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सर्वकोश
भक्ति सागर ग्रन्थ: सन्त चरनदास (अष्टांग योग, धर्म-संवाद एवं सम्पूर्ण भक्ति रस महाकोश)

भक्ति सागर ग्रन्थ: सन्त चरनदास (अष्टांग योग, धर्म-संवाद एवं सम्पूर्ण भक्ति रस महाकोश)

Bhakti Sagar Granth of Swami Charandas

सन्त चरनदास जी महाराज द्वारा

DevanagariHindipublished690 पृष्ठ

पृष्ठ 355, कुल 690 में से

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पृष्ठ 355

`३१६ श्रीस्वामीचरणदासजीकाग्रन्थ ।
चरणदास बतायदियो शुकदेवने ऐसे रहे ताहि जानिये ज्ञानी ॥
कवित्त ॥
मन्दिर क्यों त्यागै अरु भागै क्यों गिरिवरको हरिजी को
दूर जानि कल्पै क्यों बावरे । सब साधन बतायो अरु चारि
वेद गायो आपन को आप देखि अन्तर लौ लावरे ॥ ब्रह्म-
ज्ञान हिये धरो बोलते का खोजकरो माया अज्ञानहरो आपा
बिसरावरे । जैहैं जब आप धाप कहा पुण्य कहा पाप कहै
चरणदास तू निश्चल घर आवरे ॥
अथ ब्रह्मज्ञानी लक्षण वर्णन ॥
ज्ञान परीक्षा ॥
निरालंभ १ निर्मम २ निर्वासीक ३ निर्विकार ४ (अथ
विचार परीक्षा) निर्मोहत १ निर्बंध २ निहिसंक ३ निर्वान ४
(अथ विवेक परीक्षा) सावधान १ सर्वज्ञी २ सारग्राही ३
सन्तोषी ४ (अथ परमसन्तोष परीक्षा) अयाचक १ अमानी २
अपक्षीक ३ स्थिर ४ (अथ सहज परीक्षा) निष्प्रपंच १
निहतरंग २ निर्लिप्त ३ निहकर्म ४ (अथ निर्वैरपरीक्षा) सुहृद् १
सुखदायी २ शीतलताई ३ सुमती ४ (अथ शून्य परीक्षा)
शीलवन्त १ सुबुद्धी २ सत्यवादी ३ ध्यान समाधी ४ जामें ये
लक्षण होयँ ताको ब्रह्मज्ञानी कहिये और जामें ये लक्षण न होयँ
ताको वाचकज्ञानी विटंडा जानिये लक्षज्ञानी न जानिये ॥
दो० जनक गुरू शुकदेवजी, चरणदास शिष्य होय ।
आप रामहीं राम हैं, गई दुई सब खोय ॥
ब्रह्मज्ञान पोथी कही, चरणदास निर्वार ।
समझै जीवन्मुक्त हो, लहै भेद ततसार ॥
इति श्रीशुकदेवशिष्यचरणदासकृतब्रह्मज्ञानसागरसंपूर्ण ॥ १० ॥ सू