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भगत सिंह और उनके साथियों के संपूर्ण उपलब्ध दस्तावेज (प्रो. चमनलाल - प्रामाणिक ऐतिहासिक संकलन)

भगत सिंह और उनके साथियों के संपूर्ण उपलब्ध दस्तावेज (प्रो. चमनलाल - प्रामाणिक ऐतिहासिक संकलन)

Complete Available Documents of Bhagat Singh & Associates

शहीद-ए-आजम भगत सिंह (सम्पादक: प्रो. चमनलाल) द्वारा

DevanagariHindipublished788 पृष्ठ

पृष्ठ 624, कुल 788 में से

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पृष्ठ 624

कोई फ़र्क नहीं पड़ता कि उस श्रमशक्ति के खर्च किये जाने की विधा क्या रही
है। अब ये सारी चीजें हमें बताती हैं कि उपर्युक्त उत्पादों के उत्पादन में मानव-श्रम
ख़र्च किया गया है, यानी कि उनमें श्रम ही मूर्तमान हुआ है। जब हम इस सामाजिक
पदार्थ यानी श्रम को उसके अलग-अलग स्पष्ट मूर्तमान रूपों में देखते हैं, तो
सर्वसाधारण के लिए, वे ही 'मूल्य' कहलाते हैं।
मार्क्स – “पूँजी”, अंग्रेज़ी अनुवाद (पृष्ठ 3,4,5)
———o———
✓ क़ानून¹ :
“बहरहाल, समाज क़ानून पर नहीं आधारित होता है। यह तो एक क़ानूनी गल्प
है। इसके विपरीत, क़ानून को अवश्य ही समाज पर आधारित होना चाहिए। इसे
निश्चय ही समाज के हित और आवश्यकताओं की अभिव्यक्ति होना चाहिए, और
इसे औद्योगिक उत्पादन की स्वेच्छाचारिता के बजाय, उत्पादन की सामाजिक और
निरपवाद रूप से भौतिक उत्पादन-प्रणाली से निःसृत होना चाहिए। इस समय मेरे हाथ
में नेपोलियन संहिता है, लेकिन इसने आधुनिक नागरिक समाज को नहीं पैदा किया
है। 18वीं सदी में जन्मा और 19वीं सदी में विकसित हुआ समाज इस संहिता में सिर्फ़
एक क़ानूनी अभिव्यक्ति के रूप में निहित है। जब यह सामाजिक दशाओं के अनुरूप
नहीं रह जायेगा, तब यह महज रद्दी काग़ज़ का पुलिन्दा ही सिद्ध होगा...। जीवन की
बदलती दशाओं के साथ-साथ क़ानून भी निश्चित तौर पर बदलते रहे हैं। परन्तु
सामाजिक विकास की नयी आवश्यकताओं और अपेक्षाओं को दरकिनार कर (युग
की पुकार के लिहाज़ से) पुराने क़ानून को बनाये रखना, दरअसल, सर्वसाधारण के
हित के विपरीत किन्हीं ख़ास हितों की पाखण्डपूर्ण हिमायत के अलावा और कुछ
नहीं है।”
मार्क्स (कोलोन की जूरी अदालत में)²
———o———

  1. मूल में शीर्षक की बायीं तरफ़ 'सही' (✓) का निशान
  2. 1848 में, मार्क्स के ऊपर उनके अख़बार को लेकर कोलोन (जर्मनी) में एक प्रसिद्ध
    मुक़दमा चला। मई 1848 में कार्ल मार्क्स और फ्रेडरिक एंगेल्स ने कुछ साथियों की मदद से
    न्यू राइनिश ज़ाइटुंग (Neue Rheinische Zeitung) नामक एक राजनीतिक दैनिक अख़बार की
    स्थापना की। मार्क्स इसके सम्पादक थे। यह यूरोप में क्रान्तिकारी उथल-पुथल का दौर था।
    नवम्बर 1848 में जब प्रशा के राजा ने नेशनल असेम्बली को भंग कर दिया तो मार्क्स और
    उनके साथियों ने जनता से कर न चुकाने का आह्वान किया और हथियारबन्द विरोध की
    वकालत की। कोलोन की घेरेबन्दी कर ली गयी और उनका अख़बार बन्द कर दिया गया।
    मुक़दमे के दौरान मार्क्स ने अपने तर्कों से जूरी को ही दोषी क़रार दिया। उन्हें बरी कर दिया
    गया लेकिन प्रशा से निर्वासित कर दिया गया।
    618 / भगतसिंह और उनके साथियों के सम्पूर्ण उपलब्ध दस्तावेज़