भगत सिंह और उनके साथियों के संपूर्ण उपलब्ध दस्तावेज (प्रो. चमनलाल - प्रामाणिक ऐतिहासिक संकलन)
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शहीद-ए-आजम भगत सिंह (सम्पादक: प्रो. चमनलाल) द्वारा
प्रिय लाला लाजपत राय जी,
असेम्बली चुनाव के दिनों जब जनसभाएँ की जाती थीं, तब आपने एक बार
दस हज़ार हिन्दुओं की सभा के समक्ष अपने बारे में सिपाही होने की घोषणा की
थी।
इसके उत्तर में कि आप एक मर चुके नेता हैं, आपने कहा था कि बेशक
हिन्दुओं के हाथों से एक नेता निकल रहा है, लेकिन नेता की जगह उन्हें एक
सिपाही मिल गया है। आपकी घोषणा सुनकर हमें भी बहुत प्रसन्नता हुई, क्योंकि
हम भी ऐसे नेताओं से जोकि राजनीतिक समस्याओं के सम्बन्ध में तो बहुत
लम्बी-चौड़ी बातें किया करते थे, तंग आये हुए थे। पिछले भले दिनों में आप
तर्कशील भाषणों में यह कहते नहीं थकते थे कि “मैं या तख़्त लूँगा या तख़्ता।”
लाहौर के 16 युवकों ने जो घोषणा ‘पंजाब के नौजवानों से अपील’ शीर्षक के
अन्तर्गत की थी, उसके उत्तर में आपने उन पर आरोप लगाया था कि उन्होंने
आप पर एक धब्बा लगाकर आपको इस राजनीतिक क्षेत्र से निकालने की
कोशिश की है।
यह आरोप देखने से ही कड़वा लगता था। हम आपको फिर मैदान-ए-जंग में
लाना चाहते हैं और आप में यह शतरंजी चालें खेलने की जो चाह पैदा हो गयी है
उसे ख़त्म करना चाहते हैं। आपने कहा था कि ये तो बोल्शेविक हैं इसलिए अपना
नेता लेनिन को मानते हैं। बोल्शेविक होना कोई गुनाह नहीं है और आज हिन्दुस्तान को
लेनिन की सबसे ज़्यादा ज़रूरत है। क्या आपने उन नौजवानों को सी.आई.डी. की
‘मेहरबान’ नज़रों में लाने का कमीना प्रयत्न नहीं किया? आपकी इस बुरी इच्छा को
फल लग गया है, इसलिए आप स्वयं को इस सफलता की बधाई दे सकते हैं। आपने
लंगे मण्डी में इन नौजवानों पर मात्र इसलिए कीचड़ उछाला क्योंकि उन्होंने जनता को
वास्तविक स्थितियों से परिचित कराने का साहस दिखाया। आपकी चुनाव सम्बन्धी
लड़ाई का यह आरम्भिक दिन था। मदनमोहन मालवीय जी को इसका शुभारम्भ करने
के लिए आमन्त्रित किया गया था। आपको संक्षिप्त-सा अध्यक्षीय भाषण करना था,
लेकिन आप अपना संयम खो बैठे। पण्डित मालवीय को लम्बा भाषण करने का समय
ही न मिला, जिसकी कि वह तैयारी करके आये थे। आपने दो घण्टे, बल्कि इससे
भी अधिक ‘पंजाब के नौजवानों से अपील’ कर कड़कती आवाज़ में (उनका) विरोध
किया। आपने इन नौजवानों को दिल खोलकर कोसा और आरोप लगाये। आपने सारे
भाषण में ही तर्कशीलता को बिल्कुल दरकिनार कर दिया। हम आप पर निम्नलिखित
आरोप लगाते हैं –
- राजनीतिक ढुलमुलपन।
- राष्ट्रीय शिक्षा के साथ विश्वासघात।
- स्वराज्य पार्टी के साथ विश्वासघात।
नौजवान भारत सभा और राष्ट्रीय नेतृत्व का मूल्यांकन / 307
- हिन्दू-मुस्लिम-तनाव को बढ़ाना।
- उदारवादी बन जाना।
इन आरोपों में से एक का भी आपने कोई तर्क-सम्मत खण्डन नहीं किया।
जब चुनावों का जोश शान्त हो गया तब हमने बहुत चिन्तापूर्वक सुना कि आपके
शरीर को फिर कोई रोग लग गया है। अफ़सोस, अस्वस्थता हमारे नेताओं का एक
हिस्सा बन गयी है। वे अस्वस्थता की तभी शिकायत करने लग जाते हैं जब उन्हें
मालूम होता है कि कोई न कोई हमसे गाँव की प्रगति और जन-एकता के वायदे
को पूरा करने के सम्बन्ध में कुछ न कुछ कहेगा। ये वायदे ऐसे हैं जो हज़ारों बार
किये तो गये, पर पूरे कभी नहीं उतरे।
चिकित्सा विज्ञान क्या यही कहता है कि बुरे स्वास्थ्य का रोगी केवल यूरोप
के ही स्वास्थ्य-लाभ-केन्द्र पर ठीक होगा? रोग की रोकथाम के लिए जो राय
डॉक्टर दें उसे मानने से कौन इन्कार कर सकता है? हिन्दुस्तान एक बदक़िस्मत
देश है जो जंगल और दलदल से भरा है। यहाँ कोई पहाड़ी स्थान नहीं है और न
ही कोई स्वास्थ्य-लाभ-केन्द्र है। इन नेताओं का कश्मीर केवल इटली के उत्तर में
है। 'मरी', मसूरी और नैनीताल भी यूरोप में ही मिलते हैं। आप जानते हैं कि अपने
देश की सेवा के लिए जीना बहुत ज़रूरी है। इसलिए जीवन बहुमूल्य है। यह भी
कहा जाता है कि सिपाही के लिए कोई आराम नहीं। वह मरने के लिए जीता है,
ताकि वह दुख झेलते, देश की सेवा में रहते हुए ही मरे। और दुखी देश के लिए
मरने के वास्ते कमर कसकर युद्ध में मरे, उसकी, बड़ी इच्छा होती है।
लेकिन यूरोप जाने से पहले आप जब हिन्दुस्तान की ही हवाख़ोरी कर रहे थे
और हिन्दुस्तान की ही ज़मीन पर चल रहे थे, तब आपके और आपके साथियों
द्वारा बोये काँटे उग पड़े। आपने 'हिन्दुओ, मारो!' का प्रचार किया था और हिन्दू
ही मारे गये!
आप जैसे ही अन्य सज्जनों ने 'मुसलमानो, मारो!' का प्रचार किया था। जब
मुसलमानों के मारे जाने का समय आया तो उनके नेताओं ने यह कमज़ोरी दर्शायी
और वह सिपाही वाला काम न कर सके। इस तरह उन्हें भी काफ़ी मार पड़ी।
लेकिन हमारा सिपाही उस समय बुज़दिली दर्शाने में बहादुर निकला। जब हिन्दू मारे
जाने लगे तो आपने प्रथम श्रेणी के गद्दों पर बैठकर यूरोप चले जाना ही श्रेयस्कर
समझा। आपने लाहौर के हिन्दुओं की इस संकट में मदद करने से असमर्थता प्रकट
की। चुनाव के दिनों में आप आमतौर पर हिन्दुओं की मुसलमानों के हाथों रक्षा करने
की डींगें हाँका करते थे।
लेकिन अफ़सोस है कि यह सबकुछ आपका चुनावी सफलता तक ही सीमित
था। इसके साक्ष्य में हम केवल यह कहना ही पर्याप्त समझते हैं कि आपने यूरोप
से वापस लौटकर भी लाहौर के ग़रीब और दुखी हिन्दुओं की सहायता के लिए
308 / भगतसिंह और उनके साथियों के सम्पूर्ण उपलब्ध दस्तावेज़
लाहौर पहुँचने तक का भी कष्ट नहीं उठाया। हमें मालूम नहीं कि आपने सीमा से
पागल पठानों के निकाले हुए हिन्दुओं की रक्षा के लिए कौन-से तरीक़े इस्तेमाल
किये? इसके विपरीत आप सीधे ही शिमला असेम्बली में भाग लेने और अपने
साथियों पर भाषण का असर दर्शाने के लिए चले गये। संकट के समय
अलग-थलग रहना आपकी बहादुरी का बड़ा हिस्सा है।
अनेक युवतियों के सिर से पति का साया उठ गया और उनकी सारी उम्र दुखों
भरी और एकान्तमय रह गयी। कई कुँआरी कन्याएँ अपना सतीत्व भंग होने के
कारण अपने भीतर ही भीतर आँसुओं से रो रही हैं। कई मासूमों का क़त्ल किया
गया। तीस लाख ज़िन्दगियाँ भयावह नरक में से गुज़र रही हैं। गवर्नर, पंजाब तो
अपनी पहाड़ी आरामगाह छोड़कर इन लोगों के बोये हुए काँटे काटने के लिए लाहौर
आ जाता है, लेकिन हमारा सिपाही लाला लाजपत राय इतना बीमार है कि वह
अपनी ड्यूटी पर नहीं पहुँच सकता और कह देता है कि लाहौर में गर्मी बहुत है
तथा रेलवे की सीटें पहले ही बुक हो चुकी हैं। रोने दो इन विधवा हो चुकी स्त्रियों
को, यतीम हो चुके बच्चों को, हमें इनसे क्या लेना! मुसीबतें अजब-अजब लोगों
को एकजुट कर देती हैं। जनता के सामने जिनके बारे में हम यह आरोप लगाते थे
कि ये लोग आम जनता के विश्वास योग्य नहीं हैं, तो क्या अब उन्हीं के दरवाज़े
पर माँगने में हमें सुकून मिलता है? होशियार रहो कि आदमी अपने साथियों से ही
पहचाना जाता है। यह कोई विस्मयकारी बात नहीं है कि आप एक उदारवादी गिने
जाने लगे हैं जबकि आप जी-हज़ूरियों और पिछलग्गुओं के साथ बाँह में बाँह डाले
साथ चल रहे हैं।
(हस्ताक्षरकर्ता)
- केदारनाथ सहगल : सदस्य, अखिल भारतीय कांग्रेस कमेटी, अध्यक्ष
पंजाब राजनीतिक पीड़ित कॉन्फ़्रेंस। - मेलाराम वफ़ा : सम्पादक, वन्देमातरम और नेशनल कॉलेज के भूतपूर्व
प्रोफ़ेसर। - प्रेम प्रकाश देवीश्वर : महासचिव, पंजाब सनातन धर्म राजनीतिक
कॉन्फ़्रेंस। - अब्दुल मजीद : सचिव, पंजाब प्रेस कर्मचारी यूनियन।
- भगवानचरण क़ौमी, बी.ए. : सचिव, क़ौमी ग्रेजुएट यूनियन।
- नरेन्द्रनाथ क़ौमी, बी.ए. : पूर्व सहायक सम्पादक, 'भीष्म'।
- धर्मचन्द्र क़ौमी, बी.ए.।
- गणपतराय क़ौमी, बी.ए.।
- बाबू सिंह क़ौमी, बी.ए.।
नौजवान भारत सभा और राष्ट्रीय नेतृत्व का मूल्यांकन / 309
- जी.आर. दरवेशी : सम्पादक, ‘मेहनतकश’।
- कर्मचन्द : सम्पादक, ‘लाहौर’।
- मोहम्मद युसूफ क़ौमी, बी.ए. : सहायक सम्पादक ‘अकाली’।
- सीताराम मास्टर : राजनीतिक कार्यकर्ता, पंजाब।
- हरदयाल : हिन्दी साहित्य भवन।
- धर्मेन्द्र क़ौमी, बी.ए.।
- सुरेन्द्रनाथ।
- एन. कालमऊल्ला।
- पिण्डीदास सोढी : पूर्व सम्पादक, ‘भीष्म’, लाहौर।
- धर्मेन्द्र ठाकुर : पूर्व उपदेशक, हिन्दू सभा।
- डॉ. इन्द्रलाल कपूर।
- लद्धाराम : पूर्व सम्पादक, ‘स्वराज्य’, इलाहाबाद।
- वेदराज भल्ला क़ौमी, बी.ए.।
310 / भगतसिंह और उनके साथियों के सम्पूर्ण उपलब्ध दस्तावेज़
लाला लाजपत राय
और एग्निस स्मेडली
'दि पीपल' (The People) एक अंग्रेज़ी साप्ताहिक समाचारपत्र है। इसके संस्थापक
और सम्पादक पंजाब केसरी लाला लाजपत राय हैं। जिस समय वह पत्र आरम्भ
किया गया था तब उसमें पहले पृष्ठ पर लाला जी की ओर से यह घोषणा की
गयी थी कि इस समाचारपत्र में हर प्रकार के विचार दिये जायेंगे तथा हर विचार
को, भले ही वह किसी भी तरह का हो, सुना जाया करेगा और उस पर धैर्य और
गम्भीरता से विचार किया जायेगा। कुल मिलाकर यह कि यह पत्र एक खुला
विचार-मंच (ओपन फ़ोरम) बनाया गया था, जहाँ प्रत्येक बात पर बहस और
विचार होना था ताकि अंग्रेज़ी पढ़ी-लिखी जनता वास्तविक स्थितियों से परिचित
हो सके तथा अपनी सही राय क़ायम कर सके।
इन पंक्तियों का लेखक इस पत्र को आरम्भ से पढ़ता रहा है। यह पत्र अच्छे
समाचारपत्रों में एक है। इसमें अक्टूबर, 1927 तक घोषित उद्देश्यों का पूर्णतया पालन
किया जाता रहा है। इसमें विद्वान लेखकों के अच्छे-अच्छे लेख प्रकाशित होते रहे
हैं, लेकिन 10 अक्टूबर, 1927 से इसने अपने मुख्य उद्देश्य से मुँह फेर लिया है
और मिस स्मेडली के लेख प्रकाशित करने बन्द कर दिये हैं।
मिस एग्निस स्मेडली यूरोप की एक प्रख्यात लेखिका हैं। वे बर्लिन के एक
विश्वविद्यालय में अंग्रेज़ी की प्राध्यापिका हैं। लाला जी व्यक्तिगत तौर पर उन्हें
जानते हैं। लाला जी ने उनके सन्दर्भ में लिखा था – "पिछले दस बरसों से मैं
मिस स्मेडली को जानता हूँ। मैंने उनकी ईमानदारी पर कभी शक नहीं किया। यह
ऐसी स्त्री नहीं जिन्हें कि रुपये-पैसे से ख़रीदा जा सके। वे जन्मजात युगान्तकारी
हैं। इसलिए उनका स्वभाव, रुझान एवं आदतें सभी एक युगान्तकारी जैसी हैं। उनका
जीवन सम्मान से जीने में बीता है। इन बातों ने युग-परिवर्तन की ओर उनका झुकाव
बढ़ा दिया है। व्यक्तिगत तौर पर उनके विचार पूर्णतया पवित्र एवं सुस्पष्ट हैं। वह
एक ऐसी स्त्री हैं जो अपने कार्य एवं मित्रों के लिए बड़े से बड़ा बलिदान कर
सकती हैं। मैं व्यक्तिगत परिचय के आधार पर कह सकता हूँ कि उन्हें सोना-चाँदी
जैसी चीजें बिल्कुल भी नहीं भरमा सकती हैं।"
नौजवान भारत सभा और राष्ट्रीय नेतृत्व का मूल्यांकन / 311
मिस स्मेडली के लेख ‘द पीपल’ में प्रकाशित होते रहते हैं। जिसने उनके लेख
पढ़े हैं वह उनकी लेखकीय विद्वता एवं ज्ञान की प्रशंसा किये बिना नहीं रह सकता।
मिस स्मेडली बहुत अच्छी लेखिका हैं। वह जिस विषय को छूती हैं उसे जीवन्त
कर देती हैं। राष्ट्रीय राजनीति, हिन्दुस्तान का युगान्तकारी इतिहास तथा हिन्दुस्तान
के जलावतनों के बारे में जितना वह जानती हैं उतना शायद ही कोई हिन्दुस्तानी
जानता हो। हिन्दुस्तान के गुलाम होने की वजह से या किन्हीं दूसरे कारणों से वह
इससे बहुत लगाव रखती हैं तथा यहाँ के पत्र-पत्रिकाओं के माध्यम से अपने विचारों
से अवगत कराती रहती हैं।
लेकिन लाला लाजपत राय को मिस स्मेडली के विचार अच्छे नहीं लगते।
उनको मिस स्मेडली के लेखों में से बोल्शेविक वाली बू आती है। उनकी कोमल
नाक इस बोल्शेविकी बू को सहन न कर सकी। तभी लाला जी पुराने क़िस्सों की
तरह मानस-गन्ध, मानस-गन्ध चीख़ रहे हैं और मिस स्मेडली के लेखों से
तौबा-तौबा कर चुके हैं। इस बोल्शेविकी भय के कारण ही वे अपने मुख्य उद्देश्य
को भी छोड़ चुके हैं और अब अच्छे बच्चों के ‘बीबे राने’ लेख प्रकाशित करने
लगे हैं।
लाला लाजपत राय मज़दूरों के कट्टर समर्थक हैं। ट्रेड यूनियन कांग्रेस के
अध्यक्ष भी रह चुके हैं। आप जेनेवा की अन्तरराष्ट्रीय मज़दूर कांग्रेस में मज़दूरों के
प्रतिनिधि के रूप में शामिल हुए थे। आप मिस्टर मैकाडॉल्ड एण्ड कम्पनी को
पूँजीपति तथा तानाशाही समर्थक लिखते थे। लेकिन आप कौन हैं? मज़दूर हैं? नहीं,
बिल्कुल भी नहीं। आप तो असली पूँजीपति हैं तथा पूँजीपतियों से मित्रता रखते हैं।
आप अपने स्वास्थ्य-लाभ के बहाने मिस्टर बिरला के साथ जेनेवा गये थे तथा वहाँ
उसकी मदद करते रहे थे।
आपने लिखा है कि “मिस स्मेडली ने हमें कोई नयी बात नहीं बतायी। हम
जानते हैं, और पिछले दो सौ बरसों से जानते रहे हैं कि इंग्लैण्ड विकासशील देशों
में हिन्दुस्तान को अपनी जंग-जंगी तैयारियों के लिए उपयोग करता रहा है।” लेकिन
लाला जी से कोई पूछे कि जब आप अंग्रेज़ों की दो सौ बरसों की चालबाज़ियों से
परिचित हैं कि वह हिन्दुस्तान को युद्ध-कार्य के लिए इस्तेमाल करते रहे हैं, तब
आपने इस उपयोग के बारे में शोर क्यों न मचाया? आपने पिछले युद्ध में ही ये
सलाह क्यों नहीं दी कि हिन्दुस्तानियो सशक्त हो जाओ, अब वक़्त है कि युद्ध के
लिए इन्हें कोई मदद न दो और आज़ादी के लिए संघर्ष करो। लेकिन उस समय
आप ऐसा क्यों कहते? उस समय तो आप आनन्दमग्न बैठे अमेरिका में तमाशा देख
रहे थे और जर्मनी के विरुद्ध केवल लिखकर अंग्रेज़ों को यह भरोसा दिला रहे थे
कि आप ख़तरनाक नहीं हैं और देश-निकाले के बाद आपके वापस हिन्दुस्तान आने
में कोई डर नहीं है।
312 / भगतसिंह और उनके साथियों के सम्पूर्ण उपलब्ध दस्तावेज़
लाला जी, आप सर्वज्ञाता हैं। आपके समक्ष अनपढ़ सिख भाई अमेरिका में
से जत्थे बना-बनाकर यहाँ आये और उन्होंने जनता का आह्वान किया कि जनता
जंग में कोई सहायता न करे। अब वक़्त है, लोहा गर्म है, ज़बरदस्त चोट मारकर
आज़ाद हो जाओ। उनकी किसी ने नहीं सुनी। लेकिन वे शहादत पाकर अपना
कर्तव्य पूरा कर गये। उस समय आप सबकुछ जानते थे। आपके लिए तो कोई
नयी बात नहीं हुई। क्या आपके भीतर का सच मर गया था? आपको हिन्दुस्तान
लौटने की चाह ने तड़पाया? दरअसल आप अंग्रेज़ों की नज़र में भले बनकर
हिन्दुस्तान आना चाहते थे, इसलिए आप शान्त रहे और मौन धारण कर लिया।
अंग्रेज़ों के प्रति वफ़ादार बनने के लिए आप जर्मन के विरुद्ध क़लम उठाते रहे।
क्यों लाला जी, ठीक है ना?
लाला जी, वैसे तो सबकुछ आप जानते ही हैं, लेकिन चेतावनी देनी बेहतर
होगी। सुनिए, अब फिर युद्ध छिड़ने वाला है। अब फिर अंग्रेज़ हिन्दुस्तान को अपने
स्वार्थ के लिए इस्तेमाल करेंगे। देश की जनता को सचेत करने के लिए घोषणा
करवा दो, ताकि जनता अंग्रेज़ों की चालबाज़ियों का शिकार न बने और अपने सहारे
खड़े होने के लिए तैयार हो जाये। क्या आप मैदान में आयेंगे?
लेकिन लाला जी तो अपनी अन्तर्आत्मा की आवाज़ के अनुसार काम करते हैं।
वे किसी के कहने पर कोई काम नहीं करते। लेकिन ज़माना बुरी चीज़ है। यह
किसी तरह भी नहीं जीने देता। क्यों, यह अन्तर्आत्मा का प्रकाश किसी भीतरी
कमज़ोरी का ही तो दूसरा नाम नहीं? प्रकाश प्रकाश में फ़र्क़ होता है, इसलिए लाला
जी ने भी अपने भीतर कई प्रकार के प्रकाश रखे हैं। एक आत्मप्रकाश तो वह था
जो लाला लाजपत राय को विदेशों में दौड़ाये फिरता था, एक प्रकाश यह है जो
उन्हें यहाँ ले आया है। एक प्रकार का प्रकाश लाहौर सेन्ट्रल जेल से छूटने के
पश्चात हुआ था। तब लाला जी असहयोग आन्दोलनकारियों का नेतृत्व करते थे।
समझ नहीं आता लाला जी, आप किस प्रकाश के पीछे फिरते हैं? कृपया बताइये!
क्या साम्यवाद स्वयं में, कम से कम आजकल की दुनिया में, फिरकेदारी नहीं
है? क्या यह एक वर्ग का दूसरे वर्ग के विरुद्ध संगठित संघर्ष नहीं है? लाला जी
तो यही कहते हैं। लेकिन लाला जी, आप स्वयं बतायें कि आप साम्यवाद को
फिरकेदारी समझकर ही तो नहीं आये? दरअसल आपने सोचा होगा कि लो
साम्यवादी क्या बनना, हिन्दू ही फिर बन जाते हैं।
लाला जी वर्ग-संघर्ष के भी विरुद्ध दिखायी देते हैं। क्योंकि मालूम होता है,
जैसे लाला जी को दो सौ बरसों से हिन्दुस्तान का ज्ञान है, ऐसे ही जो कुछ महात्मा
मार्क्स ने सिखाया है, उसका भी ज्ञान है। लाला जी ठहरे मज़दूर नेता, तो फिर क्यों
न वर्ग-संघर्ष के सिद्धान्त के ख़िलाफ़ हों, मज़दूर-आन्दोलन की नींव रखने वाले
महात्मा कार्ल मार्क्स के मोटे-मोटे तीन सिद्धान्तों में से एक वर्ग-संघर्ष है और इसी
नौजवान भारत सभा और राष्ट्रीय नेतृत्व का मूल्यांकन / 313
सिद्धान्त पर चलते हुए आज दुनिया के मज़दूर अपनी-अपनी सरकारों और
अपने-अपने देश से टूटकर विश्व-मज़दूर-संगठन में शामिल हो रहे हैं। लेकिन
लाला जी, आज तो आप वर्ग-संघर्ष के ख़िलाफ़ होकर पूँजीवाद तथा तानाशाही को
भी रहने देना चाहते हैं। आप शायद यह समझते हैं कि सामाजिक विकास में, जिस
तरह आप जैसे पूँजीवादी कहते हैं, दोनों की ही आवश्यकता है।
असल बात तो यह है कि लाला जी एक-एक करके अपने पहले के सिद्धान्त
छोड़ रहे हैं और पुनः आर्यसमाजी बन रहे हैं। इसीलिए आपने बहुत खीजते हुए मिस
एग्निस स्मेडली के राष्ट्रवादी सिद्धान्त बताने वाले लेखों को प्रकाशित करना बन्द
कर दिया है। इस तरह प्रकाशन बन्द करते हुए जो टिप्पणी आपने 13 अक्टूबर के
पत्र में लिखी, उसने आपकी शान में चार चाँद नहीं लगाये। जहाँ तक हमें जानकारी
है कि मिस एग्निस स्मेडली अपने लेख बिना कोई पारिश्रमिक लिये भेजती रही
हैं। इस टिप्पणी पर अनेक विरोधात्मक पत्र आये हैं, जिन्हें आपने प्रकाशित करने
का भी साहस नहीं दिखाया। 15 दिसम्बर के पत्र में आपने इस तरह मिस स्मेडली
से क्षमा-याचना की है - “हम अपनी इच्छानुसार कार्य करते हैं। मिस स्मेडली को
यह जानना चाहिए कि ज़िन्दगी में मेरा तो अन्य कोई दूसरा (देशसेवा के अलावा)
काम ही नहीं है। अगर मैंने उन्हें कष्ट पहुँचाया है तो मुझे इसका बहुत अफ़सोस
है। मुझे यह सोचना चाहिए था कि मेरे 'रिमार्क' उन्हें दुख पहुँचाने के अलावा और
कर भी क्या सकते थे।”
लाला जी नित्य सूर्योदय से नौजवानों को उपदेश करने आरम्भ कर देते हैं, कि
शान्तिपूर्वक बुजुर्ग अनुभवी नेताओं के आदेशों को मानना चाहिए, तथा देश के लिए
कुर्बानियाँ करनी चाहिए। लेकिन लाला जी जब स्वयं पग-पग पर ठोकरें खाते हैं,
कई जगहों पर भूलें करते हैं, आत्मसंयम में नहीं रहते। क्षमा-याचनाएँ करते फिरते
हैं तो आप कैसे नौजवानों को नेतृत्व दे सकते हैं?
यदि सच पूछें तो 'पंजाब केसरी' अब बूढ़ा हो गया है। इसके ख़तरनाक दाँत झड़
गये हैं। नौकरशाही को डराने वाले इसके भयानक नाखून तेज़ नहीं रहे। अब तो यह
सर्कस के एक पालतू शेर की तरह बेअसर हो गया है। लाला पहले वाले लाला नहीं
रहे। पहले वाला लाला नौजवान था। उसमें नौजवानों वाला जोश, नौजवान वाला साहस
और जवाँमर्दों वाली कुर्बानी कूट-कूटकर भरी थी। वह लाला हिसाबी नहीं था। वह
कुर्बानी के समुद्र में कूदना जानता था और नौजवान भाइयो, देश का दुर्भाग्य! अब यह
लाला हम नौजवानों को उपदेश करने के लिए रह गया है। लाला स्वयं स्वीकारता है
और कहता है कि “मेरी तौबा, मैं कोई कुर्बानी नहीं कर सकता।” लेकिन वह
“नौजवानों को सही मार्ग” पर चलाने को अपना अधिकार समझता है। किसी कवि
ने ठीक कहा है, “बदलता है रंग आसमाँ कैसे-कैसे?”
जनवरी, 1928
314 / भगतसिंह और उनके साथियों के सम्पूर्ण उपलब्ध दस्तावेज़
लाला लाजपत राय और नौजवान
लाला लाजपत राय आदि न जाने क्यों पहले से ही नौजवानों के भाषणों के विरोधी
चले आ रहे हैं। आपने देश-भक्ति का आदर्श इटली के महान मैजिनी से सीखा।
वह नौजवानों का बहुत बड़ा प्रशंसक था और कहता था कि “महान कार्यों का भार
नौजवान ही उठाते हैं, उनकी आवाज़ में जादू-सा असर होता है। वे जनता को
स्वतन्त्रता-संग्राम के लिए तुरन्त तैयार कर देते हैं।” ऐसे व्यक्ति को अपने जीवन
का आदर्श बताने वाला व्यक्ति इसके बिल्कुल विपरीत आचरण करे, यही देखकर
आश्चर्य होता है। 1907-08 के पुराने गड़े मुर्दे क्या उखाड़ने? आजकल की ही
कुछ बातें पर्याप्त हैं।
पिछले कौंसिल के चुनावों में लाला जी ने कांग्रेस का साथ छोड़कर उसकी
मुख़ालफ़त करनी आरम्भ कर दी और इसी दौरान ऐसी बातें कहते रहे जोकि किसी
भी तरह उन्हें शोभा नहीं देती थीं। यह देखकर कुछ संवेदनशील नौजवानों ने आपके
विरुद्ध आवाज़ उठायी। उसका बदला लेने के लिए लाला जी ने खुलेआम भाषणों
में कहा कि ये नौजवान बहुत ही ख़तरनाक एवं क्रान्ति-समर्थक हैं तथा लेनिन जैसा
नेता चाहते हैं। मुझमें लेनिन बनने की ताक़त नहीं। साथ ही यह भी कह दिया कि
इन नौजवानों को अगर पचास रुपये की भी नौकरी मिल गयी तो ये झाग की तरह
बैठ जायेंगे। इसका क्या अर्थ है? क्या पचास रुपयों के लिए अपना आदर्श छोड़ने
वाले नौजवान ही लेनिन के साथ थे? क्या लेनिन इसी स्तर का है? नहीं तो ऐसी
बात क्यों कही गयी? सिर्फ़ इसलिए कि लाला जी जहाँ एक ओर सरकार को इनके
विरुद्ध कठोर कार्यवाही करने के लिए उकसा रहे हैं, वहीं जनता की नज़रों में
नौजवानों का सम्मान गिराने की कोशिश भी कर रहे हैं।
सद्भावना से किसी व्यक्ति के किसी कार्य अथवा विचार की कठोरतम
आलोचना करने का प्रत्येक को अधिकार है, लेकिन जानबूझकर किसी के विचारों
की ग़लतबयानी करके, ग़लतफ़हमियाँ फैलाकर किसी को हानि पहुँचाने का प्रयत्न
करना प्रत्येक के लिए ना-मुनासिब है। तब चाहे वह लाला लाजपत राय हों या कोई
अज्ञात नौजवान। उस चुनाव के बाद अनेक अवसर ऐसे आये, लेकिन उनका
उल्लेख करने की आवश्यकता नहीं।
लाला जी ने अभी दूसरा लेख लिखा है। वास्तव में तो यह ‘कण्ट्री लीग’,
नौजवान भारत सभा और राष्ट्रीय नेतृत्व का मूल्यांकन / 315
जिसका उल्लेख हम पिछले अंक में कर चुके हैं, के सन्दर्भ में लिखा गया था, लेकिन
उसमें नौजवानों का उल्लेख आ गया। लाला जी फ़रमाते हैं कि आजकल के उग्र
विचारों वाले नौजवानों के भाषणों से जनता को बचना चाहिए। ये युगान्तकारी क्रान्ति
समर्थक हैं। सम्पत्ति के लिए इनका प्रचार हानिकारक है, क्योंकि इससे वर्ग-संघर्ष
छिड़ने का डर है। अन्त में कहा कि यह काम कुछ विदेशी शरारती तत्त्वों के उकसावे
में आकर आरम्भ किया गया है। वह बाहरी तत्त्व हमारे राष्ट्रीय आन्दोलन में फूट
डालना चाहते हैं, इसलिए वह बहुत ख़तरनाक हैं। साथ वह यह भी मानते हैं कि इस
तरह के प्रचार से सम्पत्ति वाले व्यक्ति सरकार में मिल जायेंगे। इन प्रचारक नौजवानों
को गुमराह, बाहरी तत्त्वों के उकसावे में आये हुए, शरारती और लोभी बताते हुए अन्त
में कहा है कि उन्हें पण्डित जवाहरलाल नेहरू पर पूरी तरह यक़ीन है। वे यदि कुछ
कर रहे हैं अथवा कह रहे हैं तो नेकनीयती और समझबूझ से। बहुत ख़ूब! जिन पण्डित
जवाहरलाल नेहरू आदि के विचारों पर रूस का अच्छा-ख़ासा असर हुआ, जिन्होंने
रूस से लौट आने पर इन विचारों का प्रचार शुरू किया, उनकी नीयत पर कोई शक
नहीं। वह विदेशी प्रभाव या उकसावे में ये बातें नहीं कह रहे, बल्कि नेकनीयती से
कह रहे हैं, लेकिन जो बेचारे देश से बाहर नहीं जा सके वे उकसावे में आये हुए हैं!
ख़ूब! बहुत ख़ूब! असल बात यह है कि जवाहरलाल नेहरू की हैसियत बहुत बड़ी
हो गयी है। उनका नाम कांग्रेस की अध्यक्षता के लिए पेश हो रहा है, तो उम्मीद भी
है कि वे जल्द ही अध्यक्ष बन भी जायेंगे। उनके विरुद्ध लिखने पर ईंट का जवाब
पत्थर से मिलने का भय होता है, लेकिन गुमनाम नौजवानों के लिए जो मन में आये.
..कौन पूछता है। नौजवानों को संकटों में फँसाने की इन कोशिशों को हम क्या कहें?
लाला जी को यह शोभा नहीं देता। ख़ैर, जो उनके मन में आये, करें। अब हम उनकी
कुछ बातों का उत्तर देना चाहेंगे।
सबसे पहले हम यह बताना चाहते हैं कि इस प्रचार के लिए कोई विदेशी
हमें गुमराह नहीं कर रहा। नौजवान किसी के उकसावे में आकर ऐसी बातें नहीं
कह रहे, बल्कि अब देश के भीतर से ही महसूस करने लगे हैं। लाला जी स्वयं
बड़े आदमी हैं। प्रथम या द्वितीय श्रेणी में यात्रा करते हैं। उन्हें क्या मालूम कि
तीसरे दर्जे में कौन सफ़र कर रहा है? वे क्या जानें कि तीसरे दर्जे के मुसाफ़िर-
ख़ानों में किसे लातें खानी पड़ती हैं? वे मोटर में बैठकर अपने साथियों के साथ
हँसते-खेलते हज़ारों गाँवों से गुज़र जाते हैं। उन्हें क्या मालूम कि हज़ारों लोगों पर
क्या गुज़र रही है? क्या आज हम 'अनहैप्पी इण्डिया' जैसी किताब के लेखक
को हिन्दुस्तान के करोड़ों भूखों मरने वालों की दयनीय दशा बतायें? क्या आज
उन करोड़ों मनुष्यों को देखकर जो सुबह से शाम तक ख़ून-पसीना एक करके
पेट भी नहीं भर सकते, यह आवश्यकता शेष रह जाती है कि कोई बाहर से
आकर हमें कहे कि उनके पेट भरने की कोई राह निकालो। हम गाँवों में गर्मी,
316 / भगतसिंह और उनके साथियों के सम्पूर्ण उपलब्ध दस्तावेज़
सर्दी, बारिश, धूप, लू और कोहरे में रात-दिन किसानों को काम करते देखते
हैं। लेकिन वे बेचारे रूखी-सूखी रोटी खाकर गुज़ारा कर रहे हैं – और क़र्ज़ के
नीचे दबे हुए हैं। तब क्या हम तड़प नहीं उठते? उस समय हमारे दिलों में आग
नहीं भड़क उठती? तब भी क्या हमें किसी की आवश्यकता रह जाती है जो
आकर यह बताये कि इस व्यवस्था को बदलने का प्रयास करो। जब हम नित्य
प्रति देखते हैं कि श्रमिक भूखे मरते हैं और निठल्ले बैठकर खाने वाले आनन्द
मना रहे हैं, तो क्या हम इस आर्थिक और सामाजिक व्यवस्था की गड़बड़ियाँ
अनुभव नहीं कर सकते? जब हम देखते हैं कि दिनोदिन अपराध बढ़ रहे हैं,
जनता की हालत रोज़-ब-रोज़ दयनीय होती जा रही है, तब क्या हमें बाहरी
उपदेशकों की आवश्यकता है जो हमें आकर समझायें कि क्रान्ति की
आवश्यकता है...करोड़ों मनुष्यों को जिन्हें हमने अछूत कहकर दूर किया हुआ है
उनकी दर्दनाक स्थितियाँ देखकर क्या क्रोध नहीं आता? करोड़ों (लोग) दुनिया
का बहुत विकास कर सकते हैं, वे जन-सेवा कर सकते थे, लेकिन आज वे हम
पर भार महसूस होते हैं। उनकी इस स्थिति में सुधार के लिए, उन्हें पूर्ण रूप
से मनुष्य बनाने के लिए और कुओं की जगत पर चढ़ाने-मात्र के लिए क्या
आन्दोलनों की ज़रूरत नहीं है? क्या उन्हें ऐसी अवस्था में लाने की आवश्यकता
नहीं थी कि वे हमारी तरह कमा-खा सकें? इसके लिए क्या सामाजिक और
आर्थिक नियमों में क्रान्ति आवश्यक नहीं है? क्या पंजाब तथा हिन्दुस्तान के
नौजवानों में स्वयं कुछ अहसास करने की कोई शक्ति शेष नहीं बची? उनके
सीने में क्या दिल नहीं धड़कता? क्या उनके दिलों में मानवता नहीं है? नहीं तो
फिर क्यों कहा जाता है कि विदेशियों ने आकर उन्हें उकसाया है। हाँ, हम यह
स्वीकारते हैं कि रूसी क्रान्ति ने दुनिया के समक्ष एकदम नये विचार रखे हैं।
हम मानते हैं कि जिन बातों का हल शायद अभी हम स्वयं नहीं सोच सकते,
रूसी विद्वानों ने उम्रभर कष्ट सहते हुए, तिल-तिल कर जीवन समाप्त करते हुए
उनके बारे में अपने विचार दुनिया के सामने रखे। क्या उन्हें उसका कोई लाभ
नहीं मिलना चाहिए? क्या उनसे विचारों की समानता भी उकसावा है? तब तो
लाला जी को मैजिनी ने देश के नौजवानों को गुमराह करके देशसेवा के काम
में जुटाया हुआ था!
प्रश्न यह है कि आजकल, 1928 में, क्या दुनिया को फ़्रांसीसी क्रान्ति से
कोई सबक सीखना और उसे अपना आदर्श बनाना चाहिए या आज नये वातावरण
में नये विचारों से पूर्ण रूसी क्रान्ति को? क्या लाला जी की यह मंशा है कि
अब अंग्रेज़ी शासन के विरुद्ध ही क्रान्ति की जाये और शासन की बागडोर अमीरों
के हाथों में दी जाये? करोड़ों जन इसी तरह नहीं, इससे भी अधिक बुरी
स्थितियों में पड़ें, मरें और तब फिर सैकड़ों बरसों के खून-ख़राबे के पश्चात
नौजवान भारत सभा और राष्ट्रीय नेतृत्व का मूल्यांकन / 317
पुनः इस राह पर आयें और फिर हम अपने पूँजीपतियों के विरुद्ध क्रान्ति करें?
यह अव्वल दर्जे की मूर्खता होगी।
लाला जी ने एक-दो बार दास के शब्द सुन-सुनाकर गाँवों में संगठन की बात
थोड़ी-सी उठायी थी। लाला जी को तो गाँवों में जाने की फुरसत ही नहीं। वे क्या
जानें कि जनता के विचार क्या हैं? लोग साफ़ कहते हैं कि हमें इन्कलाब का क्या
लाभ? जब इसी तरह मर-खपकर दो जून की रोटी जुटनी है और तब भी नम्बरदार,
तहसीलदार और थानेदार को इसी तरह अत्याचार करने हैं, इसी तरह किराये वसूल
किये जाने हैं तो हम अभी की रोटी क्यों गँवाये? किसी के लिए अपने प्रियजनों
को क्यों उलझनों में डालें? हम उन्हें क्या बतायें कि उनके पूर्वज कैसे थे, जिससे
कि वे बलिदान के लिए तैयार हो जायें।
अच्छा, माना कि यहाँ क्रान्ति हो जाये तब लाला जी के विचार से किसे शासन
सौंपा जायेगा? क्या महाराज वर्द्धमान या महाराज पटियाला को और पूँजीपतियों के
टोले को? क्या आज अमेरिका और फ़्रांस के करोड़ों मज़दूर भूखों नहीं मर रहे?
हम सबकुछ जानते-बुझते क्यों कुएँ में गिरें?
लाला जी कहते हैं कि हमारे साम्यवादी विचारों के प्रचार से पूँजीपति सरकार
के साथ मिल जायेंगे। बहुत ख़ूब! पहले वे किधर हैं? कितने पूँजीपति युगान्तरकारी
बने हैं? क्रान्ति से जिन्हें अपनी सम्पत्ति में थोड़ी-बहुत हानि होने का डर होगा वे
हमेशा ही विरोधी हो जाते हैं। ऐसी स्थितियों में उनकी जी-हजूरी के लिए आदर्श
त्यागकर ख़ामखाह अपने कार्य को हानि पहुँचाना उचित नहीं। दूसरी बात यह कि
पूँजीपति ज़रा सोचें कि किस स्थिति में उन्हें लाभ है? आज अंग्रेज़ उन्हें अपने स्वार्थ
के लिए अपने साथ अवश्य मिला लेंगे, लेकिन धीरे-धीरे उनकी पूँजी छीनकर उसे
अपने पूँजीपतियों के हाथों में स्थानान्तरित कर देंगे। तब यह ग़रीब (हो गये
सरमायेदार) आज जैसे करोड़ों मज़दूरों में शामिल होकर मरते-खपते रहेंगे। इन्हें
सामाजिक व्यवस्था में अन्याय दिखायी देगा। अगर वे साम्यवादी क्रान्ति कर लें तो
आज उनकी हरामख़ोरी पर तो ज़रूर रोक लगायी जायेगी लेकिन दुनिया की आम
खुशहाली में जोकि निश्चय ही आनी है, शामिल होकर वे बहुत सुखी रहेंगे।
हिन्दुस्तानी पूँजीपति सोच लें कि उनको किस में लाभ है?
लेकिन मज़दूर-आन्दोलन उनके लिए रुक नहीं सकता, उनकी प्रतीक्षा भी नहीं
कर सकता। नौजवानों को घबराना नहीं चाहिए। काम को आरम्भ करने में बहुत
कठिनाइयाँ पैदा होती हैं, धीरज से मुक़ाबला करना चाहिए। लाला जी और दूसरे
प्रकार के पूँजीवादी नीति वाले नेता भी धीरे-धीरे स्वयं मैदान से बाहर हो रहे हैं,
जिस प्रकार पहले सुरेन्द्रनाथ बनर्जी हुए थे और आज सप्रू तथा चिन्तामणि जैसे हो
रहे हैं। अन्त में मज़दूर-आन्दोलन की जीत होगी। बोलो साम्यवादियों की जय!
युगान्तकारी धारा क़ायम रहे!
318 / भगतसिंह और उनके साथियों के सम्पूर्ण उपलब्ध दस्तावेज़
नये नेताओं के अलग-अलग विचार
(जुलाई, 1928 के ‘किरती’ में छपे इस लेख में भगतसिंह ने सुभाषचन्द्र बोस
और जवाहरलाल नेहरू के विचारों की तुलना की है। बाद में इतिहास ने भगतसिंह
के इन विचारों की पुष्टि की। – स.)
असहयोग आन्दोलन की असफलता के बाद जनता में बहुत निराशा और मायूसी
फैली। हिन्दू-मुस्लिम झगड़ों ने बचा-खुचा साहस भी खत्म कर डाला। लेकिन देश
में जब एक बार जागृति फैल जाये तब देश ज़्यादा दिन तक सोया नहीं रह सकता।
कुछ ही दिनों बाद जनता बहुत जोश के साथ उठती तथा हमला बोलती है। आज
हिन्दुस्तान में फिर जान आ गयी है। हिन्दुस्तान फिर जाग रहा है। देखने में तो कोई
बड़ा जन-आन्दोलन नज़र नहीं आता लेकिन नींव ज़रूर मज़बूत की जा रही है।
आधुनिक विचारों के अनेक नये नेता सामने आ रहे हैं। इस बार नौजवान नेता ही
आगे बढ़े और देश में नौजवानों के ही आन्दोलन चल रहे हैं। नौजवान नेता ही
देशभक्त लोगों की नज़रों में आ रहे हैं। बड़े-बड़े नेता बड़े होने के बावजूद एक
तरह से पीछे छोड़े जा रहे हैं। इस समय जो नेता आगे आये हैं वे हैं – बंगाल के
पूजनीय श्री सुभाषचन्द्र बोस और माननीय पण्डित श्री जवाहरलाल नेहरू। यही दो
नेता हिन्दुस्तान में उभरते नज़र आ रहे हैं और युवाओं के आन्दोलनों में विशेष रूप
से भाग ले रहे हैं। दोनों ही हिन्दुस्तान की आज़ादी के कट्टर समर्थक हैं। दोनों ही
समझदार और सच्चे देशभक्त हैं। लेकिन फिर भी इनके विचारों में ज़मीन-आसमान
का अन्तर है। एक को भारत की प्राचीन संस्कृति का उपासक कहा जाता है तो
दूसरे को पक्का पश्चिम का शिष्य। एक को कोमल हृदय वाला भावुक कहा जाता
है और दूसरे को पक्का युगान्तकारी। हम इस लेख में उनके अलग-अलग विचारों
को जनता के समक्ष रखेंगे, ताकि जनता स्वयं उनके अन्तर को समझ सके और
स्वयं भी विचार कर सके। लेकिन उन दोनों के विचारों का उल्लेख करने से पूर्व
एक और व्यक्ति का उल्लेख करना भी ज़रूरी है जोकि इन्हीं की भाँति स्वतन्त्रता
प्रेमी है और युवा-आन्दोलनों की एक विशेष शख्सियत है। साधू वासवानी जो चाहे
कांग्रेस के बड़े नेताओं की भाँति जाने-माने तो नहीं, चाहे देश के राजनीतिक क्षेत्र
में उनका कोई विशेष स्थान तो नहीं, तो भी युवाओं पर, जिन्हें कि कल देश की
नौजवान भारत सभा और राष्ट्रीय नेतृत्व का मूल्यांकन / 319
बागडोर सँभालनी है, उनका असर है और उनके ही द्वारा शुरू हुआ आन्दोलन
'भारत-युवा संघ' इस समय युवाओं में विशेष प्रभाव रखता है। उनके विचार
बिल्कुल अलग ढंग के हैं। उनके विचार एक ही शब्द में बताये जा सकते हैं -
“वापस वेदों की ओर लौट चलो।” (बैक टु वेद्स)। यह आवाज़ सबसे पहले
आर्यसमाज ने उठायी थी। इस विचार का आधार इस आस्था में है कि वेदों में
परमात्मा ने संसार का सारा ज्ञान उँडेल दिया है। इससे आगे और अधिक विकास
नहीं हो सकता। इसलिए हमारे हिन्दुस्तान ने चौतरफ़ा जो प्रगति कर ली थी उससे
आगे न दुनिया बढ़ी है और न बढ़ सकती है! ख़ैर, वासवानी आदि इसी आस्था
को मानते हैं। तभी एक जगह कहते हैं -
“हमारी राजनीति ने अब तक कभी तो मैजिनी और वाल्टेयर को अपना आदर्श
मानकर उदाहरण स्थापित किये हैं और या कभी लेनिन और टालस्टाय से सबक
सीखा। हालाँकि उन्हें ज्ञात होना चाहिए कि उनके पास उनसे कहीं बड़े आदर्श हमारे
पुराने ऋषि हैं।” वे इस बात पर यक़ीन करते हैं कि हमारा देश एक बार तो विकास
की अन्तिम सीमा तक जा चुका था और आज हमें आगे कहीं भी जाने की
आवश्यकता नहीं, बल्कि पीछे लौटने की ज़रूरत है।
आप एक कवि हैं। कवित्व आपके विचारों में सभी जगह नज़र आता है। साथ
ही यह धर्म के बहुत बड़े उपासक हैं। यह 'शक्ति' धर्म चलाना चाहते हैं। यह कहते
हैं, “इस समय हमें शक्ति की अत्यन्त आवश्यकता है।” वह 'शक्ति' शब्द का अर्थ
केवल भारत के लिए इस्तेमाल नहीं करते। लेकिन उनको इस शब्द से एक प्रकार
की देवी का, एक विशेष ईश्वरीय प्राप्ति का विश्वास है। वे एक बहुत भावुक कवि
की तरह कहते हैं :
"For in solitude have communicated with her, our admired Bharat
Mata, And my aching head had heard voices saying...'The day of free-
dom is not far off.'... Sometimes indeed a strange feeling visits me and
I say to myself-Holly, holy is Hindustan. For still is she under the pro-
tection of her mighty Rishis and their beauty is around us, but we behold
it not."
अर्थात् एकान्त में भारत की आवाज़ मैंने सुनी है। मेरे दुखी मन ने कई बार
यह आवाज़ सुनी है कि 'आज़ादी का दिन दूर नहीं'...कभी-कभी बहुत अजीब
विचार मेरे मन में आते हैं और मैं कह उठता हूँ, हमारा हिन्दुस्तान पाक और पवित्र
है, क्योंकि पुराने ऋषि उसकी रक्षा कर रहे हैं और उनकी ख़ूबसूरती हिन्दुस्तान के
पास है। लेकिन हम उन्हें देख नहीं सकते।
यह कवि का विलाप है कि वह पागलों या दीवानों की तरह कहते रहते हैं
: “हमारी माता बड़ी महान है। बहुत शक्तिशाली है। उसे परास्त करने वाला कौन
पैदा हुआ है।” इस तरह वे केवल मात्र भावुकता की बातें करते हुए कह जाते हैं
320 / भगतसिंह और उनके साथियों के सम्पूर्ण उपलब्ध दस्तावेज़
: "Our national movement must become a purifying mass movement. If it is
to fulfil its destiny without falling into class war one of the dangers of
Bolshevism."
अर्थात हमें अपने राष्ट्रीय जन-आन्दोलन को देश-सुधार का आन्दोलन बना
देना चाहिए। तभी हम वर्गयुद्ध के बोल्शेविज़्म के ख़तरों से बच सकेंगे। वह इतना
कहकर ही कि ग़रीबों के पास जाओ, गाँवों की ओर जाओ, उनको दवा-दारू मुफ़्त
दो – समझते हैं कि हमारा कार्यक्रम पूरा हो गया। वे छायावादी कवि हैं। उनकी
कविता का कोई विशेष अर्थ तो नहीं निकल सकता, मात्र दिल का उत्साह बढ़ाया
जा सकता है। बस पुरातन सभ्यता के शोर के अलावा उनके पास कोई कार्यक्रम
नहीं। युवाओं के दिमाग़ों को वे कुछ नया नहीं देते। केवल दिल को भावुकता से
ही भरना चाहते हैं। उनका युवाओं में बहुत असर है। और भी पैदा हो रहा है। उनके
दकियानूसी और संक्षिप्त-से विचार यही हैं जोकि हमने ऊपर बताये हैं। उनके
विचारों का राजनीतिक क्षेत्र में सीधा असर न होने के बावजूद बहुत असर पड़ता
है। विशेषकर इस कारण कि नौजवानों, युवाओं को ही कल आगे बढ़ना है और
उन्हीं के बीच इन विचारों का प्रचार किया जा रहा है।
अब हम श्री सुभाषचन्द्र बोस और श्री जवाहरलाल नेहरू के विचारों पर आ
रहे हैं। दो-तीन महीनों से आप बहुत-सी कॉन्फ़्रेंसों के अध्यक्ष बनाये गये और आपने
अपने-अपने विचार लोगों के सामने रखे। सुभाष बाबू को सरकार तख़्तापलट गिरोह
का सदस्य समझती है और इसीलिए उन्हें बंगाल अध्यादेश के अन्तर्गत क़ैद कर
रखा था। आप रिहा हुए और गर्म दल के नेता बनाये गये। आप भारत का आदर्श
पूर्ण स्वराज्य मानते हैं, और महाराष्ट्र कॉन्फ़्रेंस में अध्यक्षीय भाषण में आपने इसी
प्रस्ताव का प्रचार किया।
पण्डित जवाहरलाल नेहरू स्वराज पार्टी के नेता पण्डित मोतीलाल नेहरू जी
के सुपुत्र हैं। बैरिस्टरी पास हैं। आप बहुत विद्वान हैं। आप रूस आदि का दौरा कर
आये हैं। आप भी गर्म दल के नेता हैं और मद्रास कॉन्फ़्रेंस में आपके और आपके
साथियों के प्रयासों से ही पूर्ण स्वराज्य का प्रस्ताव स्वीकृत हो सका था। आपने
अमृतसर कॉन्फ़्रेंस के भाषण में भी इसी बात पर ज़ोर दिया। लेकिन फिर भी इन
दोनों सज्जनों के विचारों में ज़मीन-आसमान का अन्तर है। अमृतसर और महाराष्ट्र
कॉन्फ़्रेंसों के इन दोनों अध्यक्षों के भाषण पढ़कर ही हमें इनके विचारों का अन्तर
स्पष्ट हुआ था। लेकिन बाद में बम्बई के एक भाषण में यह बात स्पष्ट रूप से
हमारे सामने आ गयी। पण्डित जवाहरलाल नेहरू इस जनसभा की अध्यक्षता कर
रहे थे और सुभाषचन्द्र ने भाषण किया। वह एक बहुत भावुक बंगाली हैं। उन्होंने
भाषण आरम्भ किया कि हिन्दुस्तान का दुनिया के नाम एक विशेष सन्देश है। वह
दुनिया को आध्यात्मिक शिक्षा देगा। खैर, आगे वे दीवाने की तरह कहना आरम्भ
नौजवान भारत सभा और राष्ट्रीय नेतृत्व का मूल्यांकन / 321
कर देते हैं – चाँदनी रात में ताजमहल को देखो और जिस दिल की यह समझ
का परिणाम था, उसकी महानता की कल्पना करो। सोचो एक बंगाली उपन्यासकार
ने लिखा है कि हममें 'यह हमारे आँसू ही जम-जमकर पत्थर बन गये हैं।' वह
भी वापस वेदों की ओर ही लौट चलने का आह्वान करते हैं। आपने अपने पूना वाले
भाषण में 'राष्ट्रवादिता' के सम्बन्ध में कहा है कि अन्तरराष्ट्रीयतावादी, राष्ट्रीयतावाद
को एक संकीर्ण दायरे वाली विचारधारा बताते हैं, लेकिन यह भूल है। हिन्दुस्तानी
राष्ट्रीयता का विचार ऐसा नहीं है। वह न संकीर्ण है। न निजी स्वार्थ से प्रेरित है
और न उत्पीड़नकारी है, क्योंकि इसकी जड़ या मूल तो यह 'सत्यम शिवम
सुन्दरम' है, अर्थात 'सच, कल्याणकारी और सुन्दर।'
यह भी वही छायावाद है। कोरी भावुकता है। साथ ही उन्हें भी अपने पुरातन
युग पर बहुत विश्वास है। वह प्रत्येक बात में अपने पुरातन युग की महानता देखते
हैं। पंचायतीराज का ढंग उनके विचार में कोई नया नहीं। 'पंचायती राज और जनता
का राज' वे कहते हैं कि हिन्दुस्तान में बहुत पुराना है। वे तो यहाँ तक कहते हैं
कि साम्यवाद भी हिन्दुस्तान के लिए नयी चीज़ नहीं। ख़ैर, उन्होंने सबसे ज़्यादा उस
दिन के भाषण में ज़ोर जिस बात पर दिया था वह यह थी कि हिन्दुस्तान का दुनिया
के लिए एक विशेष सन्देश है। पण्डित जवाहरलाल आदि के विचार इसके बिल्कुल
विपरीत हैं। वे कहते हैं –
“जिस देश में जाओ वही समझता है कि उसका दुनिया के लिए एक विशेष
सन्देश है। इंग्लैण्ड दुनिया को संस्कृति सिखाने का ठेकेदार बनता है। मैं तो कोई
विशेष बात अपने देश के पास नहीं देखता। सुभाष बाबू को उन बातों पर बहुत
यक़ीन है।” जवाहरलाल कहते हैं – "Every youth must rebel. Not only in
political sphere, but in social, economic and religious spheres also. I have
not much use for any man who comes and tells me that such and such thing
is said in Koran, Every thing unreasonable must be discarded even if they
find authority for it in the Vedas and Koran." (यानी) “प्रत्येक नौजवान को
विद्रोह करना चाहिए। राजनीतिक क्षेत्र में ही नहीं बल्कि सामाजिक, आर्थिक और
धार्मिक क्षेत्र में भी। मुझे ऐसे व्यक्ति की कोई आवश्यकता नहीं जो आकर कहे
कि फलाँ बात कुरान में लिखी हुई है। कोई बात जो अपनी समझदारी की परख
में सही साबित न हो उसे चाहे वेद और कुरान में कितना ही अच्छा क्यों न कहा
गया हो, नहीं माननी चाहिए।”
यह एक युगान्तकारी के विचार हैं और सुभाष के एक राजपरिवर्तनकारी के
विचार हैं। एक के विचार में हमारी पुरानी चीजें बहुत अच्छी हैं और दूसरे के
विचार में उनके विरुद्ध विद्रोह कर दिया जाना चाहिए। एक को भावुक कहा
322 / भगतसिंह और उनके साथियों के सम्पूर्ण उपलब्ध दस्तावेज़
जाता है और एक को युगान्तकारी और विद्रोही! पण्डित जी एक स्थान पर कहते
हैं – "To those who still fondly cherish old ideas and are striving to bring
back the conditions which prevailed in Arabia 1300 years ago or in the
vedic Age in India. I say, that it is inconcievable that you can bring back
the hoary past. The world of reality will not retrace its steps, the world of
imagiation may remain stationary."
वे कहते हैं कि जो अब भी क़ुरान के ज़माने के, अर्थात 1300 बरस पीछे
के अरब की स्थितियाँ पैदा करना चाहते हैं या जो पीछे वेदों के ज़माने की ओर
देख रहे हैं उनसे मेरा यही कहना है कि यह तो सोचा भी नहीं जा सकता कि वह
युग वापस लौट आयेगा, वास्तविक दुनिया पीछे नहीं लौट सकती, काल्पनिक
दुनिया को चाहे कुछ दिन यहीं स्थिर रखो। और इसीलिए वे विद्रोह की आवश्यकता
महसूस करते हैं।
सुभाष बाबू पूर्ण स्वराज के समर्थन में हैं क्योंकि वे कहते हैं कि अंग्रेज़ पश्चिम
के वासी हैं। हम पूर्व के। पण्डित जी कहते हैं, हमें अपना राज क़ायम करके सारी
सामाजिक व्यवस्था बदलनी चाहिए। उसके लिए पूरी-पूरी स्वतन्त्रता प्राप्त करने की
आवश्यकता है।
सुभाष बाबू मज़दूरों से सहानुभूति रखते हैं और उनकी स्थिति सुधारना चाहते
हैं। पण्डित जी एक क्रान्ति करके सारी व्यवस्था ही बदल देना चाहते हैं। सुभाष
भावुक हैं – दिल के लिए नौजवानों को बहुत कुछ दे रहे हैं, पर मात्र दिल के
लिए। दूसरा युगान्तकारी है जोकि दिल के साथ-साथ दिमाग़ को भी बहुत कुछ
दे रहा है – "They should aim at Swaraj for the masses based on socialism.
That was a revolutionary change which they could not bring about without
revolutionary methods....Mere reform or gradual repairing of the existing
machinery could not achieve the real proper Swaraj for the General
Masses." (अर्थात) हमारा आदर्श समाजवादी सिद्धान्तों के अनुसार पूर्ण स्वराज्य
होना चाहिए, जोकि युगान्तकारी तरीक़ों के बिना प्राप्त नहीं हो सकता। केवल सुधार
और मौजूदा सरकार की मशीनरी की धीमी-धीमी की गयी मरम्मत जनता के लिए
वास्तविक स्वराज्य नहीं ला सकती।
यह उनके विचारों का ठीक-ठीक अक्स है। सुभाष बाबू राष्ट्रीय राजनीति की
ओर उतने समय तक ही ध्यान देना आवश्यक समझते हैं जितने समय तक दुनिया
की राजनीति में हिन्दुस्तान की रक्षा और विकास का सवाल है। परन्तु पण्डित जी
राष्ट्रीयता के संकीर्ण दायरों से निकलकर खुले मैदान में आ गये हैं।
अब सवाल यह है कि हमारे सामने दोनों विचार आ गये हैं। हमें किस ओर
झुकना चाहिए। एक पंजाबी समाचारपत्र ने सुभाष की तारीफ़ के पुल बाँधकर
नौजवान भारत सभा और राष्ट्रीय नेतृत्व का मूल्यांकन / 323
पण्डित जी आदि के बारे में कहा था कि ऐसे विद्रोही पत्थरों से सिर मार-मारकर
मर जाते हैं। ध्यान रखना चाहिए कि पंजाब पहले ही बहुत भावुक प्रान्त है। लोग
जल्द ही जोश में आ जाते हैं और जल्द ही झाग की तरह बैठ जाते हैं।
सुभाष आज शायद दिल को कुछ भोजन देने के अलावा कोई दूसरी मानसिक
खुराक नहीं दे रहे हैं। अब आवश्यकता इस बात की है कि पंजाब के नौजवानों
को इन युगान्तकारी विचारों को ख़ूब सोच-विचारकर पक्का कर लेना चाहिए। इस
समय पंजाब को मानसिक भोजन की सख़्त ज़रूरत है और यह पण्डित जवाहरलाल
नेहरू से ही मिल सकता है। इसका अर्थ यह नहीं है कि उनके अन्धे पैरोकार बन
जाना चाहिए। लेकिन जहाँ तक विचारों का सम्बन्ध है, वहाँ तक इस समय पंजाबी
नौजवानों को उनके साथ लगना चाहिए, ताकि वे इन्क़लाब के वास्तविक अर्थ,
हिन्दुस्तान में इन्क़लाब की आवश्यकता, दुनिया में इन्क़लाब का स्थान क्या है,
आदि के बारे में जान सकें। सोच-विचार के साथ नौजवान अपने विचारों को स्थिर
करें ताकि निराशा, मायूसी और पराजय के समय में भी भटकाव के शिकार न हों
और अकेले खड़े होकर दुनिया से मुक़ाबले में डटे रह सकें। इसी तरह जनता
इन्क़लाब के ध्येय को पूरा कर सकेगी।
324 / भगतसिंह और उनके साथियों के सम्पूर्ण उपलब्ध दस्तावेज़
साण्डर्स की हत्या के बाद :
दो नोटिस
17 नवम्बर, 1928 को लाला लाजपत राय का देहान्त हुआ। अक्टूबर में साइमन
कमीशन के विरोध में लाहौर में हुए विशाल प्रदर्शन का लाला जी ने नेतृत्व किया था
और पुलिस ने उन पर लाठियाँ बरसायी थीं। यही लाठियाँ लाला जी की मृत्यु का कारण
बनीं। लाला जी की मृत्यु से देश में दुख व आतंक छा गया। श्रीमती चितरंजन दास
ने ऐसे माहौल में सवाल किया था, ‘क्या देश में मानवता व जवानी अभी बाक़ी है?’
लाला लाजपत राय के प्रति बहुत अच्छी राय न होने के बावजूद, क्रान्तिकारियों
ने लाला जी की मृत्यु को राष्ट्रीय अपमान का मुद्दा बनाया और इसका बदला लाला
जी पर लाठियाँ बरसाने वाले ब्रिटिश पुलिस अधिकारी साण्डर्स को मारकर लिया।
हालाँकि वरिष्ठ पुलिस अधिकारी स्काट क्रान्तिकारियों से बच गया।
साण्डर्स की हत्या 17 दिसम्बर को की गयी। 18 दिसम्बर को पूरे लाहौर में
हिन्दुस्तान समाजवादी प्रजातान्त्रिक सेना के कमाण्डर इन चीफ़ के हस्ताक्षर से एक
परचा बाँटा गया। 23 दिसम्बर को फिर एक नोटिस लगाया गया। – स.
‘हिन्दुस्तान समाजवादी प्रजातान्त्रिक सेना’
नोटिस
नौकरशाही सावधान!
जे.पी. साण्डर्स की मृत्यु से लाला लाजपत राय जी की हत्या का
बदला ले लिया गया।
यह सोचकर कितना दुख होता है कि जे.पी. साण्डर्स जैसे एक मामूली पुलिस
अफ़सर के कमीने हाथों देश की तीस करोड़ जनता द्वारा सम्मानित एक नेता पर
हमला करके उनके प्राण ले लिये गये। राष्ट्र का यह अपमान हिन्दुस्तानी नवयुवकों
और मर्दों को चुनौती थी।
आज संसार ने देख लिया है कि हिन्दुस्तान की जनता निष्प्राण नहीं हो गयी
नौजवान भारत सभा और राष्ट्रीय नेतृत्व का मूल्यांकन / 325
है, उनका (नौजवानों) ख़ून जम नहीं गया, वे अपने राष्ट्र के सम्मान के लिए प्राणों
की बाज़ी लगा सकते हैं। और यह प्रमाण देश के उन युवकों ने दिया है जिनकी
स्वयं देश के नेता निन्दा और अपमान करते हैं।
अत्याचार सरकार सावधान!
इस देश की दलित और पीड़ित जनता की भावनाओं को ठेस मत लगाओ!
अपनी शैतानी हरकतें बन्द करो। हमें हथियार न रखने देने के लिए बनाये तुम्हारे
सब क़ानूनों और चौकसी के बावजूद पिस्तौल और रिवाल्वर इस देश की जनता
के हाथ में आते ही रहेंगे। यदि वह हथियार सशस्त्र क्रान्ति के लिए पर्याप्त न भी
हुए तो भी राष्ट्रीय अपमान का बदला लेते रहने के लिए तो काफ़ी रहेंगे ही।
हमारे अपने लोग हमारी निन्दा और अपमान करें। विदेशी सरकार चाहे हमारा
कितना भी दमन कर ले, परन्तु हम राष्ट्रीय सम्मान की रक्षा करने और विदेशी
अत्याचारियों को सबक सिखाने के लिए सदा तत्पर रहेंगे। हम सब विरोध और
दमन के बावजूद क्रान्ति की पुकार को बुलन्द रखेंगे और फाँसी के तख़्तों पर से
भी पुकार कर कहेंगे –
इन्क़लाब ज़िन्दाबाद!
हमें एक आदमी की हत्या करने का खेद है। परन्तु यह आदमी उस निर्दयी,
नीच और अन्यायपूर्ण व्यवस्था का अंग था जिसे समाप्त कर देना आवश्यक है। इस
आदमी की हत्या हिन्दुस्तान में ब्रिटिश शासन के कारिन्दे के रूप में की गयी है।
यह सरकार संसार की सबसे अत्याचारी सरकार है।
मनुष्य का रक्त बहाने के लिए हमें खेद है। परन्तु क्रान्ति की वेदी पर
कभी-कभी रक्त बहाना अनिवार्य हो जाता है। हमारा उद्देश्य एक ऐसी क्रान्ति से
है जो मनुष्य द्वारा मनुष्य के शोषण का अन्त कर देगी।
‘इन्क़लाब ज़िन्दाबाद!’
ह. बलराज
18 दिसम्बर, 1928 ‘सेनापति, पंजाब हि.स.प्र.स.’
326 / भगतसिंह और उनके साथियों के सम्पूर्ण उपलब्ध दस्तावेज़