भक्ति सागर ग्रन्थ: सन्त चरनदास (अष्टांग योग, धर्म-संवाद एवं सम्पूर्ण भक्ति रस महाकोश)
Bhakti Sagar Granth of Swami Charandas
सन्त चरनदास जी महाराज द्वारा
अष्टाङ्गयोगवर्णन । ६७
अथ मूलबंध ॥
मूलबंध अब कहतहूं, अपान वायु वश होय ।
ऊपर कूं खैंचन करै, मिलै प्राण मै सोय ॥
कमल कमल सीधे भवै, 'नाभि तले हो राह ।
आगे मारग सुगम हो, पहुँचै योगीनाह ॥
मूलबंध गुण ऐसा होई । वायुअधोगति जाय न कोई ॥
रेता ऊरध यासूं सधै । दिन दिन आयु सवाई बधै २॥
यासूं कारज सब वनिआवै । रोगरक्त को सभी नशावै ॥
योगी पहिले या आराधै । अपान वायु कूं नीके साधै ॥
अब मैं मूलबंध बतलाऊं । ज्योंका त्यों साधन दिखलाऊं ॥
गुदाबास याका तुम जानो । गुदा द्वार बंधनदै ठानो ॥
बायें पांव कि एँड़ीसेती । मूल द्वार रोकै करिहेती ॥
ऊरधही ३ कूं खैंचन कीजै । शुकदेव कहै नीके सुनलीजै ॥
अरु कबहूं मन ऐसीधरै । आसन पदम करन कूं करै ॥
कपड़े की इकगेंद बनावै । गुदा मध्य कसबंध लगावै ॥
योंभी वायु सधै वा भांती । जोपै लगारहै दिनराती ॥
पवन तले की ऊपरजावै । प्राण अपान सहज मिलजावै ॥
नाद बिंद रल मिलजा दोई । एकवर्ण साधै जो कोई ॥
योग माहिं यह भी परधान । बूढ़ी देह पलटहो ज्वान ॥
जठर ४ अगन बाढ़ै अधिकाय । जो चाहै तौ बहुतै खाय ॥
सुन चरणदास कहै शुकदेव । जो गुरु पूरा देवै भेव ॥
अथ जलंधरबंध ॥
दो० मूलबंध तोसूं कहा, गुण कह तब समुझाय ।
बंध जलंधर कहतहूं, सुन सरवन करि चाय ॥
१ तोंदी २ बाढै ३ ऊपर ४ पेट ॥
तीजा बंध जलंधर जानौ। कंठ वास ताका पहिचानौ ॥
ग्रीवा लटक चिबुक हिय लावै। कंठ पवन रोके परचावै ॥
हिरदै प्राण पूर करि रहिये। बंध जलंधर यासूं कहिये ॥
उरध पवन नीचे को जाय। अरध पवन ऊरधकूं लाय ॥
उदर मध्य लै ताहि बिलोय। ब्रह्मरन्ध्र जा पहुँचै सोय ॥
इह विधि ब्रह्मपंथकूं धावै। सहजै सहजै मध्य समावै ॥
जरा मरण जहँ भय नहिं व्यापै। लहै अमरपद होरह आप ॥
चरणदास शुकदेव बतावै। जोपै बंध उड्यान लगावै ॥
अथ उड्यानबंध ॥
दो० बंध उड्यान आगे कहा, जिह्वा उलट लगाय ।
कान आंख मुख नाकके, स्वर सब बंधकराय ॥
इह सुबंध महिमा अधिक, लागै बजर किवाँर ।
सातद्वार की बाटहो, निकसै नाहिं बयार ॥
पांचौ मुद्रा बंध सब, दिखलाया यह देश ।
•शुकदेव कहै रणजीत सुन, और कहूं उपदेश ॥
अष्टपदी छन्द ॥
चौरासीही जानि जुआसन योगके ।
सिद्ध पदम तिनमाहिं बड़ेही थोकके ॥
बहुनारिनके मांहिं जु नौनारीभनी ।
तिन मैं सुषमन जानबड़ी गुरुसूं सुनी ॥
तीनि बंधके माहि मूलकूं जानिये ।
मुद्रौही में बड़ी खेचरी मानिये ॥
वायुनमें परधान प्राणकं देखिये ।
सबकुंभकहूं माहिं केवलबड़ि लेखिये ॥
बानी चारौ मध्य पराही गाइये ।
अष्टाङ्गयोगवर्णन । ६६
चार अवस्थामाहिं तुर्या वड़िपाइये ॥
परम शून्यको ध्यान परेसून्हे परै ।
याकीसम कोइ नाहिं ध्यान तिनको धरै ॥
अजपाहीके जाप बराबर औरना ।
शीलदयासे मीत न कोई देहमा ॥
पूजन मैं बड़ि जान जुआतमकी करै ।
ज्ञानसमान न दान सकल विपता हरै ॥
गुरुसा रक्षक और नहीं कोइ लोकमें ।
योग युक्तिसा स्वाद नहीं कोइ भोकमें ॥
कह शुकदेव सुनौ रणजीतही ।
वड़ी वड़ी जोगांसे खोल तुमकूं जुदी ॥
छन्द ॥
अमरी करतै बजरी रोंकै बजरी करतैं बाई ।
रोंकै छींक साधना करिकै नासालेहु जँभाई ॥
जल संयमसूं नभकूं देखै संयम नादसुं ज्योती ।
संयम पवन होय थिरकाया सो वश राखै मोती ॥
जिया विछावै मृत्यकबौदै बूढ़ी होय न काया ।
संयम नींद विंदनहि जावै यह शुकदेव बताया ॥
दहिने स्वरमें भोजन कीजै बायें स्वरमें पानी ।
दहिने स्वरमें अमरी रेचै देह न होय पुरानी ॥
दहिने स्वरमें जलसूं न्हावै बायें स्वरमें लङ्की ।
शिव आसनसूं सोवन कीजै नारिन कीजै सङ्की ॥
पावकसूं तापन नहिं कीजै जो तापै तौ नैना ।
भोजन गरम न खट्टा खावै फटै झिरै नहिं मैना ॥
॥ ... ॥
१०० श्रीस्वामीचरणदासजीकाग्रन्थ ।
दो० गरमीही के रोग में, चन्द चला रवि बन्द ।
शीत रोग सूरज चला, शशि पर राखै बन्द ॥
तीन रोज कै पांच दिन, कै दिन राखै सात ।
रोग देखि जैसी करै, होय निरोगा गात ॥
सूरज रात चलाइये, द्योस चलावै चन्द ।
पवन फिरै ऊषा बधै, श्वास चलै जो मन्द ॥
कान आंख अरु दांतके, सबही रोग भजाहिं ।
श्याम वालनहिं श्वेतहों, करै 'जुनीकी दाहिं ॥
रुई पुरानी बहुतही, दिनकूं दहिने राखि ।
बायें राखै रैनिकूं, खोली साधन भाखि ॥
शीत उष्ण व्यापै नहीं, विष नहिं व्यापक होय ।
बीसबरस साधन किये, रहै विकार न कोय ॥
बासी भ्रष्ट न खाइये, सूक्ष्म करै अहार ।
जल बहुत पीवै नहीं, सपरस करै न नार ॥
तन मन साधै बचन ही, पाप न लगने देह ।
शुकदेवकहैचरणदाससुनि, अधकी साधन येह ॥
सब जीवन सुख दीजिये, सब सों मीठा बोल ।
आतम पूजा कीजिये, पूजा यही अतोल ॥
दया पुष्प चन्दन नंवन, धूप दीप दे मन्न ।
भाँति भाँति नैवेद्य सूं, करै देव परसन्न ॥
जो कोइ आवै राजसी, देहु बड़ाई ताहि ।
जाकूं देखो तामसी, करो नम्रता बाहि ॥
जो कोइ होवै सात्त्विकी, मिलै ताहि तजिमान ।
गुढ़ी खोल चर्चाकरो, लीजै ततमत छान ॥
ओरन कूं परसन करै, आपहु रहौ परसन्न ।
अष्टाङ्गयोगवर्णन । १०६
बासलहो हरि धाम में, ह्यां वा हो धन धन्न ॥
राचस तामस सात्त्विकी, क्षेत्तर तीनहिं भाँति ।
क्षेत्रक आतम देवहै, सबको सहिये क्रांति ॥
सब में देखे आप कूं, सब कूं अपने मांहिं ।
पावै जीवनमुक्ति को, यामें संशय नाहिं ॥
सब में देखे आतमा, आपन मैं करि ध्यान ।
यही ज्ञान ब्रह्मज्ञान है, यही जु है विज्ञान ॥
अहंकार मिटि ब्रह्महो, परमातम निरवान ।
शुकदेवाहो कहतहूं, चरणदास हिय आन ॥
जो तें पूंछा सो कहा, भेद कहा सब खोल ।
अरु तेरे हियमें कछू, सकुच खोल कर बोल ॥
शिष्यवचन ॥
अपना लखि किरपाकरी, समझायो बहुभांति ।
योग औरतैं गुरूजी, हिये में आई शांति ॥
तुम्हरी कह अस्तुति करूं, मोपै कही न जाय ।
इतनी शक्ति न जीभकी, महिमां कहै बनाय ॥
किरपाकरी अनाथ पर, तुमहो दीनानाथ ।
हाथ जोड़ि मांगौं, यही, मम शिर तुम्हरो हाथ ॥
मोसे रंक गरीबकी, तुम गहि पकरी बांह ।
भव बूड़ंत राखा मुझे, चरण कमलकी छाहं ॥
आपहि तुम किरपाकरी, मैं कित लहता तोहिं ।
तुमको पाऊं ढूंढ़िकरि, इतनी शक्ति न मोहिं ॥
व्यास पुत्र शुकदेव तुम, जक्त माहिं विख्यात ।
तुम दर्शन दुर्लभ महा, पुरुषनको न दिखात ॥
१०२ श्रीस्वामीचरणदासजीकाग्रन्थ ।
बड़े भाग मेरे जगे, पूरुबले परताप ।
किरपा श्रीगोपाल की, आय मिले तुम आप ॥
चरणदास अपनो कियो, दियो परम सन्तोष ।
बैठि करूंगो ध्यानही, अब कुछ रह्यो न शोक ॥
चलत फिरत ह्यां आइया, तुम भरि दीन्ह्यो मोहिं ।
नैन प्राण तन मनसभी, देखत अरपे तोहिं ॥
चाहमिटी सब सुख भये, रहा न दुखका मूल ।
चाहूं तौ चाहूं यही, तुम चरणनकी धूल ॥
गुरुवचन ॥
योग तपस्या कीजियो, सकल कामना त्याग ।
ताको फलमत चाहियो, तजौ दोष अरु राग ॥
अष्ट सिद्धि जो पै मिलै, नेक न कीजै नेह ।
धरि हिरदय परमात्मा, त्यागे रहियो देह ॥
जेंती जगकी वस्तुहै, तामें चित्त न लाय ।
सावधान रहियो सदा, दियो तोहिं समुझाय ॥
बार बार तोसे कहूँ, ह्यां मत दीजो चित्त ।
सिद्ध स्वर्गफलकामना, तजि कीजो हरिमित्त ॥
जो कीजै हरि हेतही, एहो चरणहि दास ।
भक्तियोग अरु शुभकरम, नीकी ठौर निवास ॥
शिष्यवचन
ऐसेही अब करूंगो, तुम चरणन परताप ।
अष्ट सिद्धि समझौ चहौं, वर्णन कीजै आप ॥
समझौं तौ त्यागूं उन्हें, करवाओ पहिंचान ।
अष्टाङ्गयोगवर्णन । १०३
कहा नाम लक्षण कहा, कौन रहे अस्थान ॥
गुरुवचन ॥
कहि शुकदेव वर्णन करूं, अष्ट सिद्धि के नाउ ।
लक्षण गुण सबही सहित, नीके तोहिं समझाउ ॥
अथ अष्टसिद्धि के नाम ॥
प्रथमै अणिमा सिद्धि कहावै । चाहे तो छोटा ह्वै जावै ॥
अणु समान छिपि जावै सोई । ऐसी कला जु पावै कोई ॥
दूजी महिमा लक्षण एता । चाहे बड़ा होय वह जेता ॥
तीजी लघिमा वह कहवावै । पुष्पतुल्य हलका ह्वै जावै ॥
चौथी गरिमा कहूँ बिचारी । चाहे जितना होवै भारी ॥
पाँचवीं प्रापति सिद्धि कहावै । जित चाहे तितही ह्वै आवै ॥
छठवीं पराकाम्य गुण धरै । शक्ति पाय चाहे सो करै ॥
सातवीं सिद्धि ईशिता रानो । सबको आज्ञा माहिं चलानी ॥
दो० वशीकरण सिधि आठवीं, कहैं श्री शुकदेव ।
चाहे जिसको वश करै, अपनाही करि लेव ॥
चरणदास सिद्धैं कही, समझलेहि मनमाहिं ।
जो हैं जनुआं राम के, इनमें उरझैं नाहिं ॥
योग किये आठो सिधि पावै । कै भोगै कै चित न लगावै ॥
योग किये मन जीता जावै । पलटै जीव ब्रह्मगति पावै ॥
योगेश्वर चाहे सो करै । भरी रितावै रीती भरै ॥
योगेश्वर ईश्वर ह्वै जाई । दिन दिन बढ़ै कला सवाई ॥
तजिये भोग योगहीं करिये । तिरगुण परै ध्यानही धरिये ॥
चौथे पद में करै निवासा । काहू विधि का रहै न साँसा ॥
योग करै सोई परबीना । शुकदेव कहैं प्रकट कहि दीना ॥
१०४ श्रीस्वामीचरणदासजीकाग्रन्थ ।
दो० पोथी माहीं देखि करि, करै जु कोई योग ।
तन छीजै सिधि ना भवै, देहो आवै रोग ॥
देखि देखि गुरु सों करै, लै अज्ञा रहु संग ।
सिद्धि होय, साधन सबै, कछू न आवै भंग ॥
योग तपस्या में बड़ा, पहुँचावै हरि पास ।
जन्म मरण बिपता मिटै, रहै न कोई आस ॥
शिष्यवचन ॥
मैं समझी जानी सभी, सूझभई हिय माहिं ।
किरपाकरि जो जो कहा, ताको बिसरूं नाहिं ॥
व्यासदेव श्री जनक जै, जै जै श्री शुकदेव ।
जै जै यह सुकतारहै, समुझायो करि हेव ॥
हियहुलसो आनँदभयो, रोम रोम भयो चैन ।
भये , पबित्तर कान ये, सुनि सुनि तुम्हरे बैन ॥
छप्पै ॥
गुरु ब्रह्मा गुरु विष्णु गुरू देवनके देवा ।
सर्व सिद्धि फल देन गुरू तुम मुक्ति करेवा ॥
गुरु केवट तुम होय करौ भवसागर पारी ।
जीव ब्रह्म करिदेत हरौ तुम व्याधा सारी ॥
श्रीशुकदेव दयाल गुरु चरणदास के शीश पर ।
किरपाकरि अपनौ कियौ सबही विधिसों हाथधर ॥
इति श्रीगुरुचेलासंवादअष्टाङ्गयोगसम्पूर्णम् ॥
योगसन्देहसागरवर्णन । १०५
अथ श्रीचरणदासकृतयोगसन्देहसागर
प्रारम्भः ॥
दो० अर्थ बताओ पण्डिता, ज्ञानी गुणी महन्त ।
जो तुम पूरे साधुहौ, भक्ता हरिके सन्त ॥
चरणदास पूंछैं 'अरथ, भेदी होय कहौ ।
समझौ तौ चर्चा करौ, नाहीं मौन गहौ ॥
ब्रहमण्डे सों पिण्डे जानौ । ठौर ठोर घट में पहिचानौ ॥
सात समुंदर घट में कहां । कछुवा रहै बताओ जहां ॥
शेषनाग किहं ठौर बिराजै । रूप वराह कौन छवि छाजै ॥
कहा चार काया में खान । चौरासी लख योनि बखान ॥
षट चक्कर को जो तुम जानौ । नाम सहित सब भेद बखानौ ॥
नाभि कुण्डली का परमान । कैसे जागै कहौ बखान ॥
सहज सहज वह कहां समावै । योगि होय सों भेद बतावै ॥
चरणदास का गुरु शुकदेव । सो तौ जानै सबही भेव ॥
दो० कहां जु वासा पवन का, मन कौनी अस्थान ।
कहां हिये कीं आंखिहै, कैसे करै पिछान ॥
प्राण पुरुष अन्तर्गत' कैसे । क्योंकरि भेद बताओ जैसे ॥
इड़ा पिंगला सुषमन नारी । कैसे पलटैं बारी बारी ॥
आठ प्रकार के कुम्भक जानै । सो जुगता मेरे मन मानै ॥
चार अवस्था चार शरीरा । वाणी चारि नाम कहा वीरा ॥
कै प्रकार अजपा का जाप । कै अंगुल श्वासा का नाप ॥
क्यों आवै अरु क्यों वह जय । याका ज्ञानी करौ लखाय ॥
१'भीतरप्राप्त २ बाल किशोर पौगण्ड वृद्धादि चार अवस्था ॥
१०६ श्रीस्वामीचरणदासजीकाग्रन्थ ।
परा पश्यती मध्यमाँ कहा। कहा वैखरी देहु बता ॥
चरणदास का गुरु शुकदेव। सो तौ जानै सबही भेव ॥
॰ दो० पद तीनौ कहूँ विष्णुके, स्वप्ना जाग्रत भेद ।
बामन अक्षर देह में, पुहुप द्वीप कहां स्वेत ॥
ऽ कहाँ इक्कीस काया में लोक। इन्द्र करैं कहाँ नित्त भोग ॥
ब्रह्मादिक शिव कहां त्रिदेवा। काविधि उनको पावै भेवा ॥
षोड़श चन्द कहां परकाशा। बारह सूर्य्यनका कित बाशा ॥
ऽ तारामण्डल कैसे दरशैं। त्रिकुटी संयम कैसे परशैं ॥
त्रैवेणी को कैसे पावै। रंकार कहाँ शब्द जगावै ॥
वर्णों अक्षर ॐकारा। तासे भयो सकल संसारा ॥
ऽ जाका कीजै कैसे ध्याना। कौन दिशा अरु कोअस्थाना ॥
चरणदास का गुरु शुकदेव। सो तौ जानै सबही भेव ॥
दो० निर्गम सुर्गम भेद कहु, श्वास उसास बताव ।
काया में विष कहां है, बिन्दु कुण्ड दर्शाव ॥
जीव ब्रह्म में केता बीच। कौन कौन काया में नीच ॥
ऽ अमृतकुण्ड कौन अस्थान। बंक नालकी कहु पहिंचान ॥
ब्रह्मरन्ध्र का भेद लखाव। कामधेनु का बरण बताव ॥
ऽ मानसरोवर ताल बताय। तामें हंसा कैसे न्हाय ॥
ऽ विना सीप कहाँ उपजै मोती। विनाघीव कहाँजगमग ज्योती ॥
ऽ बिन सूरज कहाँ नितही धूप। भवँर गुफा का कैसा रूप ॥
ऽ शून्य शिखर का कीधर द्वारा। कै खिरकी अरु कहाअकारा ॥
चरणदास का गुरु शुकदेव। सो तौ जानै सबही भेव ॥
दो० कहां दशौ दिगपाल हैं, कहाँ इन्द्रिन के देव ॥
अहार वास पँचतत्त्वको, बरणि बतावो भेव ॥
काशी अरु मथुरा है दोय। कहाँ देहमें कहिये सोय ॥
योगसन्देहसागरवर्णन । १०७
१ अरसठि तीरथ घट में ज्योंकर । सबका गुरु पुष्कर है क्योंकर ॥
कहां बसै बाई उद्यान । कहां बन्ध लागै उड्यान ॥
”कहांकपाट का कुञ्जी ताला । द्वादशकला कौन मतवाला ॥
”कण्ठ कूप उलटाहै कौन । नेजू कहा बतावो जौन ॥
”पनिहारी कहा कैसे भरैं । घड़िया कहाँ कहाँ भरिधरैं ॥
”कै प्रकार अमृतका स्वाद । कौन ठौर सों अनहद नाद ॥
अब्र डोर कैसे करिपावै । मकर तारका भेद बतावै ॥
चरणदासका गुरु शुकदेव । सोतौ जानै सबही भेव ॥
दो० घण्ट ताल का लम्बका, और अम्ब का बोल ।
चारि वस्तु ये कौन हैं, इन्हें बतावो खोल ॥
”कौन कमलपर गुरू विराजै । कै प्रकार अनहद धुनि बाजै ॥
”कै वाणी हैं अनहद तूरा । जानैगा कोइ साधू पूरा ॥
तेजपुञ्ज कै योजन आगे । अमरलोक कब सूझनलागे ॥
तीन शून्यकहाँ चौथा शून्य । जितही भूले पढ़ि अर
१०८ श्रीस्वामीचरणदासजीकाग्रन्थ ।
नामरूप मुद्रौं का जान । तीन बंध का नाम बखान ॥
चौरासी आसन का नाँवँ । और बतावो मन के पाँवँ ॥
स्वर्ग मर्त्य अरु कहां पताल । कहां सत्य अरु कहां तिताल ॥
चरणदास का गुरु शुकदेव । सोतौ जानै सबही भेव ॥
दो० कै प्रकार का योग है, कै प्रकारकी भक्ति ।
पांच भूमिका ज्ञानकी, सातकलाका अर्थ ॥
୨ को नगरी का राज करै । को जीवै अरु कौन मरै ॥
୨ पेट बड़ा किसका है जान । पूजा बड़ी ताहि पहिंचान ॥
୨ सब में बड़ा कौन आहार । ताको सुरता लेहु निहार ॥
୨ ताबिन एक घड़ी नहिं रहै । भेदी होय सो भेदै कहै ॥
୨ सबमें बड़ी कहा जो पूजा । जाकी सम दीखै नहिं दूजा ॥
कहा सो सबको लग्गमलग्गा । कौनपुरुष सो भग्गमभग्गा ॥
୨ कहा घटै सो घटैई घटै । कहा बढ़ै सो बढ़ैई बढ़ै ॥
୨ घटै न बढ़ै सो बस्तु कहा । घटे बढ़े भी ताहि बता ॥
चरणदास का गुरु शुकदेव । सो तौ जानै सबही भेव ॥
୨ दो० क्षरके कहा जु अर्थ हैं, अक्षर देहु दिखाय ।
निअक्षर के रूपको, भिन्न भिन्न समझाय ॥
ॐकारका अर्थ बतवो । महत्तत्व का रूप दिखावो ॥
୨ मन चक्कर का कैसा रंग । मन मनसा दोउ कैसे संग ॥
୨ कौन घाट हौ लगे समाध । कित जा देखै खेल अगाध ॥
चौबिस शून्य हैं जहाँ जहाँ । बज्जर ताला लागै कहाँ ॥
वज्रद्वार बिन पावै कहाँ । बिन पाये उरले घर रहा ॥
आठ महलका करौ बखान् । कासों कहिये पद निर्वांन ॥
जो तुम जानौ ऊरधरेता । तौ तुम भेद कहौ अब केता ॥-
दीप मुद्रा अरु मुद्रा राज । जासों सुधरैं काया काज ॥
योगसन्देहसागर वर्णन । १०६
काया महलके जो तुम भेदी । ठौर ठौर कहु घटमें जेती ॥
पाँचंतत्त्व की इन्द्री दश । यही बतावो आगे बश ॥
चरणदासका गुरु शुकदेव । सोतौ जानै सबही भेद ॥
दो० चारदूध चौदह चौवारे, भेदी होय सो जानै ।
चरणदास शुकदेवका, बालक सो यह भेद बखानै ॥
छप्पय ॥
चंदकला कित छिपै बढ़ जब कितसों आवै ।
बादर कितसों होय फटै जब कहाँ समावै ॥
दीपलोय बुझिजाय जाय कित मोहिं बतावो ।
राति दिना कित जाय ध्रुवा केहि ठौर लखावो ॥
चरणदास शुकदेव सों पूँछतहौं शिरनाय के ।
तन छूटै जीजाय कित आवतहै किहि ठाँयते ॥
कवित्त ॥
देखो है तमाशा देह समझिकै विचारिलेहु, मूरुखनरहोय जो या बातमें हँसैगो ।
चीतेको मारि मृग नखशिख सुखायगयो, बाघनीको मारिवोकसिंहको ग्रसैगो ॥
बिल्लीको मारि चूहे प्रेमको नगारोदियो, दादुरहू पांच सर्प मारिकै बसैगो ।
कहै चरणदास ऐसे खेलसों लगाई आश, चिरिया के शीश तोरी बाजको लसैगो ॥
दो० पगलागूं शुकदेव के, और वारने जावं ।
गुप्तभेद मोसों कह्यो, सबवै नावं अरु ठावं ॥
सो तुमसों पूंछन करौं, हौं परषन के दाय ।
या सागर संदेह को, दीजै अर्थ बताय ॥
इति श्रीमन्महाराजसाहिबश्रीचरणदासकृतसंदेहसागरसंपूर्णम् ॥
०००००००००
१ पृथ्वी जल अग्नि वायु आकाश ॥
११० श्रीस्वामीचरणदासजीकाग्रन्थ ।
अथ श्रीचरणदासकृतज्ञानस्वरोदय
प्रारम्भः ॥
दो० नमो नमो शुकदेव जी, परणम करौं अनन्त ।
तुम प्रसाद स्वरभेद को, चरणदास वर्णन्त ॥
ऽ पुरुषोत्तम परमातमा, पूरण बिस्वा बीश ।
ऽ आदिपुरुषअविचल तुहीं, तोहिं निवाऊं शीश ॥
कुं० ऽक्षर ॐ सों कहत हैं अक्षर सोहं जान ।
ऽ निहअक्षर श्वासा रहितहै ताहि को मन आन ॥
ऽ ताही को मन आन रात दिन सुरति लगावो ।
ऽ आपा आप विचारि औरना शीश नवावो ॥
ऽ चरणदास मथि कहतहैं अगम¹ निगम² की सीख ।
ऽ यही वचन ब्रह्मज्ञान का मानो बिस्वाबीस ॥
ॐ सूं काया भई सोहं सो मन होय ।
निहअक्षर श्वासा भई चरणदास भल जोय ॥
चरणदास भल जोय खेंचि मनवाँ तहं राखौ ।
क्षर अक्षर निहअक्षर एकै दुबिधा नाखौ ॥
ऽ जब दरशै एकही एक भेष यह सभी तिहारो ।
ऽ डार पात फल फूल मूल सो सभी निहारो ॥
श्वासा सों सोहं भयो सोहं ॐकार ।
ॐ सों रर्रा भयो साधो करो विचार ॥
ऽ साधो करो विचार उलटि घर अपने आवो ।
ऽ घट घट ब्रह्म अनूप सिमिरि करि तहाँ समावो ॥
१ पुराण २ वेद ॥
ज्ञानस्वरोदयवर्णन । १११
चारि वेद का भेद है, गीता का है जीव ।
चरणदास लखि आपको, तो मैं तेरा पीव ॥
दो० सब जोगन को जोग है, सब ज्ञानन को ज्ञान ।
सर्वसिद्धि को सिद्धि है, तत्त्व स्वरनको ध्यान ॥
ब्रह्मज्ञान को जाप है, अजपा सोहं साध ।
परमहंस कोइ जानि है, ताको मतो अगाध ॥
भेद स्वरोदय सो लहै, समझै श्वास उसास ।
बुरी भली तामें लखै, पवन सुरति मन गांस ॥
शुकदेव गुरू कृपा करी, दियो स्वरोदय ज्ञान ।
जब सों यह जानी परी, लाभ होय कै हान ॥
इड़ा^१ पिंगला^२ सुषमना^३, नाड़ी तीन विचार ।
दहिने बायें स्वरचलैं, लखै धारणा धार ॥
पिंगल दहिने अंग है, इड़ा सो बायें होय ।
सुषमन इनके बीच है, जब स्वर चालैं दोय ॥
जब स्वर चालैं पिंगला, तिहि मधि सूरज वास ।
इड़ा सो बायें अंग है, चन्द्र करत परकास ॥
उदय अस्त तिनकी लखै, निर्गम सुर्गम बिद्धि ।
और पावै तत बरणको, जब वह होवै सिद्धि ॥
शुकदेव कहिचरणदाससों, थिरचर स्वर पहिंचान ।
थिरकारज को चन्द्रमा, चरकारज को भान ॥
कृष्णपक्ष जबहीं लगै, जाय मिलत है भान ।
शुक्लपक्ष है चन्द्र को, यह निहचै करिजान ॥
मंगल अरु इतवार दिन, और शनीचर लीन ।
१ बाईं ओर की नाड़ी को कहते हैं २ दाहिनी ओर की नाड़ी को कहते हैं
३ दोनों के मध्य की नाड़ीको कहते हैं ॥
११२ श्रीस्वामीचरणदासजीकाग्रन्थ ।
शुभकारज को मिलत हैं, सूरज के दिन तीन ॥
सोमवार शुकर भलो दिन, बृहस्पति को देखि ।
चंदजोग में सुफल हैं, कहैं चरणदास बीशेखि ॥
तिथिऔरवार विचारकरि, दहिनो बाऔं अंग ।
चरणदास कहै स्वर जो मिलै, शुभकारज परसंग ॥
कृष्णपक्ष के आदिहि, तीनि तिथ्य तक भान ।
फिरि चंदा फिरि भान है, फिरि चंदा फिरि भान ॥
शुक्लपक्ष के आदिही, तीनि तिथ्य लग चन्द ।
फिरि सूरज फिरि चन्द है, फिरिसूरज फिरि चन्द ॥
सूरजकी तिथि में चलै, जो सूरज परकास ।
सुख देही को करत हैं, लाहालाभ हुलास ॥
शुक्लपक्ष चन्दा चलै, परिवा लेहि निहार ।
फल आनंद मंगल करै, देही कूं सुखसार ॥
शुक्लपक्ष तिथि में चलै, जो परिवा को भान ।
होय क्लेश पीड़ा कछू, कै दुख कै कुछ हान ॥
सूरज की तिथि में चलै, जो परिवा को चन्द ।
कलह करै पीड़ा करै, हानि ताप कै द्वन्द ॥
ऊपर बायें सामने, स्वर बायें के संग ।
जो पूंछै शशि जोगमें, तौ नीको परसंग ॥
नीचे पीछे दाहिने, स्वर सूरज को राज ।
जो कोइ पूंछै आयकरि, तौ समझौ शुभकाज ॥
दहिनो स्वर जब चलत है, पूंछै बायें अंग ।
शुक्लपक्ष नहिं वार है, तौ निर्फल परसंग ॥
जो कोइ पूंछै आयकरि, बैठि दाहिनी ओर ।
चन्द चलै सूरज नहीं, नहिकारज बिधि कोर ॥
ज्ञानस्वरोदयवर्णन । ११३
जो सूरज में स्वर चलै, कहै दाहिने आय ।
७ लग्नवार अरु तिथिमिलै, कहु कारज होइ जाय ॥
जो चन्दा में स्वर चलै, वायें पूंछै काज ।
तिथि अरु अक्षरवारमिलि, शुभकारज को साज ॥
७सात पांच नव तीन गिन, पन्द्रह ओर पचीश ।
काज बचन अक्षर गिनै, भानु जोग को ईश ॥
चार आठ द्वादश गिनै, चौदह सोलह मीत ।
चन्दजोग के संग हैं, चरणदास रणजीत ॥
कर्क मेष तुला मकर, चारौ चरती राश ।
सूरज सों चारौ मिलत, चरकारज परकाश ॥
मीन मिथुन कन्या कही, चौथी ओर धन मीत ।
'द्विस्वभाव' की सुषमना, मुरलीसूत रणजीत ॥
वृश्चिकसिंहवृषकुम्भ पुनि, बायें स्वरके संग ।
चन्द जोगको मिलत हैं, थिरकारज परसंग ॥
चित अपनो रिथर करै, नासा आगे नैन ।
श्वासा देखै दृष्टि सों, जब पावै स्वर बैन ॥
पांचघड़ी पांचो चलैं, फिरि वा चारहि बार ।
पांचतत्व चालै मिले, स्वरबिच लेह निहार ॥
धरती अरु आकाश है, और तीसरी पौन ।
पानी पावक पांच यों, करत श्वासमें गौन ॥
धरती तौ सोहीं चलै, अरु पीरौ रँग देख ।
बारह अंगुल श्वास में, सुरत निरतकर पेख ॥
ऊपर को पावक चलै, लाल बरण है भेष ।
चारि सु अंगुल श्वास में, चरणदास औ रेष ॥
नीचे को पानी चलै, श्वेत रंग है तासु ।
११४ श्रीस्वामीचरणदासजीकाग्रन्थ ।
सोलह अंगुल श्वास में, चरणदास कहै भासु ॥
हरो रंग है वायु को, तिरछी चालै सोय ।
आठ सुअंगुल श्वास में, रणजीत मीतकरिजोय ॥
स्वर दोनों पूरण चलैं, बाहर ना परकाश ।
श्याम रंग है तासु को, सोई तत्त्व आकाश ॥
जल पृथ्वी के जोग में, जो कोइ पूँछै बात ।
शशियर में जो स्वर चलै, कहु कारज होयजातं ॥
पावकऔर आकाश पुनि, वायु कभी जो होय ।
जो कोइ पूंछै आयकरि, शुभकारज नहिं होय ॥
जल पृथ्वी थिरकाज को, चरकारज को नाहिं ।
अग्नि वायु चरकाज को, दहिने स्वरके माहिं ॥
रोगी को पूंछै कोऊ, बैठि चन्द की ओर ।
धरती बायें स्वर चलै, मरै नहीं विधि क्रोर ॥
रोगी को परसंग जो, बायें पूँछै आन ।
चन्द बंध सूरज चलै, जीवै ना वह जान ॥
बहते स्वरसों आयकरि, शून्य ओर जो जाय ।
जो पूंछै परसंग वह, रोगी ना ठहराय ॥
शून्य ओर सों आयकर, पूंछै बहते श्वास ।
यह निश्चय करि जानिये, रोगी को नहिं नास ॥
शून्य ओर सों आय कै, पूंछै बहते पक्ष ।
जेते कारज जगत के, सुफल होयँ यों सब ॥
बहते स्वर से आय करि, जो पूंछै सुन और ।
जेते कारज जगत के, उलटे हों विधि क्रोर ॥
कै बायें कै दाहिने, जो कोइ पूरण होय ।
पूंछै पूरण होरही, कारज पूरण सोय ॥
ज्ञानस्वरोदयवर्णन । '११५
बरस एक को फल कहै, तत मत जानै सोय ।
काल समौ सोई लखै, बुरो भलो जग होय ॥
संक्रायत पुनि मेष विचारै । तादिन लगै सु घड़ी निहारै ॥
तबहीं स्वर में करै विचारा । चलै कौन सो तत्त्व नियारा ॥
जो बायें स्वर पिरथी होई । नीको तत्त्व कहावै सोई ॥
देश वृद्धि अरु समै बतावै । परजा सुखी मेह बरसावै ॥
चारा बहुत ढोर को उपजै । नरदेही कों अन्न बहु निपजै ॥
जल चालै बायें स्वर माहीं । धरती फलै मेह बरसाहीं ॥
आनँद मंगल सों जग रहै । आपतत्त्व चन्दामें बहै ॥
जल धरती दोनों शुभ भाई । चरणदास शुकदेव बताई ॥
तीन तत्त्वका कहौं विचारा । स्वर में जाको भेद निहारा ॥
लगै मेष संक्रायत तबहीं । लगती घड़ी विचारै जबहीं ॥
अग्नितत्त्व स्वरमें जब चालै । रोग दोषमें परजा हालै ॥
काल पड़ै थोड़ोसो बरसै । देश भंग जो पावक दरसै ॥
वायु तत्त्व चालै स्वर संगा । जग भयमान होय कछु दंगा ॥
अर्द्ध काल थोड़ो सो बरसे । वायु तत्त्व जो स्वरमें दरसे ॥
तत्त्व आकाश स्वर चालै दोई । मेह न बरसै अन्न न होई ॥
काल पड़ै तृण¹ उपजै नाहीं । तत अकाश जोहो स्वर माहीं ॥
दो० चैत महीना मध्य में, जबहीं परिवा होय ।
शुक्लपक्ष ता दिन लगै, प्रातस्वास² में जोय ॥
भोरहि परिवा को लखै, पृथ्वी होय सुथांन ।
होय समौ परजा सुखी, राजा सुखी निदान ॥
नीर चलै जो चन्द में, यही समै की जीत ।
मेह बरसै परजा सुखी, संबत नीको मीत ॥
१ घास २ पहिला श्वासा ॥
११६ श्रीस्वामीचरणदासजीकाग्रन्थ ।
पृथ्वी पानी समौ जो, बहै चन्द अस्थान ।
'दहिने स्वर में जो बहै, समौ सु मध्यम जान ॥
भोरहिजो सुषमन चलै, राज होय उतपात ।
देखनवारो विनशहै, और काल पड़िजात ॥
राजहोय उतपात पुनि, पड़ै काल विसवास ।
मेह नहीं परजा दुखी, जो हो तत्त्व अकास ॥
श्वासा में पावक चलै, परै काल जब जान ।
रोग होय परजा दुखी, घटै राज को मान ॥
भय कलेश हो देश में, विग्रह फैलै अत्त ।
परै काल परजा दुखी, चलै वायु को तत्त ॥
संक्रायत अरु चैत को, दीन्हों भेद लखाय ।
जगतकाज अबकहतहूं, चन्द सूरको न्याय ॥
विवाहदान तीरथ जो करै । वस्तर भूषण घर पग धरै ॥
बायें स्वर में ये सब कीजै । पोथी पुस्तक जो लिखि लीजै ॥
'जोगाभ्यासरु कीजै प्रीत । औषधि बाड़ी कीजै मीत ॥
दिक्षा¹ मंतर बोवै नाज । चन्द्र जोग थिर बैठै राज ॥
चन्द्र जोग में स्थिर जानौ । थिर कारज सबही पहिंचानौ ॥
करै हवेली छप्पर छावै । बाग बगीचा गुफा² बनावै ॥
हाकिम जाय कोट में बरै । चन्द्र जोग आसन पग धरै ॥
चरणदास शुकदेव बतावै । चन्द्र जोग थिर काज कहावै ॥
दो० बायें स्वर के काज ये, सो मैं दिये बताय ।
दहिने स्वरके कहत हूं, ज्ञानस्वरोदय गाय ॥
जो खांड़ो कर लीयो चाहै । जाकर वैरी ऊपर बाहै ॥
युद्ध वाद रण जीतै सोई । दहिने स्वर में चालै कोई ॥
१ गुरुसे मंत्र लेना २ कन्दरा ॥