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भगत सिंह और उनके साथियों के संपूर्ण उपलब्ध दस्तावेज (प्रो. चमनलाल - प्रामाणिक ऐतिहासिक संकलन)

भगत सिंह और उनके साथियों के संपूर्ण उपलब्ध दस्तावेज (प्रो. चमनलाल - प्रामाणिक ऐतिहासिक संकलन)

Complete Available Documents of Bhagat Singh & Associates

शहीद-ए-आजम भगत सिंह (सम्पादक: प्रो. चमनलाल) द्वारा

DevanagariHindipublished788 पृष्ठ

पृष्ठ 616, कुल 788 में से

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पृष्ठ 616

समझदारी होती कि वह सही-सही जान ले कि वक़्त का तक़ाज़ा क्या है; जिसमें
इतना पराक्रम होता कि वक़्त के लिहाज़ से सही रास्ते पर नेतृत्व कर सकता, तब
तो इनकी बदौलत कोई भी समय मुक्ति का समय हो सकता था।
स्वेच्छाचारिता :
काउत्स्की ने “प्रोलितारियत डिक्टेटरशिप” शीर्षक से एक पुस्तिका लिखी,
जिसमें उसने बोल्शेविकों द्वारा बुर्जुआ वर्ग के लोगों को वोट देने के अधिकार से
वंचित किये जाने की निन्दा की। इस पर लेनिन ने अपनी “प्रोलितारियन
रिवोल्यूशन” : (पृष्ठ 77) में लिखा :
“स्वेच्छाचारिता! ज़रा सोचें तो कि इस खेद प्रकाश में कमीनेपन के किस
निकृष्ट स्तर पर उतरकर बुर्जुआ वर्ग की चापलूसी की गयी है, और कितना अधिक
मूर्खतापूर्ण पाण्डित्य बघारा गया है। जबकि सदियों से, मज़दूरों का दमन करने के
लिए, ग़रीब लोगों के हाथ-पाँव बाँधे रखने के लिए, और जनता के सीधे-सादे और
मेहनतकश समुदायों के रास्ते में एक सौ एक अड़ंगे और अड़चनें खड़े करते रहने
के लिए, पूरी तरह से बुर्जुआ, और उसमें भी पूँजीवादी देशों के प्रतिक्रियावादी
विधिवेत्ता ही नियम-विधान बनाते आये हैं, और वे ही विविध संहिताओं और
क़ानूनों पर सैकड़ों ग्रन्थ और उनकी व्याख्याएँ लिखते आये हैं – जहाँ इतना
सब किया गया है, वहाँ बुर्जुआ उदारपन्थियों और श्री काउत्स्की को कोई
“स्वेच्छाचारिता” नहीं दिखायी देती! तब तो यह सब क़ानून-व्यवस्था है! यह सब
इसलिए सोचा और लिखा गया है कि कैसे ग़रीबों को दबाये रखकर निचोड़ते रहा
जाये। हज़ारों-हज़ार बुर्जुआ वकील और सरकारी अहलकार क़ानूनों की ऐसी
व्याख्या करते रहते हैं कि मज़दूर और औसत किसान उनकी कँटीले तारों की
घेरेबन्दी को कभी तोड़ न सकें। बेशक, यह कोई स्वेच्छाचारिता नहीं है। बेशक,
यह उन गन्दे या मुनाफ़ाखोर शोषकों का अधिनायकत्व नहीं है जो जनता का ख़ून
पी रहे हैं। ओह, यह ऐसा कुछ भी नहीं है! यह तो ‘शुद्ध जनतन्त्र’ है, जो
दिन-प्रतिदिन शुद्धतर होता जा रहा है। [पृष्ठ 64 (61) पर जारी] लेकिन जब,
साम्राज्यवादी युद्ध द्वारा सरहद पार के अपने भाइयों से अलग कर दिये गये
मेहनतकश और शोषित जनसमुदायों ने इतिहास में पहली बार अपनी सोवियतें गठित
कर ली हैं, जब उन्होंने राजनीतिक निर्माण के लिए मज़दूरों का और उन वर्गों का
आह्वान किया है जिन्हें बुर्जुआ वर्ग उत्पीड़ित और जड़ बनाये रखता था, और जब
से वे एक नया सर्वहारा राज्य निर्मित करने के काम में लग गये हैं, तथा विकट
रूप से जारी युद्ध के दौरान, गृहयुद्ध की ज्वाला में, जब वे ‘शोषकों से रहित राज्य’
के बुनियादी सिद्धान्त निरूपित करने लगे, तब बुर्जुआ वर्ग के सभी पाजी तत्त्व, और
610 / भगतसिंह और उनके साथियों के सम्पूर्ण उपलब्ध दस्तावेज़