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सर्वकोश
भक्ति सागर ग्रन्थ: सन्त चरनदास (अष्टांग योग, धर्म-संवाद एवं सम्पूर्ण भक्ति रस महाकोश)

भक्ति सागर ग्रन्थ: सन्त चरनदास (अष्टांग योग, धर्म-संवाद एवं सम्पूर्ण भक्ति रस महाकोश)

Bhakti Sagar Granth of Swami Charandas

सन्त चरनदास जी महाराज द्वारा

DevanagariHindipublished690 पृष्ठ

पृष्ठ 348, कुल 690 में से

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पृष्ठ 348

: ब्रह्मज्ञानसागरवर्णन । ३०६
कहिं कुंजैं अति सोहनी, कहीं युगलभयो नाम ॥
कहिंसुगन्ध शीतल पवन, कहिं बंशीबट ठावैं ।
कहीं चरणहीं दास है, बारबार बलिजावैं ॥
कहीं कन्हैया है खड़ो, एकपावैं अँगमोर ।
कहिं मुरली अधरन¹ धरी, बाजत है घनघोर ॥
कहीं मुकुट कुण्डल भयो, झलकैं कहीं कपोल ।
कहिं ललचौहैं नैन हैं, नासा मुक्त सुडोल ॥
कहीं धुकधुकी कंठ है, कहीं मोतियन माल ।
कहिं बाजू नवरतन के, नटवर मदन गोपाल ॥
कहीं कड़ा कहिं कर भयो, कहिं पहुँची जहँगीर ।
रतन चौक गूंठी भयो, लागी संग जंजीर ॥
कहीं बादलौ जर्द है, नीमो है गयो अंग ।
कहीं बद्दी गल जिंद है, कहीं साँवरो रंग ॥
कहिंपैंजनिकहिंपग भयो, कहीं चरणको दास ।
कहि आपहीं नख भयो, शशियर से परकास ॥
आप आपमें आपहै, आप आपमें आप ।
आप अपन में जपतहै, आप आपनो जाप ॥
अविनाशी नाशौ नहीं, नाश न कबहुँ होय ।
तत्त्व स्वरूपी एकहै, कभी होय नहिं दोय ॥
आप ब्रह्म मूरति भयो, ज्यों बुदगल² जल माहिं ।
सूरति बिनशै नामसँग, जल बिनशत है नाहिं ॥
बुदगल देखो जल सबै, बुदगल कहूँ न होय ।
कहबे को दूजो कहो, जल बुदगल नहिं दोय ॥
भयो नेकमें बुलबुलो, नाच कूद मिटिजाय ।
१ ओंठ २ बुल्ला ॥