखी ।
ब्रह्म अद्वैत अखण्ड निरालभ और न दूसरो आतम ऐखी ॥
सिन्धु अथाह अपार विराजत रूप न रंग नहीं कछु रेखी ।
चरणदास नहीं शुकदेव नहीं तहँना कोइ मारग ना कोइ भेखी ॥
भक्षत हैं नहिं भक्षत भोजन पीवत हैं नहिं पीवत पानी ।
डोलत हैं नहिं डोलत पैंडसों बोलत हैं नहिं बोलत बानी ॥
नानारूप ब्योहार में देखत निश्चयके मध्य कछू नहिं आनी ।
चरणदास बताय दियो शुकदेव ने ऐसे रहै ताहि जानियेज्ञानी ॥
सोवतहै नहिं सोवत नींद सो जागत है नहिं जाग दिखानी ।
योगकरैं न करें कछु साधन ध्यान करें न करें कछु ध्यानी ॥
बचन बिलास करें चरचा न करें चरचा नहिं होय बिनानी ।