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भगत सिंह और उनके साथियों के संपूर्ण उपलब्ध दस्तावेज (प्रो. चमनलाल - प्रामाणिक ऐतिहासिक संकलन)

Complete Available Documents of Bhagat Singh & Associates

शहीद-ए-आजम भगत सिंह (सम्पादक: प्रो. चमनलाल) द्वारा

DevanagariHindipublished788 पृष्ठ

<u>पृष्ठ 62 (59)</u>
श्रम का शोषण और राज्य :
“सिर्फ़ प्राचीन और सामन्ती ही नहीं, बल्कि आज का प्रतिनिधि राज्य भी पूँजी
द्वारा उजरती श्रम के शोषण का एक उपकरण ही है।”
– एंगेल्स¹
अधिनायकत्व :
“चूँकि राज्य सिर्फ़ एक अस्थायी संस्थाभर है जिसका उपयोग अपने शत्रुओं
का बलपूर्वक दमन करने के लिए क्रान्ति में किया जाता है, इसलिए जनता के
स्वतन्त्र राज्य की बात करना कोरी बकवास है, जब तक सर्वहारा वर्ग को राज्य की
आवश्यकता रहती है, तब तक इसकी आवश्यकता स्वतन्त्रता के हित में नहीं,
बल्कि अपने विरोधियों का दमन करने के लिए पड़ती है, और जैसे ही स्वतन्त्रता
की बात करना सम्भव हो जाता है, वैसे ही इसका अस्तित्व अपनेआप ख़त्म हो
जाता है।”
बेबेल को लिखे एंगेल्स के पत्र से, 28 मार्च, 1875²
अधीर आदर्शवादी :
अधीर आदर्शवादी के लिए – और बिना कुछ अधीरता के शायद ही आदमी
प्रभावी सिद्ध हो सके – यह लगभग तय बात है कि दुनिया को खुशहाल बनाने
की कोशिश में उसे अपने विरोधियों की घृणा का पात्र बनना होगा और निराश भी
होना पड़ सकता है।
– बर्ट्रेण्ड रसेल
<u>पृष्ठ 63 (60)</u>
नेता :
कार्लाइल³ लिखता है, “कोई भी समय बरबाद न हुआ होता”, यदि कोई
महान आदमी मिल जाता जो काफ़ी समझदार और नेक होता, जिसमें इतनी

  1. परिवार, निजी सम्पत्ति और राज्य की उत्पत्ति से
  2. अगस्त बेबेल (1840-1913) – जर्मन तथा अन्तरराष्ट्रीय मज़दूर आन्दोलन के एक
    प्रसिद्ध नेता। 1867 से जर्मन मज़दूर संघों की लीग के नेता, पहले इण्टरनेशनल के सदस्य, 1867
    से राइखस्टाग (जर्मन संसद) के सदस्य, जर्मन सामाजिक-जनवाद के संस्थापकों में से एक,
    मार्क्स तथा एंगेल्स के मित्र तथा सहयोगी, दूसरे इण्टरनेशनल के प्रमुख नेता
  3. टॉमस कार्लाइल (1795-1881) : ब्रिटिश लेखक व निबन्धकार
    शहीदेआज़म की जेल नोटबुक / 609

समझदारी होती कि वह सही-सही जान ले कि वक़्त का तक़ाज़ा क्या है; जिसमें
इतना पराक्रम होता कि वक़्त के लिहाज़ से सही रास्ते पर नेतृत्व कर सकता, तब
तो इनकी बदौलत कोई भी समय मुक्ति का समय हो सकता था।
स्वेच्छाचारिता :
काउत्स्की ने “प्रोलितारियत डिक्टेटरशिप” शीर्षक से एक पुस्तिका लिखी,
जिसमें उसने बोल्शेविकों द्वारा बुर्जुआ वर्ग के लोगों को वोट देने के अधिकार से
वंचित किये जाने की निन्दा की। इस पर लेनिन ने अपनी “प्रोलितारियन
रिवोल्यूशन” : (पृष्ठ 77) में लिखा :
“स्वेच्छाचारिता! ज़रा सोचें तो कि इस खेद प्रकाश में कमीनेपन के किस
निकृष्ट स्तर पर उतरकर बुर्जुआ वर्ग की चापलूसी की गयी है, और कितना अधिक
मूर्खतापूर्ण पाण्डित्य बघारा गया है। जबकि सदियों से, मज़दूरों का दमन करने के
लिए, ग़रीब लोगों के हाथ-पाँव बाँधे रखने के लिए, और जनता के सीधे-सादे और
मेहनतकश समुदायों के रास्ते में एक सौ एक अड़ंगे और अड़चनें खड़े करते रहने
के लिए, पूरी तरह से बुर्जुआ, और उसमें भी पूँजीवादी देशों के प्रतिक्रियावादी
विधिवेत्ता ही नियम-विधान बनाते आये हैं, और वे ही विविध संहिताओं और
क़ानूनों पर सैकड़ों ग्रन्थ और उनकी व्याख्याएँ लिखते आये हैं – जहाँ इतना
सब किया गया है, वहाँ बुर्जुआ उदारपन्थियों और श्री काउत्स्की को कोई
“स्वेच्छाचारिता” नहीं दिखायी देती! तब तो यह सब क़ानून-व्यवस्था है! यह सब
इसलिए सोचा और लिखा गया है कि कैसे ग़रीबों को दबाये रखकर निचोड़ते रहा
जाये। हज़ारों-हज़ार बुर्जुआ वकील और सरकारी अहलकार क़ानूनों की ऐसी
व्याख्या करते रहते हैं कि मज़दूर और औसत किसान उनकी कँटीले तारों की
घेरेबन्दी को कभी तोड़ न सकें। बेशक, यह कोई स्वेच्छाचारिता नहीं है। बेशक,
यह उन गन्दे या मुनाफ़ाखोर शोषकों का अधिनायकत्व नहीं है जो जनता का ख़ून
पी रहे हैं। ओह, यह ऐसा कुछ भी नहीं है! यह तो ‘शुद्ध जनतन्त्र’ है, जो
दिन-प्रतिदिन शुद्धतर होता जा रहा है। [पृष्ठ 64 (61) पर जारी] लेकिन जब,
साम्राज्यवादी युद्ध द्वारा सरहद पार के अपने भाइयों से अलग कर दिये गये
मेहनतकश और शोषित जनसमुदायों ने इतिहास में पहली बार अपनी सोवियतें गठित
कर ली हैं, जब उन्होंने राजनीतिक निर्माण के लिए मज़दूरों का और उन वर्गों का
आह्वान किया है जिन्हें बुर्जुआ वर्ग उत्पीड़ित और जड़ बनाये रखता था, और जब
से वे एक नया सर्वहारा राज्य निर्मित करने के काम में लग गये हैं, तथा विकट
रूप से जारी युद्ध के दौरान, गृहयुद्ध की ज्वाला में, जब वे ‘शोषकों से रहित राज्य’
के बुनियादी सिद्धान्त निरूपित करने लगे, तब बुर्जुआ वर्ग के सभी पाजी तत्त्व, और
610 / भगतसिंह और उनके साथियों के सम्पूर्ण उपलब्ध दस्तावेज़

खून चूसने वालों के सभी गिरोह काउत्स्की के सुर में सुर मिलाकर, स्वेच्छाचारिता
की चीख़-पुकार मचाने लगे हैं!
(लेनिन) पृष्ठ 77-78¹
पार्टी :
लेकिन यह स्पष्ट हो चुका है कि जब तक क्रान्ति का नेतृत्व करने के लिए
एक सक्षम पार्टी न हो, तब तक कोई क्रान्ति सम्भव नहीं हो सकती।
(पृष्ठ 15, लेसंस ऑफ़ अक्टूबर, 1917)²
सर्वहारा क्रान्ति के लिए पार्टी एक अपरिहार्य उपकरण है।
(पृष्ठ 17, वही, त्रात्स्की कृत)
पृष्ठ 65 (62)
[हस्ताक्षर: BK Dutt, दिनांक: 12/7/30, 12/7/30]³
उसके (मेहनतकश, आदमी के) लिए क़ानून, नैतिकता, धर्म ये सब उसके
(सर्वहारा के) लिए नाना बुर्जुआ पूर्वाग्रह मात्र हैं, जिनकी आड़ में इतने ही बुर्जुआ
स्वार्थ घात लगाये रहते हैं।
कार्ल मार्क्स – घोषणापत्र ⁴

  1. लेनिन, सर्वहारा क्रान्ति और ग़द्दार काउत्स्की
  2. लिओन त्रात्स्की की किताब, लेसंस ऑफ़ अक्टूबर 1917 से
  3. पृष्ठ का ऊपरी लगभग दो-तिहाई भाग ख़ाली है। इसमें सिर्फ़ बी.के. दत्त (बटुकेश्वर
    दत्त) का तिरछा हस्ताक्षर है। और दिनांक 12.7.30 दो बार अंकित है।
  4. मार्क्स-एंगेल्स, कम्युनिस्ट पार्टी का घोषणापत्र
    शहीदेआज़म की जेल नोटबुक / 611

पृष्ठ 67 (64)
BK Dutta
12th July '30
⎧ Autograph
⎪ of Mr. BK Dutta
⎪ taken on 12th July '30
⎨ in Cell No: 137
⎪ Central Jail Lahore
⎪ four days before his final
⎩ departure from this jail.
Bhagat Singh

नोटबुक में पृष्ठ 66 (63) नहीं है। इस पृष्ठ, यानी नोटबुक पृष्ठ 67 (64) पर, मध्य में,
बी.के. दत्त का तारीख़ (12.7.1930) सहित हस्ताक्षर है।
इसके नीचे भगतसिंह की लिखावट में पृष्ठ पर नीचे, दायीं तरफ़ यह टिप्पणी अंकित है :
श्री बी.के. दत्त का इस जेल से फ़ाइनल
डिपार्चर से चार दिन पहले कोठरी न. 137,
सेण्ट्रल जेल लाहौर, में 12वीं जुलाई '30
को लिया गया आटोग्राफ़,
इसके नीचे भगतसिंह के हस्ताक्षर हैं। इन प्रविष्टियों के अलावा नोटबुक में और किसी
प्रविष्टि में तारीख़ नहीं है।
नोटबुक में पृष्ठ 68 (65) नहीं है।
612 / भगतसिंह और उनके साथियों के सम्पूर्ण उपलब्ध दस्तावेज़

पृष्ठ 69 (66)
कम्युनिस्टों का लक्ष्य
“कम्युनिस्ट अपने दृष्टिकोण और लक्ष्य छिपाने से घृणा करते हैं। वे खुले तौर
पर एलान करते हैं कि उनका लक्ष्य सिर्फ़ समस्त मौजूदा सामाजिक दशाओं को
बलपूर्वक उखाड़ फेंकने के द्वारा ही हासिल हो सकता है। शासक वर्गों को
कम्युनिस्ट क्रान्ति के भय से कांपने दो। सर्वहाराओं के पास अपनी बेड़ियों के
सिवाय खोने के लिए कुछ नहीं है। जीतने के लिए उनके सामने सारी दुनिया है।
दुनिया के मज़दूरो, एक हो!¹
───o───
कम्युनिस्ट क्रान्ति का लक्ष्य
“हम ऊपर देख चुके हैं, कि मज़दूर वर्ग की क्रान्ति में पहला क़दम, सर्वहारा
वर्ग को उठाकर शासक वर्ग की स्थिति में लाना है, जनवाद की लड़ाई को जीतना
है। सर्वहारा अपने राजनीतिक प्रभुत्व का प्रयोग बुर्जुआ वर्ग से धीरे-धीरे करके सारी
पूँजी छीनने, उत्पादन के सभी उपकरणों को राज्य के, अर्थात शासक वर्ग के रूप
में संगठित सर्वहारा वर्ग के हाथों में केन्द्रीकृत करने तथा उत्पादक शक्तियों की
समग्रता में यथाशीघ्र वृद्धि करने के लिए करेगा।”
“कम्युनिस्ट मैनिफेस्टो”²
पृष्ठ 70 (67)
कार्ल मार्क्स की ग़लतियाँ निकालना :
...और यह निश्चित मालूम पड़ता है कि त्रात्स्की मानो उससे सम्बन्धित थे
जिसे जर्मन “असली राजनीति” का स्कूल कहा करते थे, और किसी भी
विचारधारा के प्रति एकदम उतना ही मासूम थे जितना कि बिस्मार्क। और,
इसीलिए, यह देखकर कुतूहल होता है कि त्रात्स्की भी इतने क्रान्तिकारी नहीं हैं
कि कह सकें कि मार्क्स ने एक ग़लती की थी; बल्कि वह एक या अधिक पृष्ठ
अर्थनिरूपण के काम में – अर्थात यह सिद्ध करने में लगाना ज़रूरी समझते हैं कि
पवित्र पुस्तकों में जो कुछ कहा गया है, उसका अर्थ उससे एकदम भिन्न है।
त्रात्स्की कृत ‘लेसंस ऑफ़ अक्टूबर 1917’ की भूमिका
भूमिका ए. सूसन लॉरेंस द्वारा लिखित


  1. कम्युनिस्ट पार्टी का घोषणापत्र का आख़िरी पैरा
  2. कम्युनिस्ट पार्टी का घोषणापत्र
    शहीदेआज़म की जेल नोटबुक / 613

जनता की आवाज़ :
हमें जितनी सरकारों के बारे में जानकारी है, वे सबके सब मुख्य रूप से,
जनता के प्रति उदासीन रहकर ही शासन करती रही हैं, वे हमेशा ही देश के
राजनीतिक रूप से सचेत इस या उस तबके की, अल्पसंख्यक सरकारें ही रही हैं।
लेकिन जब यह दैत्य (यानी जनता – स.) जाग जायेगा, तो उसी की मर्ज़ी लागू
होगी, लेकिन सबसे बड़ी बात है कि यह समय से जागेगा या नहीं।
भूमिका$^1$
पृष्ठ 71 (68)
लेनिन ने जुलाई, 1917 में लिखा, “यह अक्सर होता है कि जब घटनाएँ
अचानक मोड़ ले लेती हैं, तो एक अग्रणी पार्टी भी कुछ समय तक के लिए इस
नयी परिस्थिति के साथ अपनी सुसंगति नहीं बना पाती। वह वे ही पुराने जुमले
दोहराती रहती है, जो इस नयी परिस्थिति में अर्थहीन हो चुके होते हैं, तथा जिस
अनुपात में घटनाओं में 'अप्रत्याशित' परिवर्तन हो चुका होता है, उसी अनुपात में
उनकी अर्थवत्ता भी 'अप्रत्याशित रूप से' ख़त्म हो चुकी होती है।
लेसंस ऑफ़ अक्टूबर (पृष्ठ 17)$^2$
───o───
रणकौशल और रणनीति :
जैसे युद्ध में, वैसे ही राजनीति में भी, रणकौशल का अर्थ है अलग-अलग
कार्रवाई का संचालन करने की कला; रणनीति का अर्थ है विजय पाने की, अर्थात
सत्ता पर वास्तविक क़ब्ज़ा करने की कला।
(पृष्ठ 18)$^3$
───o───
प्रचार और कार्रवाई :
और जब सर्वहारा वर्ग की पार्टी तैयारी से, यानी प्रचार और संगठन एवं
आन्दोलन से, आगे बढ़कर सत्ता के लिए वास्तविक संघर्ष में उतरती है और बुर्जुआ
वर्ग के विरुद्ध एक वास्तविक जन-विद्रोह को अंजाम देने लगती है, तब एक
अत्यन्त अचानक बदलाव घटित होता है। ऐसे में पार्टी के भीतर ऐसे तत्त्व जो
दृढ़संकल्प नहीं रखते, या संदेहशील, या समझौतावादी, या कायर होते हैं – वे
──────────────────────────

  1. वही
  2. और 3. 1926 में प्रकाशित त्रात्स्की की पुस्तक लेसंस ऑफ़ अक्टूबर 1917 से
    614 / भगतसिंह और उनके साथियों के सम्पूर्ण उपलब्ध दस्तावेज़

जेल नोटबुक, सुखदेव-राजगुरु के पत्र, अन्तिम इच्छा-पत्र व सम्पूर्ण उपसंहार

जन-विद्रोह का विरोध करने लगते हैं, अपने विरोध को उचित ठहराने के लिए
सैद्धान्तिक दलीलें खोजने लगते हैं, और उन्हें ये दलीलें, अपने कल के विरोधियों
के बीच, एकदम पके-पकाये तौर पर, मिल भी जाती हैं।
त्रात्स्की 19¹
पृष्ठ 72 (69)
“अब ज़रूरत इस बात कि है कि हम अपनेआप को पुराने फ़ार्मूलों से नहीं,
बल्कि नयी वास्तविकताओं से निर्देशित करें।”
लेनिन (पृष्ठ25)²
वह हमेशा ही भविष्य के लिए अतीत से लड़ते रहे।
पृष्ठ 41³
...लेकिन एक क्षण ऐसा आता है जब सोचने की यह आदत, कि दुश्मन
अधिक बलवान है, विजय के लिए मुख्य बाधा बन जाती है।
त्रात्स्की पृष्ठ 48⁴
...लेकिन ऐसी परिस्थितियों में हरेक पार्टी के पास अपना लेनिन तो होगा नहीं।
...महत्त्वपूर्ण क्षण को गँवा देने का क्या मतलब होता है?...
रणकौशलों की सारी कला इसी में है, कि जब परिस्थितियों का संयोग
सर्वाधिक अनुकूल हो तो उस क्षण के अनुरूप कार्रवाई की जाये...।
परिस्थितियों ने ऐसा ही संयोग उपस्थित किया था और लेनिन ने कहा था कि
संकट को किसी न किसी पक्ष में हल करना ज़रूरी है। लेनिन ने बार-बार कहा,
‘अभी या कभी नहीं’।
पृष्ठ 52⁵
पृष्ठ 73 (70)
एक क्रान्तिकारी पार्टी की ताक़त एक निश्चित सीमा तक बढ़ती है, लेकिन
उसके बाद इसका उल्टा भी हो सकता है...।⁶
“हिचकिचाना अपराध है”...अक्टूबर की शुरुआत में...(लेनिन ने)...लिखा,
1., 2., 3., 4. और 5. त्रात्स्की की किताब लेसंस ऑफ़ अक्टूबर 1917 से
6. आख़िरी शब्द मूल में अस्पष्ट; लेसंस ऑफ़ अक्टूबर 1917 से
शहीदेआज़म की जेल नोटबुक / 615

“सोवियतों की कांग्रेस का इन्तज़ार करना औपचारिकताओं का एक बचकाना खेल
खेलना है, औपचारिकताओं के साथ एक अपमानजनक खेल खेलना है, यह क्रान्ति
के साथ विश्वासघात करना है।”
उपयुक्त क्षण :
राजनीति में समय एक महत्त्वपूर्ण कारक है, और युद्ध एवं क्रान्ति में तो यह
हज़ारों गुना अधिक महत्त्वपूर्ण है। चीजें जो आज की जा सकती हैं, कल नहीं की
जा सकतीं। हथियार लेकर उठ खड़े होना, दुश्मन को पराजित करना, सत्ता पर
क़ब्ज़ा करना, आज सम्भव हो सकता है, और कल असम्भव हो सकता है। लेकिन
आप कह सकते हैं कि सत्ता पर क़ब्ज़ा करने का मतलब तो इतिहास की धारा
को बदल डालना होता है, और क्या यह सम्भव है कि एक ऐसी चीज़ महज 24
घण्टे की देरी पर निर्भर हो? हाँ, जब सशस्त्र जन-विद्रोह की घड़ी आ जाती है,
तब घटनाएँ राजनीति के लम्बे पैमानों से नहीं, बल्कि युद्ध के छोटे पैमानों से नापी
जाती हैं। इसमें कुछेक हफ़्ते, कुछेक दिन, या यहाँ तक कि कभी-कभी एक दिन
की देरी का मतलब क्रान्ति का परित्याग हो सकती है, घुटने टेक देना हो सकता
है।
राजनीतिक चालबाज़ी, ख़ासतौर से क्रान्ति में, हमेशा ख़तरनाक होती है। आप
दुश्मन को धोखा दे सकते हैं, लेकिन इससे आपके पीछे चलने वाले जनसमुदाय
दिग्भ्रमित हो सकते हैं।
पृष्ठ 74 (71)
हिचकिचाहट :
नेताओं की ओर से दिखायी जाने वाली, और उनके अनुयायियों द्वारा महसूस
की जाने वाली हिचकिचाहट राजनीति में आमतौर पर नुक़सानदेह साबित होती है,
और सशस्त्र जन-विद्रोह की स्थिति में तो यह एक घातक ख़तरा है।
युद्ध
...“युद्ध युद्ध है”, चाहे जो भी हो, इसमें कोई हिचकिचाहट या वक़्त की
बरबादी नहीं होनी चाहिए।¹

  1. उपरोक्त सभी उद्धरण सम्भवतः त्रात्स्की की किताब लेसंस ऑफ़ अक्टूबर 1917 से हैं।
    616 / भगतसिंह और उनके साथियों के सम्पूर्ण उपलब्ध दस्तावेज़

अक्षम नेता :
...ऐसे नेताओं की दो क़िस्में हैं जो पार्टी को ऐसे वक़्त पीछे खींचने की रुझान
रखते हैं, जब उसे सबसे तेज़ गति से आगे बढ़ने की ज़रूरत होती है। एक क़िस्म
ऐसे नेताओं की है जिनकी प्रवृत्ति क्रान्ति के रास्ते में हमेशा ही बेपनाह कठिनाइयाँ
और बाधाएँ देखने की होती है, और जो उन्हें देखकर – सचेत या अचेतन तौर पर
– उनसे बचने की इच्छा रखते हैं। ये मार्क्सवाद को तोड़-मरोड़कर इस रूप में
व्याख्यायित करने लगते हैं कि क्रान्तिकारी कार्रवाई क्यों असम्भव है।
दूसरे क़िस्म के नेता महज सतही आन्दोलनकर्ताभर होते हैं। वे जब तक
बाधाओं से टकराकर अपना सिर नहीं फोड़ लेते, तब तक उन्हें कभी बाधाएँ नज़र
ही नहीं आतीं। वे समझते हैं कि बस भाषण झाड़ कर ही वास्तविक कठिनाइयों
से निजात पा लेंगे। वे प्रत्येक चीज़ को अति आशावाद के साथ देखते हैं, और जब
सचमुच कुछ करने को होता है, तब ठीक उसी वक़्त पाला बदल लेते हैं।
पृष्ठ 80¹
पृष्ठ सं. 75 से 100 नोटबुक की हमें उपलब्ध हुई प्रति में नहीं थे।
अगली पृष्ठ अं. 101 (74) है। – सम्पादक
<u>पृष्ठ 101 (74)</u>
समाजशास्त्र²
मूल्य :
“1 पाव मक्का = क/ लोहे की क़ीमत। यह समीकरण हमें क्या बताता है?
यह हमें बताता है कि दो भिन्न-भिन्न चीज़ों में – मक्का पावभर में और लोहे की
क क़ीमत में – समान गुणों वाली कोई चीज़ दोनों में उभयनिष्ठ रूप से मौजूद
है। अतः इन दो चीज़ों को अवश्य ही किसी ऐसी तीसरी चीज़ के बराबर होना
चाहिए, जो स्वयं न तो पहली चीज़ हो, और न ही दूसरी चीज़...। अब आइये हम
इन दोनों उत्पादों में से प्रत्येक के भीतर निहित इस तीसरी अवशिष्ट चीज़ पर विचार
करें, यह प्रत्येक उत्पाद में, एक ही अभौतिक यथार्थ के रूप में, एकसार मानवीय
श्रम, यानी उस श्रम शक्ति के महज एक जमाव के रूप में निहित है, जिसमें इससे

  1. सम्भवतः लेसंस ऑफ़ अक्टूबर 1917 से ही
  2. हाशिये पर नोट किया हुआ
    शहीदेआज़म की जेल नोटबुक / 617

कोई फ़र्क नहीं पड़ता कि उस श्रमशक्ति के खर्च किये जाने की विधा क्या रही
है। अब ये सारी चीजें हमें बताती हैं कि उपर्युक्त उत्पादों के उत्पादन में मानव-श्रम
ख़र्च किया गया है, यानी कि उनमें श्रम ही मूर्तमान हुआ है। जब हम इस सामाजिक
पदार्थ यानी श्रम को उसके अलग-अलग स्पष्ट मूर्तमान रूपों में देखते हैं, तो
सर्वसाधारण के लिए, वे ही 'मूल्य' कहलाते हैं।
मार्क्स – “पूँजी”, अंग्रेज़ी अनुवाद (पृष्ठ 3,4,5)
———o———
✓ क़ानून¹ :
“बहरहाल, समाज क़ानून पर नहीं आधारित होता है। यह तो एक क़ानूनी गल्प
है। इसके विपरीत, क़ानून को अवश्य ही समाज पर आधारित होना चाहिए। इसे
निश्चय ही समाज के हित और आवश्यकताओं की अभिव्यक्ति होना चाहिए, और
इसे औद्योगिक उत्पादन की स्वेच्छाचारिता के बजाय, उत्पादन की सामाजिक और
निरपवाद रूप से भौतिक उत्पादन-प्रणाली से निःसृत होना चाहिए। इस समय मेरे हाथ
में नेपोलियन संहिता है, लेकिन इसने आधुनिक नागरिक समाज को नहीं पैदा किया
है। 18वीं सदी में जन्मा और 19वीं सदी में विकसित हुआ समाज इस संहिता में सिर्फ़
एक क़ानूनी अभिव्यक्ति के रूप में निहित है। जब यह सामाजिक दशाओं के अनुरूप
नहीं रह जायेगा, तब यह महज रद्दी काग़ज़ का पुलिन्दा ही सिद्ध होगा...। जीवन की
बदलती दशाओं के साथ-साथ क़ानून भी निश्चित तौर पर बदलते रहे हैं। परन्तु
सामाजिक विकास की नयी आवश्यकताओं और अपेक्षाओं को दरकिनार कर (युग
की पुकार के लिहाज़ से) पुराने क़ानून को बनाये रखना, दरअसल, सर्वसाधारण के
हित के विपरीत किन्हीं ख़ास हितों की पाखण्डपूर्ण हिमायत के अलावा और कुछ
नहीं है।”
मार्क्स (कोलोन की जूरी अदालत में)²
———o———

  1. मूल में शीर्षक की बायीं तरफ़ 'सही' (✓) का निशान
  2. 1848 में, मार्क्स के ऊपर उनके अख़बार को लेकर कोलोन (जर्मनी) में एक प्रसिद्ध
    मुक़दमा चला। मई 1848 में कार्ल मार्क्स और फ्रेडरिक एंगेल्स ने कुछ साथियों की मदद से
    न्यू राइनिश ज़ाइटुंग (Neue Rheinische Zeitung) नामक एक राजनीतिक दैनिक अख़बार की
    स्थापना की। मार्क्स इसके सम्पादक थे। यह यूरोप में क्रान्तिकारी उथल-पुथल का दौर था।
    नवम्बर 1848 में जब प्रशा के राजा ने नेशनल असेम्बली को भंग कर दिया तो मार्क्स और
    उनके साथियों ने जनता से कर न चुकाने का आह्वान किया और हथियारबन्द विरोध की
    वकालत की। कोलोन की घेरेबन्दी कर ली गयी और उनका अख़बार बन्द कर दिया गया।
    मुक़दमे के दौरान मार्क्स ने अपने तर्कों से जूरी को ही दोषी क़रार दिया। उन्हें बरी कर दिया
    गया लेकिन प्रशा से निर्वासित कर दिया गया।
    618 / भगतसिंह और उनके साथियों के सम्पूर्ण उपलब्ध दस्तावेज़

✓ जनसमुदाय :
“जनता एक ऐसे भारी-भरकम और पंचमेल जानवर की भाँति होती है, जो
अपनी ही ताक़त से अनभिज्ञ रहता है और इसीलिए बोझ ढोते हुए कोड़े-डण्डे
खाता रहता है। यह उस फ़ितने बच्चे द्वारा भी हाँक लिया जाता है, जिसे वह जब
चाहे धक्के मारकर फेंक सकता है। लेकिन यह उस बच्चे से डरता है और इसीलिए
यह उसकी सारी सनकों और मनबहकियों को झेलता रहता है, और कभी महसूस
नहीं करता कि वह बच्चा खुद उससे कितना डरता है...। अद्भुत है! लोग खुद अपने
ही हाथों से अपनेआप को फाँसी दे देते हैं और खुद ही जेल चले जाते हैं तथा खुद
ही अपने ऊपर युद्ध और मौत का कहर बरपा कर लेते हैं। किसलिए? बस एक
दमड़ी के लिए, जो उन्हीं तमाम दमड़ियों में से एक होती है जिन्हें वे खुद ही राजा
को दे चुके होते हैं। जबकि धरती और आकाश के बीच जो कुछ है सब तो उनका
ही है, लेकिन वे इसे नहीं जानते और अगर उन्हें कोई यह बता दे तो वे उस आदमी
को गिराकर मार डालेंगे।
तोमासो कैम्पानेला¹
पृष्ठ 102 (75)
“मार्क्सवाद बनाम समाजवाद”
(1908-12) लेखक व्लादिमीर जी. सिखोविच
पीएच.डी., कोलम्बिया विश्वविद्यालय
वह एक-एक करके मार्क्स के सारे सिद्धान्तों की आलोचना करते हैं और इन
सभी को ख़ारिज करते हैं :

  1. मूल्य का सिद्धान्त
  2. इतिहास की आर्थिक व्याख्या
  3. सम्पदा का थोड़े से हाथों, अर्थात पूँजीपतियों के हाथों में संकेन्द्रण, मध्यम
    वर्ग का पूरी तरह ख़ात्मा और सर्वहारा वर्ग की बाढ़
  4. बढ़ती ग़रीबी का सिद्धान्त, जिसकी परिणति के तौर पर
  5. आधुनिक राज्य और सामाजिक व्यवस्था का अपरिहार्य संकट।
    वह निष्कर्ष निकालते हैं कि मार्क्सवाद सिर्फ़ इन्हीं मूलभूत सिद्धान्तों पर
    आधारित है, और उन्हें एक-एक करके ख़ारिज करते हुए, निष्कर्ष के तौर पर कहते
    हैं कि क्रान्ति के जल्दी फूट पड़ने की सारी धुँधली आशंकाएँ अभी तक निर्मूल
    ही साबित हुई हैं। मध्यम वर्ग घट नहीं, बल्कि बढ़ रहा है। धनी वर्ग संख्या में बढ़
  6. तोमास्सो कैम्पानेला (1568-1639) : इतालवी कवि और दार्शनिक
    शहीदेआज़म की जेल नोटबुक / 619

रहा है, तथा उत्पादन और उपभोग की प्रणाली भी परिस्थितियों के अनुसार बदल
रही है, अतः मज़दूरों की दशा में सुधार करके किसी भी प्रकार के संघर्ष को टाला
जा सकता है। सामाजिक अशान्ति का कारण बढ़ती ग़रीबी नहीं, बल्कि औद्योगिक
केन्द्रों पर ग़रीब वर्गों का संकेन्द्रण है, जिसके नाते वर्ग-चेतना पैदा हो रही है।
इसीलिए यह सब चिल्ल-पों है।¹
पृष्ठ 103 (76)
लेस मिज़रेबल्स की भूमिका
जब तक क़ानून और परम्परा की बदौलत एक ऐसी सामाजिक अधोगति मौजूद
रहेगी जिसमें सभ्यता के भीतर नर्क निर्मित होते रहेंगे और दैवीय नियति के साथ
मानवीय नियति का उलझाव होता रहेगा, जब तक इस युग की तीन समस्याएँ
ग़रीबी के कारण मनुष्य की दुर्गति, भूख के कारण नारी की अधोगति, और अज्ञानता
के कारण बच्चों की अशक्तता – हल नहीं होतीं, जब तक कुछ क्षेत्रों में सामाजिक
घुटन मौजूद रहेगी – दूसरे शब्दों में, तथा एक और भी व्यापक दृष्टिकोण से –
जब तक इस धरती पर अज्ञानता और बदहाली बरक़रार रहेगी, तब तक ऐसी
किताबें व्यर्थ नहीं सिद्ध होंगी।
“विक्टर ह्यूगो”²
न्यायाधीश “न्यायाधीश (अपने फ़ैसले से) जो कष्ट पहुँचाता है, यदि
की परिभाषा : वह स्वयं उसके प्रति निष्ठुर हो, तो वह न्याय करने का
अधिकार खो बैठता है।”
“रवीन्द्रनाथ ठाकुर”³
“लेकिन अप्रतिरोधी शहादत जो कर पाने में असफल रह जाती है, उसे
न्यायप्रिय और प्रतिरोधी शक्ति कर डालती है, तथा अत्याचारी को और अधिक
हानि पहुँचाने में नाकाम कर देती है।”⁴

  1. भगतसिंह द्वारा पुस्तक पर दर्ज टिप्पणी
  2. विक्टर ह्यूगो (1802-1885) : फ़्रांसीसी कवि, नाटककार, उपन्यासकार और रोमांसवाद
    के एक प्रवर्तक; लेस मिजरेबल्स उनका 1862 में लिखा एक क्लासिकीय उपन्यास है।
  3. माँ की प्रार्थना नामक कविता की पंक्तियाँ
  4. अज्ञात
    620 / भगतसिंह और उनके साथियों के सम्पूर्ण उपलब्ध दस्तावेज़

“धर्मान्तरित होने के बजाय मार डाले जाओ” उस समय हिन्दुओं के बीच यही
पुकार प्रचलित थी। लेकिन रामदास¹ उठ खड़े हुए और कहा, “नहीं! ऐसे नहीं!
धर्मान्तरित होने से बेहतर है मार डाले जाना – यह कहना काफ़ी अच्छा है, लेकिन
इससे भी बेहतर है यह कोशिश करना कि न तो मारे जाओ और न ही धर्मान्तरित
होओ, बल्कि खुद हिंसा की शक्तियों को मार डालो। इसमें अगर मरना ही हो तो
मार दिये जाओ, लेकिन विजय की ख़ातिर मारते हुए मरो – न्याय की जीत के
लिए मरो।”
हिन्दू पद पादशाही पृष्ठ 181-82
पृष्ठ 104 (77)
सभी विधि-निर्माता अपराधियों के रूप में परिभाषित :
आदिकाल से लेकर लाइकरगस², सोलोन³, मोहम्मद⁴, नेपोलियन⁵, आदि तक
मनुष्यों के लिए जितने भी विधि-निर्माता और शासक हुए हैं वे सब के सब
अपराधी रहे हैं, क्योंकि नये क़ानूनों का विधान करके, स्वाभाविक तौर पर, उन्होंने
उन पुराने क़ानूनों को भंग किया, जिन्हें समाज श्रद्धापूर्वक मानता आ रहा था और
जो पूर्वजों से विरासत में मिले हुए थे।
(पृष्ठ 205) अपराध और दण्ड – दोस्तोव्स्की⁶
बर्क⁷ का कहना है, “एक सच्चा राजनीतिज्ञ, हमेशा इस बात पर सोचता रहता
है कि कैसे वह अपने देश में मौजूद संसाधनों से ज़्यादा से ज़्यादा अर्जित करे।”

  1. प्रसिद्ध मराठा सन्त और शिवाजी के प्रेरणा-गुरु
  2. लाइकरगस : प्राचीन स्पार्टा (यूनान) का संविधान निर्माता। उसके जीवनीकार प्लुटार्क
    के अनुसार वह “विधि निर्माता” था, और हेरोदोतस के अनुसार, उसने “सारी परम्पराएँ” बदल
    डालीं।
  3. सोलोन (639 ई.पू.-559 ई.पू.): प्राचीन एथेंस (यूनान) का राजनयिक, जिसने सीमित
    जनतन्त्र देने के लिए एथेंस के संविधान का संशोधन किया, और भूमि-सुधार लागू किया।
  4. हज़रत मोहम्मद (570-632 ई.) का उल्लेख अरब देशों में प्रचलित पुराने क़ानूनों और
    प्रथाओं के स्थान पर इस्लामी क़ानूनों के संस्थापक के रूप में किया गया है।
  5. नेपोलियन बोनापार्ट (1769-1821) ने नेपोलियन संहिता तैयार की जिसे यूरोप में लागू
    किया गया।
  6. प्रसिद्ध रूसी उपन्यासकार फ्योदोर मिखाइलोविच दोस्तोयेव्स्की (1821-1881) का
    प्रसिद्धतम उपन्यास अपराध और दण्ड जो 1866 में प्रकाशित हुआ।
  7. एडमण्ड बर्क (1729-1797) : ब्रिटिश राजनीतिज्ञ और लेखक
    शहीदेआज़म की जेल नोटबुक / 621

पृष्ठ 105 (78)
विधिशास्त्र¹ :
क़ानून :
⎧ 1. क़ानून का प्रावधान ⎫ जिस रूप में वह मौजूद है।
⎨ 2. क़ानून का इतिहास ⎬ जिस रूप में उसका विकास हुआ।
⎩ 3. क़ानून-विधान का विज्ञान ⎭ जैसा उसे होना चाहिए।
⎧ 1. सैद्धान्तिक ⎫ (i) दर्शन विधि के विज्ञान के लिए
⎩ 2. सामान्य ⎭ विधिशास्त्र आधार प्रदान करना।

  1. विश्लेषणात्मक ⎫
  2. ऐतिहासिक ⎬ विधिशास्त्र
  3. नीतिशास्त्रीय ⎭
  4. विश्लेषणात्मक विधिशास्त्र क़ानून के प्रथम सिद्धान्त की व्याख्या
    करता है। इसकी विषय-वस्तु है :
    (अ) नागरिक क़ानून की अवधारणा
    (ब) नागरिक और अन्य क़ानूनों के बीच सम्बन्ध
    (स) विविध संघटक विचार जो क़ानून की धारणा, जैसे राज्य, सम्प्रभुता
    और न्याय-प्रशासन का संघटन करते हैं।
    (द) क़ानून के क़ानूनी स्रोत और विधि निर्माण का सिद्धान्त आदि।
    (य) क़ानून के वैज्ञानिक वर्गीकरण।
    (र) क़ानूनी अधिकार
    (ल) क़ानूनी (नागरिक और फ़ौजदारी) दायित्व का सिद्धान्त
    (व) अन्य क़ानूनी अवधारणाएँ।
    पृष्ठ 106 (79)
  5. ऐतिहासिक विधिशास्त्र क़ानून, क़ानूनी अवधारणाओं की उत्पत्ति और
    विकास को निर्धारित करने वाले सामान्य सिद्धान्तों का अध्ययन करता है। यह
    इतिहास है।

  1. ऐसा प्रतीत होता है कि भगतसिंह ने विधिशास्त्र सम्बन्धी व्यापक अध्ययन की रूपरेखा
    बनायी थी, जो नोटबुक के अगले कई पृष्ठों तक जारी है।
    622 / भगतसिंह और उनके साथियों के सम्पूर्ण उपलब्ध दस्तावेज़
  1. नीतिशास्त्रीय विधिशास्त्र : यह क़ानून के सम्बन्ध में न्याय के सिद्धान्त
    से सम्बन्धित है।
    क़ानून और न्याय :
    क़ानून के नीतिशास्त्रीय निहितार्थों की पूर्ण अवहेलना विश्लेषणात्मक
    विधिशास्त्र को एक बेजान प्रणाली में तब्दील कर सकती है।
    इंग्लैण्ड में :
    दो भिन्न-भिन्न शब्द “क़ानून” और “न्याय” लगातार इस बात को याद
    दिलाते रहते हैं कि ये दोनों एक ही चीज़ नहीं बल्कि दो भिन्न चीजें हैं। लेकिन
    इनके इस्तेमाल में इन दोनों के बीच मौजूद वास्तविक और घनिष्ठ सम्बन्ध अक्सर
    आँख-ओझल हो जाया करता है।
    और महाद्वीप में :
    [रेचेट : राइट (अधिकार) = ड्रौइट : लॉ (क़ानून)]
    महाद्वीपीय भाषा-शैली “क़ानून” और “अधिकार” के बीच के फ़र्क़ को
    छिपाती है, जबकि अंग्रेज़ी भाषा-शैली उनके बीच के सम्बन्ध को छिपाती है।
    पृष्ठ 107 (80)
    क़ानून :
    “हम उस किसी भी क़िस्म के नियम या सिद्धान्त को क़ानून नाम दे देते हैं,
    जिसके द्वारा कार्रवाइयाँ निर्धारित की जाती हैं।”
    (हूकर)¹
    “क़ानून अपने सर्वाधिक सामान्य अर्थ में कार्रवाई सम्बन्धी नियम को
    विशिष्टीकृत करता है, और यह सभी प्रकार की कार्रवाई पर बिना भेदभाव के, लागू
    होता है, चाहे वे तर्कपरक हों या तर्कहीन, जीवधारी से सम्बन्धित हों, या निर्जीव
    से। इसीलिए हम गति के, गुरुत्वाकर्षण के, प्रकाश के, भौतिकी के, प्रकृति के और
    राष्ट्रों के नियमों की बात करते हैं”।
    (ब्लैकस्टोन)²
  2. सम्भवतः अंग्रेज़ धर्मशास्त्रीय रिचर्ड हूकर (1554-1600) जिसने द लॉ ऑफ़
    एक्लेसिएस्टिकल पॉलिसी में एंगलीकनिज़्म के सिद्धान्तों को संहिताबद्ध किया।
  3. सम्भवतः सर विलियम ब्लैकस्टोन (1723-1780) : अंग्रेज़ विधिवेत्ता, जिसने कमेण्ट्रीज़
    ऑन द लॉज़ ऑफ़ इंग्लैण्ड (1765-1769) लिखी, जो अंग्रेज़ी क़ानून के सिद्धान्त पर एक
    आधिकारिक पुस्तक मानी जाती है।
    शहीदेआज़म की जेल नोटबुक / 623

क़ानूनों के प्रकार

  1. अनिवार्य क़ानून
  2. भौतिक नियम या वैज्ञानिक क़ानून
  3. प्राकृतिक या नैतिक क़ानून
  4. प्रचलित क़ानून
  5. परम्परागत क़ानून
  6. व्यावहारिक या तकनीकी क़ानून
  7. अन्तरराष्ट्रीय क़ानून
  8. नागरिक क़ानून या राज्य का क़ानून
    पृष्ठ 108 (81)
    अनिवार्य क़ानून की \ 1. अनिवार्य क़ानून का अर्थ है कार्रवाई का नियम,
    अनुज्ञप्ति – 1. सजा, ) जो किसी ऐसी सत्ता द्वारा लोगों पर लागू किया जाता है
    युद्ध आदि / जो इसका अनुपालन बलपूर्वक करवा लेती है।
    ‘क़ानून एक आदेश है जो व्यक्ति या व्यक्तियों को एक निश्चित आचरण करने
    के लिए विवश करता है’
    (ऑस्टिन)¹
    समाज की प्रत्यक्ष नैतिकता भी अनिवार्य क़ानूनों के दायरे में आती है।
    हॉब्स का दृष्टिकोण :
    मनुष्य और हथियार ही क़ानूनों की शक्ति और सम्बल हैं।
    (हॉब्स)²
  9. भौतिक क़ानून चल रही कार्रवाइयों की अभिव्यक्ति है। (नैतिक क़ानून
    या विवेक का क़ानून कार्रवाइयों की इस रूप में अभिव्यक्ति है, जैसी वे होनीं
    चाहिए)।
  10. प्राकृतिक या नैतिक क़ानून का अर्थ है प्राकृतिक रूप से सही या ग़लत
    के सिद्धान्त – यानी सभी सही कार्रवाइयों समेत प्राकृतिक न्याय के सिद्धान्त।
    न्याय के दो प्रकार हैं – प्रत्यक्ष और प्राकृतिक।
    प्राकृतिक न्याय वह न्याय है जो वास्तव में और सचमुच हो।

  1. जॉन ऑस्टिन (1811-1680) : ब्रिटिश दार्शनिक राजनीतिक चिन्तक
  2. टॉमस हॉब्स (1588-1689) : अंग्रेज़ दार्शनिक-राजनीतिक चिन्तक। राज्य की उत्पत्ति
    के सामाजिक समझौते के सिद्धान्त का जनक। राजतन्त्रात्मक निरंकुशतावाद का समर्थक था।
    624 / भगतसिंह और उनके साथियों के सम्पूर्ण उपलब्ध दस्तावेज़

प्रत्यक्ष न्याय न्याय का वह रूप है जिस रूप में उसे समझा जाता है, स्वीकार
किया जाता है, और अभिव्यक्त किया जाता है।
<u>पृष्ठ 109 (82)</u>
4. प्रचलित क़ानून : ऐसा कोई भी नियम या नियमों की प्रणाली है जिस
पर लोग अपने आचरण के नियमन के लिए सहमत होते हैं। सहमत होने वाले पक्षों
की सहमति ही क़ानून है।
5. परम्परागत क़ानून : मनुष्यों द्वारा वास्तव में की जाने वाली कार्रवाई का
कोई भी नियम – जो स्वैच्छिक कार्रवाई की किसी वास्तविक समरूपता की
अभिव्यक्ति है। परम्परा उन लोगों का क़ानून है जो इसे मानते हैं।
6. व्यावहारिक या तकनीकी क़ानून : इसमें ऐसे नियम आते हैं जो
व्यावहारिक उद्देश्य की प्राप्ति के लिए होते हैं। खेलों में, ‘प्रचलित क़ानून’ और
‘व्यावहारिक क़ानून’ दोनों ही आते हैं, जिनमें पहले प्रकार के क़ानूनों के अन्तर्गत
वे नियम आते हैं जिन पर खिलाड़ियों की सहमति होती है, और दूसरे प्रकार के
क़ानूनों के अन्तर्गत वे नियम आते हैं, जो खेल को सफल बनाते हैं, या खेल को
सफलतापूर्वक चलाने के लिए होते हैं।
7. अन्तरराष्ट्रीय क़ानून : इसमें वे नियम आते हैं जो सम्प्रभुतासम्पन्न राज्यों
के आपसी सम्बन्धों एवं एक-दूसरे के प्रति आचरण का नियमन करते हैं।
(i) एक्सप्रेस क़ानून (सन्धियाँ आदि)
(ii) अन्तर्निहित क़ानून (परम्परागत)
पुनः दो प्रकारों में विभाजित :
(i) सामान्य क़ानून (सभी राष्ट्रों के बीच)
(ii) विशिष्ट क़ानून (दो या अधिक राष्ट्र विशेष के बीच)
8. नागरिक क़ानून : राज्य या देश का क़ानून, जो न्यायिक अदालत में
प्रयुक्त होता है।
<u>पृष्ठ 110 (83)</u>
सज़ा :
राजनीतिक जुर्म : हम विधि-निर्माताओं के भारी समुदाय की इस सोच से
सहमत हैं कि, भले ही, आमतौर पर उस व्यक्ति पर कड़ी कार्रवाई नहीं की जानी
चाहिए, जो ऐसी मुजरिमाना साज़िश में शामिल रहा हो, जिस साज़िश को अंजाम
नहीं दिया गया हो, फिर भी राज्य के ख़िलाफ़ किये गये बड़े जुर्मों के सिलसिले
में इस नियम का एक अपवाद ज़रूर रखा जाना चाहिए, कारण कि राज्य के
शहीदेआज़म की जेल नोटबुक / 625

ख़िलाफ़ किये जाने वाले जुर्मों की ख़ासियत यह होती है कि यदि उनमें मुजरिम
क़ामयाब हो जाता है, तो वह सज़ा से तक़रीबन साफ़ बच जाता है। क़ातिल क़त्ल
करने के बाद, क़त्ल करने की अपेक्षा कहीं अधिक ख़तरे में होता है, लेकिन
राजद्रोही जब सरकार का तख़्ता पलट देता है, तो वह ख़तरे से बाहर हो जाता है।
चूँकि दण्डात्मक क़ानून एक क़ामयाब विद्रोही के विरुद्ध नपुंसक ही सिद्ध होता
है, इसलिए ज़रूरी है कि इसे विद्रोह की पहली शुरुआत के ख़िलाफ़ ही सशक्त
और कड़ा बनाया जाये...।"
(II एल.सी.सी. जजमेण्ट 1906, पृष्ठ 120)¹

पृष्ठ 111 (84)

सज़ा :
स्वप्न जो प्राणदण्ड का कारण बना : जब मार्सेंज ने सपना देखा कि उसने
डायोनीसियस² का गला काट दिया है, तब निरंकुश शासक ने उसे प्राणदण्ड दे
दिया, जिसके पीछे उसकी दलील यह थी कि यदि उसने दिन में ऐसा सोचा न
होता तो रात में यह सपना कदापि नहीं देखता।
प्राणदण्ड और ड्रैको का क़ानून : ड्रैको³ के क़ानून में लगभग सभी प्रकार
के जुर्मों, जैसे मामूली चोरी से लेकर धर्म-द्रोह और हत्या तक के लिए एक समान
मौत की सज़ा का विधान था, और कहा जाता है कि इसका एकमात्र स्पष्टीकरण
जो ड्रैको ने दिया था, वह यह कि छोटे-मोटे जुर्मों की तो यही सज़ा होनी चाहिए
और बड़े जुर्मों के लिए इसे बड़ी सज़ा वह सोच नहीं सका।
सज़ा को बहुतेरे दार्शनिकों ने एक आवश्यक बुराई माना है।
राज्य और मनुष्य : राज्य अपनेआप में कोई लक्ष्य नहीं है, और मनुष्य क़ानून
या राज्य के लिए नहीं, बल्कि ये ही मनुष्य के लिए होते हैं।

  1. स्रोत और विवरण अनुपलब्ध
  2. डायोनीसियस द एल्डर (430-367 ई. पू.) : सिसली का यूनानी राजनेता, जो 400
    ई.पू. में साइरेक्यूस का निरंकुश शासक बना।
  3. ड्रैको (ई.पू सातवीं सदी) : एथेंस (यूनान) का राजनीतिज्ञ जिसने परम्परागत अलिखित
    संविधान को संहिताबद्ध किया, छोटे से लेकर, बड़े तक सभी प्रकार के जुर्मों के लिए प्राणदण्ड
    देने के लिए कुख्यात उसका क़ानून (ड्रैकनियन लॉ) आज भी ऐसे काले क़ानूनों के लिए
    मुहावरे के तौर पर इस्तेमाल होता है।
    626 / भगतसिंह और उनके साथियों के सम्पूर्ण उपलब्ध दस्तावेज़

पृष्ठ 112 (85)
न्याय : राज्य की भौतिक ताक़त के जरिये एक राजनीतिक समुदाय के भीतर
अधिकार बनाये रखना।
इसने उस व्यक्तिगत प्रतिशोध का स्थान ले लिया है, जब लोग ग़लतियों का
प्रतिशोध स्वयं या अपने बन्धु-बान्धवों के सहयोग से ले लिया करते थे। उन दिनों,
'जिसकी लाठी उसकी भैंस' का सिद्धान्त काम करता था।
दीवानी और फ़ौजदारी न्याय :
नागरिक न्याय अधिकार लागू करता है। फ़ौजदारी न्याय ग़लतियों के लिए सज़ा
देता है।
एक आदमी अपने बकाये का, या उससे ग़लत ढंग से दबा ली गयी सम्पत्ति
को फिर से वापस पाने का दावा करता है। यह दीवानी (न्याय का मामला) है।
फ़ौजदारी के मामले में, प्रतिवादी पर ग़लत करने का आरोप लगा होता है।
अदालत इस मुल्ज़िम को कर्तव्य की अवहेलना के जुर्म में तथा अधिकार के
उल्लंघन के जुर्म में, सज़ा देती है, जिसमें यदि हत्या का जुर्म है तो फाँसी और
यदि चोरी का जुर्म है तो जेल की सज़ा देती है। [पृष्ठ 113 (86) पर जारी]
दीवानी और फ़ौजदारी, दोनों ही प्रकार की कार्रवाई में, ग़लती की शिकायत
दर्ज की जाती है।
दीवानी (कार्रवाई) में अधिकार का दावा किया जाता है,
फ़ौजदारी (कार्रवाई) में ग़लती का आरोप लगाया जाता है।
दीवानी न्याय का सरोकार, प्राथमिक तौर पर, वादी और उसके अधिकारों से
होता है,
फ़ौजदारी (न्याय) का प्रतिवादी और उस पर लगे आरोप से।
फ़ौजदारी न्याय के उद्देश्य
सज़ा :
यह तटस्थ 'अपराधकर्ताओं' जैसे राजनीतिक व्यक्तियों के मामलों में उपयोगी
नहीं हो सकती। यह उनके लिए एक बुरा सौदा सिद्ध हो सकती है।

  1. निवारक : क़ानून का प्रमुख उद्देश्य दोषी व्यक्ति को एक नज़ीर बनाना
    और उस जैसे बाक़ी सभी व्यक्तियों को एक चेतावनी देना है। यह प्रत्येक अपराध
    को "अपराधकर्ता की एक दुर्भावना" सिद्ध करता है। (इरादे का बदलाव)
    शहीदेआज़म की जेल नोटबुक / 627
  1. निरोधक : दूसरे मामले में, यह निरोधक या अयोग्य सिद्ध करने वाला है।
    इसका विशेष उद्देश्य अपराधकर्ता को नाकाम कर उसे पुनः ग़लत काम करने से
    रोकना है।
    प्राणदण्ड हम हत्यारों को फाँसी महज इसीलिए नहीं देते कि यह दूसरों को
    का (हत्या करने से) विरत करती है, बल्कि उसी कारण से, जिस
    औचित्य : कारण से हम, उदाहरण के लिए, साँप को मार डालते हैं, क्योंकि
    हमारे लिए यही बेहतर है कि वे इस दुनिया में रहने के बजाय इससे
    बाहर हो जायें।
  2. सुधारात्मक : अपराध चरित्र के ऊपर इरादों के प्रभाव से किये जाते हैं,
    और वे या तो इरादों के बदलाव से या चरित्र के बदलाव से रोके जा सकते हैं।
    निवारक सज़ा पहले मामले में दी जाती है, (कुछ शब्द अस्पष्ट – स.)
    जबकि सुधारात्मक (सज़ा) दूसरे मामले में दी जाती है।
    पृष्ठ 114 (87)
    “सुधारात्मक सिद्धान्त” के पैरोकार सज़ा के सिर्फ़ उन्हीं रूपों की हिमायत
    करते हैं, जो अपराधी की शिक्षा और उसे अनुशासित करने के लिए उपयोगी होते
    हैं, और बाक़ी उन सभी (सज़ाओं) को अमान्य ठहराते हैं जो लाभकारी तौर पर
    सिर्फ़ निवारक या अयोग्यकारी (होती हैं)। उनकी दृष्टि में मृत्यु कोई उपयुक्त सज़ा
    नहीं हैं, 'हमें अपने अपराधियों का इलाज करना चाहिए, उनकी हत्या नहीं।'
    पिटाई और अन्य शारीरिक सज़ाएँ बर्बरता की निशानी कहकर निन्दित की जाती
    हैं। वे ऐसी सज़ाओं को सज़ा भोगने वाले और सज़ा देने वाले दोनों को ही नीचे
    गिराने वाली और क्रूर मानते हैं।
    कड़ी सज़ा का नतीजा। राज्य की बलप्रयोग की कार्रवाई जितनी सक्षम होती
    अपराधियों का ख़तरनाक है, वह सभी सामान्य मनुष्यों को ख़तरनाक रास्तों (पर
    और दुस्साहसिक वर्ग जाने) से रोकने में उतनी ही सफल होती है, लेकिन
    पैदा हो जाता है। क़ानून तोड़ने वालों में अधःपतन का अनुपात भी
    उतना ही अधिक होता है।
  3. प्रतिकारात्मक सज़ा :
    सर्वाधिक भयावह सिद्धान्त! ऐसी सोच रखने वाले लोग वास्तव में प्राचीन और
    सभ्यतापूर्व कालों की बर्बर मनःस्थितियों के हिमायती होते हैं।¹
    यह प्रतिशोध या बदले की उस नैसर्गिक प्रवृत्ति को तुष्ट करती है, जो सिर्फ़

  1. हाशिये पर लिखा हुआ
    628 / भगतसिंह और उनके साथियों के सम्पूर्ण उपलब्ध दस्तावेज़